रिपोर्ट में खुलासा: कम स्टॉक और बढ़ती लागत से चीनी के दाम मजबूत, एथेनॉल कंपनियों का मुनाफा घटा
चीनी उद्योग से जुड़ा एथेनॉल सेक्टर इस समय सबसे ज्यादा दबाव में नजर आ रहा है. समस्या यह है कि गन्ने की कीमत बढ़ रही है, लेकिन एथेनॉल के दाम में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है. इससे गन्ने से एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों का मुनाफा घटता जा रहा है.
Sugar prices India 2026: देश में चीनी बाजार एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है. एक तरफ उत्पादन में सुधार की खबर है, तो दूसरी तरफ स्टॉक की कमी के कारण कीमतों में मजबूती बनी रहने की संभावना जताई जा रही है. इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि आने वाले समय में चीनी सस्ती नहीं, बल्कि मजबूत दाम पर ही बिक सकती है. यह स्थिति सिर्फ उपभोक्ताओं ही नहीं, बल्कि किसानों, चीनी मिलों और एथेनॉल इंडस्ट्री तीनों पर असर डालने वाली है.
उत्पादन बढ़ा, लेकिन स्टॉक फिर भी कम
रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 पेराई सीजन में देश में करीब 32.5 मिलियन टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है. यह पिछले सीजन के मुकाबले बेहतर है, जब उत्पादन घटकर लगभग 29.5 मिलियन टन रह गया था. लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है जब उत्पादन बढ़ रहा है, तो फिर दाम मजबूत क्यों रहेंगे?
इसका जवाब है कम बचा हुआ स्टॉक. सीजन खत्म होने तक देश में केवल करीब 5 मिलियन टन चीनी का स्टॉक बचने की संभावना है, जो सामान्य स्तर से कम है. यही वजह है कि बाजार में सप्लाई सीमित रहेगी और कीमतों को सहारा मिलेगा.
निर्यात क्यों रहेगा कमजोर
बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, वैश्विक बाजार में फिलहाल चीनी की कीमतें ज्यादा आकर्षक नहीं हैं. इसके अलावा भारत में खुद स्टॉक कम होने के कारण सरकार भी निर्यात को लेकर सतर्क है. हालांकि 2 मिलियन टन निर्यात की अनुमति दी गई है, लेकिन अनुमान है कि असल निर्यात इससे कम ही रहेगा. इसका मतलब है कि ज्यादातर चीनी घरेलू बाजार में ही खपाई जाएगी.
गन्ने की बढ़ती कीमतें और मिलों की चुनौती
इस बार गन्ने की कीमतों में भी इजाफा हुआ है. राज्य परामर्श मूल्य (SAP) में लगभग 8 फीसदी और उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) में करीब 4.4 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है. इससे मिलों की लागत बढ़ेगी, क्योंकि गन्ना उनका मुख्य कच्चा माल है. हालांकि, चीनी के मजबूत दाम और बेहतर रिकवरी दर मिलों को इस बढ़े खर्च को संभालने में मदद कर सकती है.
एथेनॉल सेक्टर में क्यों बढ़ी परेशानी
चीनी उद्योग से जुड़ा एथेनॉल सेक्टर इस समय सबसे ज्यादा दबाव में नजर आ रहा है. समस्या यह है कि गन्ने की कीमत बढ़ रही है, लेकिन एथेनॉल के दाम में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है. इससे गन्ने से एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों का मुनाफा घटता जा रहा है.
अनाज आधारित एथेनॉल का बढ़ता दबदबा
दूसरी तरफ, मक्का जैसे अनाज से एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को फायदा हो रहा है. 2024-25 में मक्के का रिकॉर्ड 42.3 मिलियन टन उत्पादन हुआ, जिससे इसकी कीमतों में करीब 20 फीसदी तक गिरावट आई. सस्ता कच्चा माल मिलने के कारण अनाज आधारित एथेनॉल उत्पादन तेजी से बढ़ा है. इसका असर यह हुआ कि इस सेक्टर का कोटा करीब 27 फीसदी तक बढ़ गया. साथ ही, इससे निकलने वाला बाय-प्रोडक्ट पशुओं के चारे के रूप में भी उपयोगी साबित हो रहा है.
बाजार में एथेनॉल की भरमार
भारत अब पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य के करीब पहुंच चुका है. इसके चलते मांग की रफ्तार धीमी पड़ गई है. वहीं दूसरी तरफ उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ी है. स्थिति यह है कि जहां तेल कंपनियों को करीब 10.5 बिलियन लीटर एथेनॉल की जरूरत थी, वहीं कंपनियों ने 17.8 बिलियन लीटर सप्लाई का ऑफर दिया. यह साफ संकेत है कि बाजार में एथेनॉल की अधिकता (ओवरसप्लाई) बन चुकी है.
कच्चे तेल और वैश्विक हालात का असर
मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव का असर ऊर्जा बाजार पर भी पड़ रहा है. अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो ब्राजील जैसे देश गन्ने से ज्यादा एथेनॉल बनाने लग सकते हैं. इससे वैश्विक स्तर पर चीनी का उत्पादन कम होगा और कीमतों में तेजी आ सकती है. हालांकि, निर्यात के लिए लॉजिस्टिक समस्याएं और बढ़ता भाड़ा एक चुनौती बने रहेंगे.
नीति की जरूरत क्यों जरूरी
रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि एथेनॉल सेक्टर को संतुलित करने के लिए सरकार को स्पष्ट नीति लानी होगी. खासतौर पर पेट्रोल में 20 फीसदी से ज्यादा एथेनॉल मिलाने को लेकर स्पष्ट रोडमैप जरूरी है. जब तक यह नहीं होता, तब तक ओवरसप्लाई और कम मुनाफे की समस्या बनी रहेगी.