ईरान संकट से डगमगा सकता है भारत का कृषि निर्यात, चावल से चाय तक कई कारोबार पर खतरा

Middle east conflict impact: ईरान भारत से बड़ी मात्रा में हल्दी, जीरा, चीनी, चावल, चाय, दालें, मसाले, मूंगफली और काबुली चना आयात करता है. लेकिन मौजूदा स्थिति के कारण इन वस्तुओं के निर्यात में भी बाधा आने लगी है, जिससे व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है.

नई दिल्ली | Updated On: 6 Mar, 2026 | 10:15 AM

Middle east conflict impact: पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका से जुड़ा तनाव अब वैश्विक व्यापार के साथ-साथ भारत के कृषि कारोबार पर भी असर डालने लगा है. व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है तो भारत और ईरान के बीच होने वाला कृषि व्यापार प्रभावित हो सकता है.

चावल, चाय, दालें, मसाले और फलों जैसे कई कृषि उत्पादों की आपूर्ति पर इसका असर पड़ने की आशंका है. समुद्री मार्गों में बाधा, जहाजों की कमी और बैंकिंग से जुड़ी दिक्कतें व्यापार को और मुश्किल बना सकती हैं.

भारत-ईरान व्यापार में कृषि उत्पादों की अहम भूमिका

आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में भारत ने ईरान को लगभग 1.2 अरब डॉलर का निर्यात किया था. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा चावल का रहा, जिसकी कीमत करीब 747 मिलियन डॉलर थी. इसके अलावा चाय का निर्यात लगभग 51 मिलियन डॉलर का हुआ. दूसरी ओर भारत ने ईरान से 408.6 मिलियन डॉलर का आयात किया, जिसमें सेब का आयात करीब 71.5 मिलियन डॉलर रहा. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समुद्री परिवहन प्रभावित होता है तो इन वस्तुओं का व्यापार सबसे पहले प्रभावित होगा.

स्वेज नहर और होर्मुज जलडमरूमध्य की बड़ी भूमिका

इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर के अनुसार, वैश्विक कृषि व्यापार में स्वेज नहर और होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माने जाते हैं. अनुमान है कि दुनिया के 13 से 15 प्रतिशत समुद्री अनाज और तिलहन व्यापार और लगभग 20 प्रतिशत उर्वरक व्यापार इन मार्गों से गुजरता है. अगर युद्ध के कारण इन रास्तों में बाधा आती है तो अनाज, खाद और अन्य कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है, जिससे लागत भी बढ़ सकती है.

मसालों और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर असर

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान भारत से बड़ी मात्रा में हल्दी, जीरा, चीनी, मूंगफली और काबुली चना आयात करता है. लेकिन मौजूदा स्थिति के कारण इन वस्तुओं के निर्यात में भी बाधा आने लगी है, जिससे व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है.

चावल व्यापार पर सबसे ज्यादा दबाव

भारत के लिए ईरान चावल का एक महत्वपूर्ण बाजार रहा है. भारत हर साल करीब 60 लाख टन बासमती चावल निर्यात करता है, जिसमें सऊदी अरब, इराक, यूएई और यमन जैसे मध्य पूर्वी देश प्रमुख खरीदार हैं.

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) के अध्यक्ष सतीश गोयल के अनुसार युद्ध के कारण जहाजों की उपलब्धता कम हो गई है और शिपमेंट में देरी हो रही है. रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 2 से 2.5 लाख टन बासमती चावल भारतीय बंदरगाहों पर फंसा हुआ है. करीब 3,000 कंटेनर कांडला और मुंद्रा बंदरगाहों पर रुके पड़े हैं.

AIREA के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 6.065 मिलियन टन बासमती चावल का निर्यात किया, जिसकी कीमत लगभग 50,312 करोड़ रुपये (करीब 5.94 अरब डॉलर) रही.

भारत का कुल चावल उत्पादन 150.1 मिलियन टन था, जिसमें 7 से 7.5 मिलियन टन बासमती शामिल है. वहीं गैर-बासमती चावल का निर्यात 14 से 15.1 मिलियन टन रहा. कुल निर्यात में ईरान की हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत है.

दालों के बाजार पर भी पड़ सकता है असर

मध्य पूर्व में जारी तनाव का असर दालों के बाजार पर भी पड़ सकता है. भारत हर साल 5 से 6 मिलियन टन दालें आयात करता है, जिनमें तूर, उड़द और मसूर शामिल हैं. ये आयात मुख्य रूप से म्यांमार, कनाडा और अफ्रीकी देशों से होते हैं.

इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के अध्यक्ष बिमल कोठारी का कहना है कि युद्ध जोखिम बीमा और मालभाड़ा बढ़ने से आयात लागत बढ़ सकती है, जिससे दालों की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं. हालांकि उनका मानना है कि कई दालों की आपूर्ति वैकल्पिक समुद्री मार्गों से होती है, इसलिए सीधा असर सीमित रह सकता है.

चाय और सेब के व्यापार पर भी असर की आशंका

ईरान कभी भारत की चाय का बड़ा बाजार था. पहले भारत के कुल चाय निर्यात का 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा ईरान जाता था, लेकिन अब यह घटकर 5 प्रतिशत से भी कम रह गया है. फिर भी 2024-25 में भारत ने लगभग 7 अरब रुपये की चाय ईरान को निर्यात की. यदि शिपिंग मार्ग और भुगतान व्यवस्था प्रभावित होती है तो चाय व्यापार पर भी दबाव बढ़ सकता है. दूसरी ओर भारत ईरान से बड़ी मात्रा में फल भी आयात करता है.

वहीं वर्ष 2024 में भारत के पिस्ता आयात का करीब 60 प्रतिशत, बादाम का 39 प्रतिशत और सेब का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा ईरान से आया. यदि आयात में बाधा आती है तो भारतीय बाजार में सेब की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है.

उर्वरक आपूर्ति पर भी असर की संभावना

पश्चिम एशिया उर्वरक उत्पादन का एक बड़ा केंद्र है. यहां से दुनिया भर में बड़ी मात्रा में उर्वरक की आपूर्ति होती है. भारत हर साल 26 से 28 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन करता है, लेकिन इसके कई संयंत्र आयातित LNG गैस पर निर्भर हैं. यदि एलएनजी आपूर्ति प्रभावित होती है तो उर्वरक उद्योग की उत्पादन योजना भी प्रभावित हो सकती है.

आगे क्या होगा, इस पर टिकी नजर

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल स्थिति पर लगातार नजर रखने की जरूरत है. यदि संघर्ष जल्दी समाप्त हो जाता है तो व्यापार सामान्य हो सकता है. लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है तो भारत-ईरान कृषि व्यापार ही नहीं, बल्कि वैश्विक कृषि बाजार में भी अस्थिरता बढ़ सकती है और खाद्य कीमतों पर इसका असर देखने को मिल सकता है.

Published: 6 Mar, 2026 | 10:12 AM

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