13 लाख रबर किसानों की बढ़ी चिंता, आयात शुल्क घटाने की मांग पर UPASI ने केंद्र को दी चेतावनी

संगठन का कहना है कि अगर सरकार आयात शुल्क कम करती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश के करीब 13.2 लाख रबर किसानों और इस क्षेत्र से जुड़े लाखों मजदूरों को होगा. पहले से बढ़ती लागत, मौसम की मार और बाजार की अनिश्चितता से जूझ रहे किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 12 May, 2026 | 07:40 AM

Natural rubber import duty: देश में प्राकृतिक रबर को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस शुरू हो गई है. एक तरफ रबर का इस्तेमाल करने वाले उद्योग आयात शुल्क कम करने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ रबर किसानों और प्लांटेशन संगठनों ने इसे लेकर गहरी चिंता जताई है. दक्षिण भारत के प्रमुख प्लांटर्स संगठन यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन ऑफ सदर्न इंडिया (UPASI) ने केंद्र सरकार से साफ शब्दों में कहा है कि प्राकृतिक रबर पर मौजूदा आयात शुल्क में किसी भी तरह की कटौती नहीं की जानी चाहिए.

संगठन का कहना है कि अगर सरकार आयात शुल्क कम करती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश के करीब 13.2 लाख रबर किसानों और इस क्षेत्र से जुड़े लाखों मजदूरों को होगा. पहले से बढ़ती लागत, मौसम की मार और बाजार की अनिश्चितता से जूझ रहे किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है.

आखिर क्यों उठी आयात शुल्क घटाने की मांग?

देश में टायर, ऑटोमोबाइल और रबर उत्पाद बनाने वाली कई कंपनियां लंबे समय से प्राकृतिक रबर पर आयात शुल्क कम करने की मांग कर रही हैं. उनका कहना है कि कच्चे माल की कीमत बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ रही है. अगर आयात शुल्क घटेगा तो विदेशों से सस्ता रबर आएगा और उद्योगों को राहत मिलेगी.

लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि उद्योगों को राहत देने के नाम पर किसानों की कमर नहीं तोड़ी जा सकती. उनका मानना है कि विदेशी रबर अगर सस्ते दामों में भारतीय बाजार में आने लगा तो घरेलू किसानों को अपनी उपज बेहद कम कीमत पर बेचनी पड़ेगी.

UPASI ने सरकार को क्या चेतावनी दी?

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, UPASI के अध्यक्ष अजय थिपेया ने कहा कि प्राकृतिक रबर क्षेत्र पहले से कई चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे समय में आयात शुल्क कम करना किसानों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. उन्होंने बताया कि हाल के महीनों में रबर की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन इसके पीछे वैश्विक हालात और उत्पादन में कमी जैसी वजहें हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई प्रभावित होने और मौसम की समस्याओं के कारण कीमतों में हलचल देखी गई.

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पिछले दो वर्षों में भारतीय रबर की कीमतें कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार से कम रही हैं. पिछले 24 महीनों में से 16 महीनों तक घरेलू बाजार में रबर की कीमतें विदेशी बाजार के मुकाबले नीचे बनी रहीं. यानी किसानों को पहले ही सही दाम नहीं मिल पा रहे थे.

लागत इतनी बढ़ी कि मुनाफा लगभग खत्म

रबर किसानों की सबसे बड़ी परेशानी बढ़ती लागत है. खेती में इस्तेमाल होने वाले खाद, कीटनाशक, पौध संरक्षण रसायन और मजदूरी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है.

UPASI के अनुसार पिछले दस वर्षों में इन जरूरी चीजों की लागत हर साल करीब 8 से 12 प्रतिशत तक बढ़ी है. मजदूरों की मजदूरी बढ़ने से उत्पादन खर्च और ज्यादा बढ़ गया है. कई छोटे किसान बताते हैं कि पहले जहां रबर खेती से अच्छी आमदनी हो जाती थी, अब लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है. ऊपर से अगर आयात शुल्क कम हुआ तो बाजार में विदेशी रबर की भरमार हो सकती है, जिससे किसानों को और कम दाम मिलेंगे.

तेजी से बढ़ रहा विदेशी रबर का आयात

UPASI की रबर समिति के चेयरमैन संतोष कुमार ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक रबर और कंपाउंड रबर का आयात तेजी से बढ़ा है. उन्होंने बताया कि सबसे ज्यादा चिंता कंपाउंड रबर के आयात को लेकर है. अब कुल रबर आयात में इसकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. खास बात यह है कि ASEAN देशों से आने वाला ज्यादातर कंपाउंड रबर बिना ड्यूटी के भारत में पहुंच रहा है.

किसानों का कहना है कि अगर प्राकृतिक रबर पर भी आयात शुल्क कम हुआ तो घरेलू बाजार विदेशी उत्पादों से भर जाएगा और भारतीय किसानों के लिए टिक पाना मुश्किल हो जाएगा.

रबर खेती क्यों है अलग?

विशेषज्ञों के अनुसार रबर की खेती दूसरी फसलों की तरह नहीं होती. इसमें पौधा लगाने के बाद उत्पादन शुरू होने में कई साल लग जाते हैं. किसान तुरंत फसल बदल भी नहीं सकते. यही वजह है कि इस क्षेत्र को स्थिर नीति और सुरक्षा की जरूरत होती है. अगर अचानक बाजार में बड़े बदलाव हुए तो किसान लंबे समय तक नुकसान झेल सकते हैं.

भारत में कितनी होती है रबर खेती?

भारत में इस समय करीब 9.4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक रबर की खेती हो रही है. देश में हर साल लगभग 9 लाख टन रबर उत्पादन की क्षमता है. 2025-26 में भी करीब 9 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया गया है. भारत दुनिया के बड़े रबर उत्पादक देशों में गिना जाता है.

किन राज्यों में होती है सबसे ज्यादा खेती?

भारत में सबसे ज्यादा रबर उत्पादन केरल में होता है. यहां लाखों किसान रबर खेती पर निर्भर हैं. राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रबर का बहुत बड़ा योगदान माना जाता है. इसके अलावा तमिलनाडु, कर्नाटक और पूर्वोत्तर राज्यों में भी रबर खेती तेजी से बढ़ी है. त्रिपुरा, असम और मेघालय जैसे राज्यों में सरकार किसानों को रबर खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है.

पूर्वोत्तर भारत में कई किसान अब पारंपरिक खेती छोड़कर रबर की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि इससे लंबे समय में बेहतर कमाई की उम्मीद रहती है.

किसानों की चिंता क्यों बढ़ी?

रबर किसानों का कहना है कि वे पहले ही मौसम की अनिश्चितता, मजदूरी संकट और बढ़ती लागत से परेशान हैं. कई इलाकों में गर्मी और अनियमित बारिश की वजह से उत्पादन प्रभावित हुआ है. ऐसे समय में अगर आयात शुल्क कम हुआ तो बाजार में सस्ता विदेशी रबर आने लगेगा और घरेलू किसानों की उपज की कीमत गिर सकती है. इससे छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा.

उद्योग और किसानों के बीच बढ़ी खींचतान

एक तरफ उद्योग चाहते हैं कि उन्हें सस्ता कच्चा माल मिले ताकि उत्पादन लागत कम हो सके. वहीं किसान संगठनों का कहना है कि उद्योगों के फायदे के लिए किसानों के भविष्य को खतरे में नहीं डाला जा सकता. विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को ऐसा संतुलित फैसला लेना होगा जिससे उद्योग भी प्रभावित न हों और किसानों की आय भी सुरक्षित रहे.

ग्रामीण रोजगार में बड़ी भूमिका निभाता है रबर क्षेत्र

प्राकृतिक रबर क्षेत्र सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है. इससे लाखों मजदूर, ट्रांसपोर्ट कारोबारी, छोटे व्यापारी और रबर आधारित उद्योग जुड़े हुए हैं.

ग्रामीण इलाकों में हजारों परिवारों की आजीविका सीधे इसी क्षेत्र पर निर्भर है. इसलिए इस सेक्टर में किसी भी बड़े बदलाव का असर व्यापक स्तर पर पड़ सकता है.

अब सबकी नजर केंद्र सरकार पर

फिलहाल केंद्र सरकार ने आयात शुल्क को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है. लेकिन जिस तरह उद्योग और किसान संगठन आमने-सामने आ गए हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गर्मा सकता है. रबर किसानों को उम्मीद है कि सरकार ऐसा फैसला करेगी जिससे घरेलू उत्पादन सुरक्षित रहे और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी पर कोई खतरा न आए.

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Published: 12 May, 2026 | 07:38 AM
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