Soybean Import: देश में सोयाबीन की कमी के कारण इसका आयात तेजी से बढ़ गया है. सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के मुताबिक, 2025-26 तेल वर्ष में जून के आखिर तक भारत ने 7.77 लाख टन सोयाबीन आयात किया है. पिछले साल इसी अवधि में यह आयात सिर्फ 2,000 टन था. इससे साफ है कि घरेलू आपूर्ति कम होने के कारण इस बार आयात में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. SOPA का कहना है कि घरेलू बाजार में सोयाबीन के दाम बढ़ने की वजह से सोयाबीन मील (खली) के निर्यात में कमी आ सकती है. चालू तेल वर्ष में इसके निर्यात का अनुमान 10 लाख टन है, जबकि पिछले वर्ष 20.23 लाख टन सोयाबीन मील का निर्यात हुआ था.
संस्था के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस सीजन में अनुमानित 110.26 लाख टन उत्पादन में से अब तक 77.5 लाख टन सोयाबीन मंडियों में पहुंची है. यह पिछले साल की समान अवधि के 89 लाख टन के मुकाबले कम है, जिससे घरेलू बाजार में आपूर्ति का दबाव बना हुआ है. SOPA के अनुसार, चालू 2025-26 तेल वर्ष (अक्टूबर-जून) में सोयाबीन मील का उत्पादन घटकर 64.31 लाख टन रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 68.65 लाख टन था.
सोयाबीन मील का निर्यात भी घटकर 9.02 लाख टन रह गया
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, सोयाबीन मील का निर्यात भी घटकर 9.02 लाख टन रह गया, जो पिछले साल 15.60 लाख टन था. हालांकि, देश में खाद्य उपयोग के लिए खपत बढ़कर 6.7 लाख टन और पशु चारा (फीड) उद्योग की खपत 48 लाख टन हो गई. जून के अंत तक सोयाबीन मील का स्टॉक 1.27 लाख टन रहा.
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भारत का सोयाबीन आयात 9 लाख टन तक पहुंच सकता है
SOPA का अनुमान है कि पूरे 2025-26 तेल वर्ष में भारत का सोयाबीन आयात 9 लाख टन तक पहुंच सकता है. वहीं, सोयाबीन मील का निर्यात 10 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के 20.23 लाख टन से काफी कम होगा. दूसरी ओर, घरेलू मांग बढ़ने की उम्मीद है. खाद्य क्षेत्र में खपत 9 लाख टन और फीड उद्योग में 63 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है.
निर्यात का अनुमान 11 लाख टन से घटाकर 10 लाख टन कर दिया
SOPA के कार्यकारी निदेशक डी. एन. पाठक ने कहा कि घरेलू मांग बढ़ने के कारण सोयाबीन मील के निर्यात का अनुमान 11 लाख टन से घटाकर 10 लाख टन कर दिया गया है. उन्होंने बताया कि अब खाद्य क्षेत्र में सोयाबीन मील की खपत का अनुमान 8 लाख टन से बढ़ाकर 9 लाख टन और पशु चारा (फीड) उद्योग की खपत 62 लाख टन से बढ़ाकर 63 लाख टन कर दी गई है. उनका कहना है कि देश में बढ़ती मांग के कारण निर्यात के लिए उपलब्ध मात्रा कम हो रही है.