Basmati exports 2026: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका–ईरान के बीच चल रहे सैन्य टकराव का असर अब भारत के कृषि निर्यात पर भी साफ दिखाई देने लगा है. खास तौर पर बासमती चावल का कारोबार मुश्किल में फंस गया है. अनुमान है कि करीब 60 से 70 हजार टन भारतीय बासमती चावल खाड़ी देशों के लिए रवाना तो हो चुका है, लेकिन युद्ध जैसे हालात के कारण समुद्र में ही अटका हुआ है. कुछ जहाज ईरान के बंदर अब्बास पोर्ट के आसपास खड़े हैं, जबकि कुछ को रास्ता बदलना पड़ा है.
रिकॉर्ड निर्यात की उम्मीदों को झटका
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इस वित्त वर्ष में बासमती निर्यातक रिकॉर्ड बनाने की तैयारी में थे. अप्रैल से जनवरी 2025-26 के दौरान भारत ने 5.38 मिलियन टन बासमती चावल का निर्यात किया, जो पिछले साल के इसी समय के मुकाबले 11 प्रतिशत अधिक है. कारोबारियों को उम्मीद थी कि साल खत्म होते-होते निर्यात 6.5 मिलियन टन तक पहुंच जाएगा. लेकिन मौजूदा हालात ने इस लक्ष्य को मुश्किल बना दिया है.
निर्यातकों का कहना है कि अगर युद्ध जल्द खत्म हो जाए तो स्थिति संभल सकती है, लेकिन लंबे समय तक तनाव जारी रहा तो नुकसान बढ़ सकता है. उद्योग जगत के प्रतिनिधि सरकार और संबंधित एजेंसियों के साथ लगातार बैठक कर रहे हैं, ताकि नुकसान कम से कम हो और निर्यातकों को राहत मिल सके.
खाड़ी बाजार पर सबसे ज्यादा असर
भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा खरीदार क्षेत्र पश्चिम एशिया है. पंजाब के तरनतारन और आसपास के इलाके, जहां उच्च गुणवत्ता वाला बासमती पैदा और प्रोसेस किया जाता है, वहां से लगभग 70 प्रतिशत निर्यात खाड़ी देशों को होता है. रमजान के महीने में इन देशों में बासमती की मांग और बढ़ जाती है, लेकिन इस बार युद्ध के कारण समय पर आपूर्ति नहीं हो पा रही.
कई शिपमेंट भारतीय बंदरगाहों पर रुके हुए हैं, जबकि कुछ जहाज समुद्र में ही खड़े हैं. इससे न सिर्फ डिलीवरी में देरी हो रही है, बल्कि भुगतान में भी अटकाव की आशंका बढ़ गई है. निर्यातकों को डर है कि तय समय पर माल नहीं पहुंचा तो खरीदार भुगतान टाल सकते हैं.
बढ़ी कीमतें और अनिश्चितता
पिछले दो महीनों में ईरान ने बड़ी मात्रा में बासमती खरीदा था. माना जा रहा है कि संभावित संघर्ष को देखते हुए वहां के आयातकों ने पहले से स्टॉक जमा कर लिया था. इसी वजह से बासमती की कीमतों में 10 से 15 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी देखी गई थी. लेकिन अब हालात पलट गए हैं.
शिपिंग कंपनियों ने ‘फोर्स मेज्योर’ जैसी स्थिति की घोषणा कर दी है, यानी असाधारण हालात के कारण वे समय पर डिलीवरी की जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती हैं. कुछ जहाजों को बीच रास्ते से वापस लौटना पड़ा है या दूसरे मार्गों से भेजा जा रहा है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ रहे हैं. हालांकि अभी तक मालभाड़े में बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है, लेकिन स्थिति इतनी अनिश्चित है कि आगे क्या होगा, कहना मुश्किल है.
सरकार से मदद की मांग
निर्यातक संगठनों ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है. उनका कहना है कि कंटेनर कंपनियों को निर्देश दिया जाए कि वे देरी के लिए अतिरिक्त शुल्क या जुर्माना न लगाएं. साथ ही बैंकिंग और बीमा से जुड़े मामलों में भी राहत दी जाए, ताकि निर्यातकों पर वित्तीय दबाव न बढ़े.
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) भी हालात पर नजर रखे हुए है और निर्यातकों से संपर्क में है. अधिकारियों का कहना है कि संकट का असर सिर्फ चावल ही नहीं, बल्कि अन्य कृषि उत्पादों पर भी पड़ सकता है.
किसानों और उद्योग पर संभावित असर
अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो इसका सीधा असर किसानों तक पहुंचेगा. बासमती की मांग घटने या भुगतान में देरी होने से घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव आ सकता है. मिलर्स और निर्यातकों की नकदी फंसने से खरीद प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है.
फिलहाल उद्योग जगत की नजर युद्ध की स्थिति पर टिकी है. सभी को उम्मीद है कि तनाव जल्द खत्म होगा और व्यापार सामान्य पटरी पर लौटेगा. लेकिन जब तक हालात साफ नहीं होते, तब तक भारतीय बासमती का एक बड़ा हिस्सा समुद्र की लहरों के बीच ही अटका रहेगा, और निर्यातकों की चिंता भी.