Custard Apple Farming: ऐसे तो महाराष्ट्र संतरा, अंगूर, प्याज और गन्ना के लिए पूरे देश में मशहूर है, लेकिन लोगों को मालूम होना चाहिए कि यहां पर किसान सीताफल की खेती भी बड़े स्तर पर करते हैं. महाराष्ट्र का सीताफल अपने स्वाद और मिठास के लिए जाना जाता है. इसकी सप्लाई विदेशों में तक में होती है. यही वजह है कि महाराष्ट्र में उगाए जाने वाले बीड सीताफल को जीआई टैग भी मिला हुआ है. खास बात यह है कि जीआई टैग मिलने से बीड सीताफल का रकबा और बढ़ गया. साथ ही किसानो की कमाई में भी बढ़ोतरी हुई है.
बीड सीताफल की खेती महाराष्ट्र के बीज जिले में की जाती है. इसके चलते इसका नाम बीड सीताफल पड़ा. यह अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जाना जाता है. इसमें सिर्फ 3-4 बीज होते हैं, जबकि गूदा की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. यह देखने में सेब की तरह गोल और चमकदार हरा होता है. इसे साल 2016 में GI टैग भी मिला है. खास बात यह है कि बीड सीताफल के बीज भी काफी महंगे बिकते हैं. इससे किसानों को अच्छा मुनाफा होता है.
बीड सीताफल में 47 फीसदी तक गूदा होता है
ऐसे बीड जिले में किसान एक खास किस्म ‘एप्पल सीताफल’ की खेती करते हैं, जिसे बीड अनुसंधान केंद्र ने विकसित किया है. यह सेब जैसा दिखता है और लगभग बीज रहित होता है. इसमें करीब 47 फीसदी तक गूदा होता है, जो सफेद, मलाईदार, रसीला और बहुत मीठा होता है. इसमें 20 फीसदी से ज्यादा प्राकृतिक शर्करा पाई जाती है, जिससे इसका स्वाद और भी बेहतर हो जाता है. यह महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित और पथरीली जमीन वाले इलाकों के लिए एक बेहतरीन फसल मानी जाती है. खासकर बीड के अंबाजोगाई और धारूर की जलवायु इसके उत्पादन के लिए बहुत अनुकूल है, जिससे किसानों को अच्छी पैदावार और मुनाफा मिलता है.
24 घंटे की होती है शेल्फ लाइफ
बीड सीताफल पोषण से भरपूर होता है. इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, एंटीऑक्सीडेंट, पोटैशियम, मैग्नीशियम और कॉपर जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो पाचन में भी मदद करते हैं. हालांकि, यह जल्दी खराब होने वाला फल है और तोड़ने के बाद करीब 24 घंटे ही टिकता है. इसलिए किसान अब इसका गूदा स्टोर करके पाउडर, पेय पदार्थ और आइसक्रीम बनाने लगे हैं. धारूर क्षेत्र के सीताफल का गूदा बासुंदी, रबड़ी, जैम और जेली जैसे मिठाइयों में इस्तेमाल होता है. यह किस्म बीमारियों के प्रति भी काफी मजबूत है और देश-विदेश में इसकी अच्छी मांग है.
7000 हेक्टेयर में होती है सीताफल की खेती
ऐसे सीताफल को 16वीं सदी में पुर्तगालियों द्वारा भारत लाया गया था. धीरे-धीरे दक्कन के पठार में इसकी खेती होने लगी. महाराष्ट्र के बीड जिले में यह करीब 700 हेक्टेयर और पूरे राज्य में लगभग 7000 हेक्टेयर में उगाया जाता है. बीड के कैज, धारूर, मंजर्सुंबा, अंबाजोगाई और बालाघाट क्षेत्र इसके मुख्य उत्पादन केंद्र हैं. महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसलिए बाजार में इसकी कीमत भी उत्पादन के आधार पर तय होती है. यह फल मुंबई, पुणे, हैदराबाद, विजयवाड़ा, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों में बेचा जाता है. सीताफल बालाघाट के जंगलों और पथरीले इलाकों में भी उगता है, जहां पानी की कमी और कम बारिश होती है. यहां की मिट्टी में पोटैशियम और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व अधिक होते हैं.
5 साल बाद शुरू हो जाता है उत्पादन
सीताफल का पौधा बहुवर्षीय होता है और करीब 2 साल में 3-4 मीटर तक बढ़ जाता है. इसकी औसत उम्र लगभग 25 साल होती है. यह फल बहुत नाजुक होता है, इसलिए इसकी तुड़ाई हाथ से सावधानी के साथ की जाती है. एक पेड़ से 5 साल बाद औसतन 15 किलो फल मिलता है, जो धीरे-धीरे बढ़कर 50 किलो तक हो जाता है. बालानगर किस्म का सीताफल प्राकृतिक रूप से उगाया जाता है और इसमें मिठास ज्यादा होती है. इसमें TSS (24.49 ब्रिक्स), कुल शर्करा (20.12 फीसदी) और रिड्यूसिंग शुगर (17.97 फीसदी) की मात्रा अन्य किस्मों जैसे मैमथ और वॉशिंगटन से अधिक होती है. इससे इसका स्वाद और बेहतर हो जाता है.
किस महीने में करें सीताफल की बुवाई
सीताफल की बुआई के लिए जुलाई-अगस्त और फरवरी-मार्च का समय सबसे अच्छा माना जाता है. इसकी खेती लगभग हर तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे बेहतर होती है. खास बात यह है कि यह फसल कमजोर और पथरीली जमीन पर भी अच्छी पैदावार देती है.
बुआई के लिए पहले पॉलीथिन की थैलियों में मिट्टी भरकर बीज बोए जाते हैं. जब पौधे तैयार हो जाएं, तब उन्हें खेत में लगा दिया जाता है. इसके लिए 60×60×60 सेंटीमीटर के गड्ढे 5×5 मीटर की दूरी पर खोदें और 15-20 दिन तक खुले छोड़ दें. इसके बाद हर गड्ढे में 5-10 किलो सड़ी खाद, खली और 50 ग्राम एनपीके डालकर भर दें और 3-4 दिन तक सिंचाई करें. फिर इसमें पौधों की रोपाई कर दें.
सीताफल से जुड़े कुछ आंकड़े
- भारत में पुर्तगालियों ने 16वीं सदी में सीताफल लाया.
- महाराष्ट्र के बीड जिले में सीताफल की खेती 700 हेक्टेयर में होती है.
- पूरे महाराष्ट्र में यह फल लगभग 7000 हेक्टेयर में उगाया जाता है.
- पौधा दो साल में औसतन 3-4 मीटर ऊंचा होता है.
- सीताफल के पौधों की औसत उम्र 25 साल होती है.
- पांच साल बाद प्रति पेड़ औसतन 15 किलो फल मिलता है.
- बालानगर किस्म में TSS (ब्रिक्स) 24.49 होता है.
- बालानगर किस्म में कुल शर्करा 20.12 फीसदी और रिड्यूसिंग शुगर 17.97 फीसदी है.