पश्चिम बंगाल के चावल उद्योग ने सरकार के सामने रखीं बड़ी मांगें, निर्यात बढ़ाने पर दिया जोर

पश्चिम बंगाल की कई पारंपरिक चावल किस्में देश और विदेश में तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं. गोबिंदो भोग और तुलई पांजी जैसी किस्मों को विशेष पहचान मिल चुकी है. इन दोनों को भौगोलिक संकेतक टैग भी प्राप्त है. उद्योग का कहना है कि अगर सरकार इन खास किस्मों की ब्रांडिंग और प्रचार पर ध्यान दे तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में बंगाल के चावल की पहचान और मजबूत हो सकती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 18 May, 2026 | 07:45 AM

West Bengal rice industry: पश्चिम बंगाल देश का सबसे बड़ा चावल उत्पादक राज्य माना जाता है. यहां की खेती और चावल उद्योग लाखों किसानों, व्यापारियों और मजदूरों की आजीविका से जुड़ा हुआ है. लेकिन अब राज्य का चावल उद्योग कई समस्याओं से जूझ रहा है. उद्योग से जुड़े कारोबारी और मिल मालिकों ने नई सरकार से मांग की है कि चावल उद्योग को मजबूत करने के लिए बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जाए, लाइसेंस और अनुमति की प्रक्रिया आसान बनाई जाए और निर्यात को बढ़ावा दिया जाए.

उद्योग जगत का मानना है कि अगर सरकार समय रहते जरूरी कदम उठाती है तो पश्चिम बंगाल देश ही नहीं बल्कि दुनिया के बड़े चावल बाजार में और मजबूत पहचान बना सकता है.

ग्रामीण इलाकों में खराब सुविधाओं से बढ़ रही परेशानी

TOI की खबर के अनुसार,चावल उद्योग से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में अभी भी बुनियादी सुविधाओं की हालत अच्छी नहीं है. कई जगहों पर सड़कें खराब हैं, जल निकासी की व्यवस्था कमजोर है और बिजली कनेक्शन मिलने में महीनों लग जाते हैं.

राइसविला फूड्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सूरज अग्रवाल ने कहा कि नई चावल मिल लगाने वाले कारोबारियों को सबसे ज्यादा परेशानी बिजली कनेक्शन लेने में होती है. कई बार लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है, जिससे परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है और काम भी देर से शुरू होता है. उन्होंने कहा कि सरकार अगर तेज और पारदर्शी व्यवस्था लागू करे तो उद्योग को काफी राहत मिल सकती है.

भंडारण और परिवहन व्यवस्था मजबूत करने की मांग

देश में पिछले कुछ वर्षों में चावल उत्पादन तेजी से बढ़ा है. भारत का सालाना चावल उत्पादन 1500 लाख टन से ज्यादा पहुंच चुका है. इसके साथ ही सरकारी भंडार में भी 590 लाख टन से ज्यादा चावल मौजूद है. ऐसे में उद्योग जगत का कहना है कि आधुनिक गोदाम, भंडारण केंद्र और मजबूत परिवहन व्यवस्था अब बेहद जरूरी हो गई है. कारोबारियों के अनुसार अगर सही भंडारण व्यवस्था नहीं होगी तो नुकसान बढ़ेगा और निर्यात पर भी असर पड़ेगा. उद्योग ने सरकार से रेल और बंदरगाह कनेक्टिविटी मजबूत करने की भी मांग की है, ताकि पूर्वी भारत से चावल का निर्यात आसानी से हो सके.

एक ही जगह मिले सभी मंजूरी की सुविधा

चावल उद्योग से जुड़े लोगों ने सरकार से यह भी मांग की है कि लाइसेंस और मंजूरी के लिए अलग-अलग विभागों के चक्कर खत्म किए जाएं. कारोबारियों का कहना है कि अगर एकल खिड़की व्यवस्था लागू हो जाए तो उद्योग लगाने और कारोबार बढ़ाने में काफी आसानी होगी. इससे समय की बचत होगी और कागजी प्रक्रिया भी कम होगी. उद्योग जगत का मानना है कि तेज मंजूरी मिलने से राज्य में नए निवेश भी आएंगे और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे.

चावल उद्योग विकास बोर्ड बनाने की मांग

उद्योग से जुड़े संगठनों ने राज्य में अलग से चावल उद्योग विकास बोर्ड बनाने की मांग की है. उनका कहना है कि इससे किसानों, मिल मालिकों, निर्यातकों और सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बन सकेगा. ऐसे बोर्ड के जरिए उत्पादन, भंडारण, निर्यात और बाजार से जुड़ी समस्याओं का समाधान तेजी से किया जा सकेगा. उद्योग का मानना है कि इससे पूरे क्षेत्र के विकास को नई दिशा मिलेगी.

निर्यात बढ़ने से बढ़ी उम्मीद

भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है. दुनिया के कुल चावल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है. हर साल दुनिया में लगभग 550 लाख टन चावल का व्यापार होता है, जिसमें भारत अकेले 200 लाख टन से ज्यादा चावल निर्यात करता है. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्ष 2025 में भारत का चावल निर्यात करीब 19 प्रतिशत बढ़कर 215 लाख टन तक पहुंच गया. निर्यात पर लगी पाबंदियों में ढील मिलने के बाद यह तेजी देखने को मिली है. अब पश्चिम बंगाल का उद्योग भी इस मौके का फायदा उठाना चाहता है.

बंगाल के खास चावल की बढ़ रही मांग

पश्चिम बंगाल की कई पारंपरिक चावल किस्में देश और विदेश में तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं. गोबिंदो भोग और तुलई पांजी जैसी किस्मों को विशेष पहचान मिल चुकी है. इन दोनों को भौगोलिक संकेतक टैग भी प्राप्त है. उद्योग का कहना है कि अगर सरकार इन खास किस्मों की ब्रांडिंग और प्रचार पर ध्यान दे तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में बंगाल के चावल की पहचान और मजबूत हो सकती है. कारोबारियों का मानना है कि इससे किसानों को भी बेहतर दाम मिलेंगे और निर्यात बढ़ेगा.

मुफ्त चावल योजना से मिल मालिक परेशान

पश्चिम बंगाल राइस मिल्स ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील कुमार चौधरी ने कहा कि राज्य में बड़ी संख्या में चावल मिलें घाटे में चल रही हैं. उनके अनुसार राज्य में लगभग 1500 चावल मिलें हैं, लेकिन इनमें से कई बंद हो चुकी हैं. करीब 550 मिलें सरकारी खरीद में लगी हैं, जबकि बाकी निजी बाजार और निर्यात के लिए काम करती हैं. उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की मुफ्त चावल योजनाओं की वजह से खुले बाजार में चावल की मांग कम हो गई है. इससे मिल मालिकों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है.

उनका कहना है कि राज्य में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोगों को राज्य योजना के तहत मुफ्त चावल दिया जा रहा है, जबकि साढ़े छह करोड़ लोग केंद्र सरकार की योजना का लाभ ले रहे हैं. उद्योग का मानना है कि जरूरत से ज्यादा मुफ्त वितरण का असर कारोबार पर पड़ रहा है.

राज्य के लिए बड़ा अवसर

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल हर साल लगभग 150 लाख टन चावल उत्पादन करता है, लेकिन इसका बहुत छोटा हिस्सा ही सीधे निर्यात बाजार तक पहुंच पाता है. अगर सरकार बुनियादी ढांचे, निर्यात और ब्रांडिंग पर ध्यान दे तो राज्य देश के 90 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के चावल निर्यात कारोबार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है.

उद्योग जगत को उम्मीद है कि नई सरकार चावल उद्योग की समस्याओं को गंभीरता से समझेगी और किसानों से लेकर कारोबारियों तक सभी को राहत देने वाले फैसले लेगी.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

लेटेस्ट न्यूज़