GM mustard: भारत में खेती सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी से जुड़ा आधार है. ऐसे में जब भी खेती से जुड़ी कोई नई तकनीक या नीति सामने आती है, तो उसके दूरगामी असर पर चर्चा होना स्वाभाविक है. इन दिनों एक बार फिर जेनेटिकली मॉडिफाइड यानी GM फसलों को लेकर बहस तेज हो गई है. खबर है कि केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों का एक पैनल GM सरसों की फील्ड ट्रायल और भविष्य को लेकर नीति पर विचार करेगा. इस बैठक को कृषि क्षेत्र के लिए अहम माना जा रहा है.
सरसों क्यों है इतनी महत्वपूर्ण
सरसों भारत की प्रमुख तिलहनी फसलों में से एक है. उत्तर भारत से लेकर राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक लाखों किसान इसकी खेती करते हैं. सरसों का तेल भारतीय रसोई का अहम हिस्सा है. लेकिन विडंबना यह है कि देश को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा वनस्पति तेल आयात करना पड़ता है. हर साल अरबों डॉलर खर्च कर भारत पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और अन्य खाद्य तेल विदेशों से मंगाता है.
सरकार का मानना है कि अगर सरसों की पैदावार बढ़ाई जाए, तो आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है. GM सरसों के समर्थकों का दावा है कि संशोधित किस्म अधिक उत्पादन दे सकती है और कम जमीन में ज्यादा उपज संभव हो सकती है.
GM सरसों पर क्यों अटका है मामला
द इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, GM सरसों को लेकर मामला कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. पर्यावरणविदों और कुछ किसान संगठनों ने इसकी व्यावसायिक खेती का विरोध किया है. उनका कहना है कि GM फसलें जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकती हैं और पारंपरिक बीजों पर खतरा बन सकती हैं. इसके अलावा, लंबे समय में इनके पर्यावरण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं.
साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने अलग-अलग राय दी थी, जिसके बाद मामला बड़ी पीठ को भेजा गया. अब सरकार का यह पैनल यदि सकारात्मक रुख अपनाता है, तो अदालत में सरकार की स्थिति मजबूत हो सकती है.
वैश्विक दबाव और बदलता व्यापार परिदृश्य
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते के बाद GM फसलों का मुद्दा और चर्चा में आ गया है. अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में GM फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं. वहां से आने वाले कई कृषि उत्पाद GM तकनीक से जुड़े होते हैं.
भारत ने कुछ उत्पादों पर आयात शुल्क में ढील दी है. उदाहरण के तौर पर, GM मक्का से बने डीडीजीएस जैसे उत्पाद भारतीय बाजार में आ सकते हैं. वहीं GM सोयाबीन से बना तेल पहले से आयात की अनुमति के दायरे में है. इससे घरेलू किसानों में चिंता है कि सस्ता आयात उनके उत्पाद की कीमतों को प्रभावित कर सकता है.
सरकार के सामने संतुलन की चुनौती
सरकार के सामने एक मुश्किल संतुलन है. एक तरफ खाद्य तेल के आयात पर होने वाला भारी खर्च कम करना है, दूसरी तरफ किसानों, पर्यावरण और उपभोक्ताओं की चिंताओं का समाधान भी करना है. अब तक भारत ने हाइब्रिड बीजों के जरिए उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अपनाई है. मक्का, गेहूं और धान में हाइब्रिड तकनीक से अच्छी प्रगति हुई है, बिना GM तकनीक के. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तिलहनी फसलों में उत्पादन बढ़ाने के लिए नई तकनीकों की जरूरत हो सकती है. GM सरसों के समर्थक कहते हैं कि इससे किसानों को बेहतर उपज और अधिक आय मिल सकती है.
बीटी कपास का अनुभव
भारत में फिलहाल केवल बीटी कपास को GM फसल के रूप में मंजूरी मिली है. दो दशक पहले इसकी शुरुआत हुई थी और उसके बाद कपास उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई. भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादकों में शामिल हो गया. यही उदाहरण GM तकनीक के पक्ष में अक्सर दिया जाता है. हालांकि खाद्य फसलों के मामले में सरकार अधिक सतर्क रही है. 2010 में GM बैंगन को मंजूरी देने की प्रक्रिया रोक दी गई थी, यह कहते हुए कि तत्काल खाद्य सुरक्षा की कोई गंभीर जरूरत नहीं है.
क्या है संभावना
सरकार की प्रस्तावित समीक्षा बैठक से यह संकेत मिलता है कि नीति स्तर पर एक बार फिर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. यदि GM सरसों को मंजूरी मिलती है, तो यह केवल एक फसल का फैसला नहीं होगा, बल्कि भारत की कृषि नीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.