गंगा नदी के किनारे जैविक केले की खेती.. ‘नमामि गंगे परियोजना’ से किसानों की बदली किस्मत

उत्तर प्रदेश के कौशांबी में किसान नमामि गंगे परियोजना के तहत जैविक केले की खेती अपना रहे हैं. इससे मिट्टी की सेहत सुधरने और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी आने की उम्मीद है. चिल्ला शहबाजी में स्थापित टिश्यू कल्चर लैब किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण पौधे उपलब्ध कराकर उत्पादन बढ़ाने में मदद कर रही है.

Kisan India
नोएडा | Published: 24 May, 2026 | 10:58 AM

Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में गंगा नदी के किनारे किसान अब ‘नमामि गंगे परियोजना’ के तहत जैविक केले की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. इस पहल का उद्देश्य खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग को कम करना तथा पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है. किसानों का मानना है कि जैविक खेती से न केवल मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि उपज की गुणवत्ता और बाजार में उसकी मांग भी बढ़ेगी.

कौशांबी को बड़े पैमाने पर केले के उत्पादन के कारण ‘मिनी भुसावल’ भी कहा जाता है. जिले में 2,550 से अधिक किसान केले की खेती से जुड़े हुए हैं और इससे अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं. जिला उद्यान अधिकारी अवधेश मिश्रा के अनुसार, वर्तमान में जिले में करीब 6,000 हेक्टेयर क्षेत्र में केले की खेती की जा रही है. कौशांबी केला उत्पादक संघ से जुड़े किसानों का कहना है कि लंबे समय से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के कारण गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र की कृषि भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है. संघ से जुड़े किसान वसीम नकवी ने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ को बताया कि गंगा किनारे के इलाकों के किसान अब मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाए रखने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए जैविक केले की खेती अपना रहे हैं. उनका मानना है कि इससे भूमि की गुणवत्ता सुरक्षित रहेगी और फसल उत्पादन भी लंबे समय तक बेहतर बना रहेगा.

पांच किलोमीटर के दायरे में बागवानी

गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाए रखने के उद्देश्य से सरकार नदी के दोनों किनारों से पांच किलोमीटर के दायरे में बागवानी और जैविक खेती  को बढ़ावा दे रही है. इस पहल के तहत किसानों को पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग कम हो और गंगा के जल को प्रदूषित होने से बचाया जा सके. इससे खेती के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है.

जिला उद्यान अधिकारी अवधेश मिश्रा ने बताया कि इस पहल के सकारात्मक परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं. उन्होंने कहा कि चालू वर्ष में कौशांबी के गंगा किनारे वाले क्षेत्रों में किसानों ने करीब 50 हेक्टेयर भूमि पर जैविक केले की खेती शुरू की है. मिश्रा के अनुसार, नदी तटीय क्षेत्रों में केले की खेती का विस्तार होने से न केवल इस फसल का रकबा बढ़ेगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्य में भी सुधार होगा. इससे किसानों को बेहतर उत्पादन के साथ-साथ टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी.

2 करोड़ की लागत से प्रयोगशाला

केला उत्पादकों की मदद के लिए कौशांबी के चिल्ला शहबाजी गांव में 2 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से एक टिश्यू कल्चर  प्रयोगशाला स्थापित की गई है. इससे किसानों की एक पुरानी समस्या का समाधान होगा, क्योंकि पहले उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाले टिश्यू कल्चर केले के पौधे महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से मंगाने पड़ते थे. पौधों की आपूर्ति में देरी होने के कारण किसानों को कई बार फसल का नुकसान भी उठाना पड़ता था. अब स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण पौधे उपलब्ध होने से किसानों को समय पर पौधे मिल सकेंगे और उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी.

टिश्यू कल्चर केले की खेती

जिला उद्यान अधिकारी अवधेश मिश्रा ने कहा कि वर्ष 2023 में चिल्ला शहबाजी गांव में टिश्यू कल्चर लैब की स्थापना के बाद कौशांबी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों के केला किसानों को भी समय पर उच्च गुणवत्ता वाले टिश्यू कल्चर पौधे मिलने लगे हैं. अधिकारियों के अनुसार, आधुनिक तकनीक से लैस यह प्रयोगशाला क्षेत्र में केले की खेती को और मजबूत बनाएगी. साथ ही, किसानों की पौधों के लिए दूसरे राज्यों के आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होगी, जिससे उन्हें समय पर गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उपलब्ध हो सकेगी और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी.

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