प्राकृतिक खेती का कमाल, किसानों का मुनाफा 124 फीसदी बढ़ा, आंध्र प्रदेश को मिला अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार

आंध्र प्रदेश की APCNF प्राकृतिक खेती योजना को 15 लाख डॉलर का प्रतिष्ठित फूड प्लैनेट प्राइज मिला है. पिछले 10 वर्षों में 18 लाख किसान परिवार इस पहल से जुड़े हैं. अध्ययन के अनुसार प्राकृतिक खेती से उत्पादन पर खास असर नहीं पड़ा, जबकि लागत घटने से किसानों का मुनाफा 124 प्रतिशत तक बढ़ा और जैव विविधता में भी सुधार देखा गया.

Kisan India
नोएडा | Published: 19 Jun, 2026 | 09:01 AM

Natural Farming: आंध्र प्रदेश सरकार की प्राकृतिक खेती से जुड़ी एक महत्वाकांक्षी योजना को इस महीने बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है. राज्य के आंध्र प्रदेश कम्युनिटी मैनेज्ड नेचुरल फार्मिंग (APCNF) कार्यक्रम को 15 लाख डॉलर करीब 13 करोड़ रुपये का प्रतिष्ठित फूड प्लैनेट प्राइज प्रदान किया गया है. पुरस्कार देने वाली जूरी ने इसे कृषि क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की दिशा में दुनिया के सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी प्रयासों में से एक बताया है. पिछले एक दशक में राज्य के करीब 18 लाख किसान परिवार इस योजना से जुड़ चुके हैं. प्राकृतिक खेती की तकनीकों को हजारों गांवों और लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अपनाया गया है. वहीं, प्राकृतिक खेती अपनाने से रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम होने से किसानों का मुनाफा औसतन 124 प्रतिशत तक बढ़ गया  है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह कार्यक्रम महिला स्वयं सहायता समूहों (SHG) और प्रशिक्षित किसान मार्गदर्शकों के नेटवर्क के माध्यम से संचालित किया जा रहा है. राज्य सरकार का लक्ष्य वर्ष 2035 तक आंध्र प्रदेश के सभी 60 लाख किसानों को प्राकृतिक खेती  से जोड़ना है. इस पहल का उद्देश्य खेती की लागत कम करना, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाना और पर्यावरण के अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना है.

क्या है APCNF योजना

आंध्र प्रदेश की APCNF (आंध्र प्रदेश कम्युनिटी मैनेज्ड नेचुरल फार्मिंग) योजना प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ सुभाष पालेकर की जीरो बजट प्राकृतिक खेती की अवधारणा पर आधारित है. इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बजाय स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए जैविक घोल और प्राकृतिक तरीकों का उपयोग किया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता और उसमें मौजूद सूक्ष्म जीवों को मजबूत बनाना है, ताकि मिट्टी स्वयं फसलों को आवश्यक पोषण प्रदान कर सके.

किसान इच्छा से अपना रहे प्राकृतिक खेती

इस योजना की खास बात यह है कि किसानों को इसमें शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जाता. किसान अपनी इच्छा से पहले खेत के एक छोटे हिस्से में प्राकृतिक खेती अपनाते हैं, जबकि बाकी जमीन पर पारंपरिक खेती जारी रखते हैं. एक सीजन तक दोनों तरीकों के परिणाम देखने के बाद वे तय करते हैं कि प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ाना है या नहीं.

राज्य सरकार देती है तकनीकी सहायता

राज्य सरकार और योजना से जुड़े विशेषज्ञ प्रत्येक गांव में कई वर्षों तक किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि चरणबद्ध और स्वैच्छिक तरीके से लागू की गई यह योजना प्राकृतिक खेती को लेकर उन चिंताओं से अलग है, जिनका उदाहरण अक्सर श्रीलंका के अनुभव के रूप में दिया जाता है. वर्ष 2021 में आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका ने अचानक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था और किसानों को बिना तैयारी के जैविक खेती अपनाने के लिए कहा था. इसका असर यह हुआ कि एक ही सीजन में धान का उत्पादन घट गया, चावल का आयात बढ़ गया और चाय निर्यात को भी भारी नुकसान हुआ. कुछ ही महीनों में सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा. इसके बाद अक्सर यह तर्क दिया जाने लगा कि प्राकृतिक खेती बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो सकती.

किसानों का मुनाफा 124 प्रतिशत तक बढ़ा

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीलंका का अनुभव और आंध्र प्रदेश का मॉडल पूरी तरह अलग हैं. आंध्र प्रदेश में किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए समय, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दी गई है, जबकि यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वैच्छिक रखी गई है. APCNF पर किए गए एक शोध के अनुसार, 206 फसल चक्रों के अध्ययन में पाया गया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उत्पादन में कोई खास कमी नहीं आई. वहीं रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम होने से किसानों का मुनाफा औसतन 124 प्रतिशत तक बढ़ा.

जैव विविधता बेहतर रही

अध्ययन में यह भी सामने आया कि प्राकृतिक खेती वाले क्षेत्रों में जैव विविधता बेहतर रही. खासकर ऐसे पक्षियों की संख्या बढ़ी जो कीट नियंत्रण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं. हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि सभी किसानों को समान परिणाम नहीं मिले. प्राकृतिक खेती हर जगह एक जैसी सफलता की गारंटी नहीं देती और जैव विविधता में सुधार केवल खेती की पद्धति ही नहीं, बल्कि भूमि उपयोग और अन्य नीतियों पर भी निर्भर करता है.

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