India seafood exports: साल 2025 भारत के सीफूड निर्यात उद्योग के लिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा. यह वह साल रहा, जब एक के बाद एक अमेरिकी टैरिफ फैसलों ने इस सेक्टर को गहरे संकट में डाल दिया. अमेरिका, जो भारत के समुद्री उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार माना जाता है, वहां अचानक बढ़े शुल्कों ने भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक ताकत को कमजोर कर दिया. लागत बढ़ी, मुनाफा घटा और कई निर्यात सौदों पर अनिश्चितता के बादल छा गए.
साल की शुरुआत में ही बढ़ा दबाव
2025 की शुरुआत भारतीय सीफूड इंडस्ट्री के लिए झटके के साथ हुई. अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने पहले से लागू एंटी-डंपिंग ड्यूटी के ऊपर 5.77 प्रतिशत काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगा दी. इसका सीधा असर यह हुआ कि भारतीय झींगा और अन्य समुद्री उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे पड़ने लगे. इससे पहले से चल रही 2.49 प्रतिशत एंटी-डंपिंग ड्यूटी ने भी निर्यातकों की कमर तोड़ रखी थी.
हालात तब और बिगड़े जब अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई के तहत 26 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा. इस कदम ने भारत को इक्वाडोर और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया. अमेरिकी खरीदारों के लिए भारतीय उत्पाद अचानक कम आकर्षक हो गए.
राहत मिली, लेकिन बहुत थोड़े समय के लिए
अमेरिका ने कुछ समय के लिए देश-विशेष टैरिफ को निलंबित कर सभी आयातों पर 10.5 प्रतिशत का समान शुल्क लागू किया. इससे निर्यातकों को थोड़ी राहत जरूर मिली और कुछ सौदे दोबारा पटरी पर आए. लेकिन यह राहत ज्यादा दिन नहीं टिक सकी. अगस्त 2025 से अमेरिका ने फिर सख्त रुख अपनाया और 25 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी के साथ 25 प्रतिशत का अतिरिक्त “पेनल टैरिफ” लगा दिया.
इस दोहरी मार ने लागत को काफी बढ़ा दिया. ऐसे समय में जब वैश्विक मांग पहले ही कमजोर हो रही थी, भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में टिके रहना बेहद मुश्किल हो गया.
आंकड़ों में दिखी अमेरिकी बाजार की गिरावट
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच अमेरिका को भारत का सीफूड निर्यात मूल्य के लिहाज से करीब 62 मिलियन डॉलर घट गया. खास तौर पर अगस्त से अक्टूबर के तीन महीनों में गिरावट और तेज रही. इस अवधि में निर्यात मूल्य में लगभग 33 प्रतिशत की बड़ी कमी दर्ज की गई. हालांकि यह गिरावट पूरी तस्वीर नहीं दिखाती, क्योंकि इसी दौरान भारत ने अन्य बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत की.
यूरोप और चीन बने सहारा
अमेरिकी बाजार में आई कमजोरी की भरपाई कुछ हद तक यूरोपीय संघ और चीन जैसे बड़े बाजारों ने की. यूरोप को भारत के सीफूड निर्यात में करीब 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि चीन में यह बढ़ोतरी लगभग 20 प्रतिशत रही. इसके अलावा वियतनाम और रूस जैसे छोटे लेकिन उभरते बाजारों में भी भारतीय उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी.
इन वैकल्पिक बाजारों के कारण अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच भारत का कुल सीफूड निर्यात मूल्य करीब 16 प्रतिशत बढ़ा. इससे यह साफ हुआ कि भारतीय उद्योग ने मुश्किल हालात में भी अपने लिए नए रास्ते तलाशे.
बदलती वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आगे की उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा की तस्वीर भी बदल रही है. इक्वाडोर जैसे देशों को जो लागत का फायदा पहले मिल रहा था, वह अब खत्म हो रहा है. इससे भारत और उसके प्रतिस्पर्धियों के बीच कीमतों का अंतर कम हुआ है.
आगे 2026 को लेकर उम्मीदें बेहतर दिखाई दे रही हैं. माना जा रहा है कि अमेरिकी बाजार में भारत की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है. साथ ही यूरोप और ब्रिटेन के साथ संभावित व्यापार समझौते भारतीय सीफूड सेक्टर के लिए नए अवसर खोल सकते हैं.