Strawberry Farming : स्ट्रॉबेरी दिखने में जितनी खूबसूरत होती है, उतनी ही कमाई वाली फसल भी है. लेकिन कई किसान यह सोचकर निराश हो जाते हैं कि पौधे तो अच्छे हैं, फिर भी फल छोटे, हल्के रंग के या कम वजन वाले क्यों रह जाते हैं. असल में स्ट्रॉबेरी की खेती सिर्फ पानी और धूप से नहीं चलती, इसके लिए सही किस्म, संतुलित पोषण और सही देखभाल बहुत जरूरी होती है. अगर खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए, तो यही स्ट्रॉबेरी किसानों को शानदार मुनाफा दिला सकती है. आइए जानते हैं एक्सपर्ट के बताए कुछ आसान लेकिन असरदार टिप्स.
सही किस्म का चयन
स्ट्रॉबेरी की खेती में सबसे पहला और सबसे अहम कदम है सही किस्म का चुनाव. हर किस्म हर इलाके के लिए सही नहीं होती. बड़े, लाल और रसदार फलों के लिए चैंडलर, कैमारोसा, स्वीट चार्ली और विंटर डॉन जैसी उन्नत किस्में सबसे बेहतर मानी जाती हैं. अगर किस्म क्षेत्र और जलवायु के अनुसार चुनी जाए, तो फल का आकार, रंग और वजन अपने आप बेहतर हो जाता है. पहाड़ी या ठंडे इलाकों में कुछ किस्में ज्यादा अच्छा प्रदर्शन करती हैं, जबकि मैदानी इलाकों में दूसरी किस्में ज्यादा फायदेमंद होती हैं. इसलिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही पौध लगाएं.

स्ट्रॉबेरी की खेती
मिट्टी की तैयारी और पोषण
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, स्ट्रॉबेरी को हल्की, भुरभुरी और जैविक पदार्थों से भरपूर मिट्टी बहुत पसंद है. खेत की मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए. खेत तैयार करते समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद या वर्मी कम्पोस्ट जरूर मिलाएं. इससे मिट्टी में पोषण बढ़ता है और पौधों की जड़ें मजबूत बनती हैं. मजबूत जड़ें ही आगे चलकर बड़े और रसदार फल देने में मदद करती हैं. ध्यान रखें कि खेत में पानी भराव न हो, क्योंकि ज्यादा नमी से जड़ सड़ने और रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है.
संतुलित खाद और स्प्रे
स्ट्रॉबेरी में सही समय पर खाद देना बहुत जरूरी है. 19:19:19 एनपीके घुलनशील खाद को 1 से 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर 10-15 दिन के अंतराल पर ड्रिप या फोलियर स्प्रे करें. फूल आने से पहले पोटाश की मात्रा थोड़ा बढ़ाने से फल का आकार और वजन बेहतर होता है. इसके अलावा, कैल्शियम नाइट्रेट (1 ग्राम प्रति लीटर) और बोरॉन (0.2 ग्राम प्रति लीटर) का छिड़काव करने से फल ज्यादा बड़े, सख्त और समान आकार के बनते हैं. इससे बाजार में स्ट्रॉबेरी की मांग और कीमत दोनों बढ़ती हैं.
सिंचाई, मल्चिंग और रोग नियंत्रण
फल बनने के समय नियमित और नियंत्रित सिंचाई बेहद जरूरी होती है. ड्रिप सिंचाई सबसे बेहतर तरीका है, क्योंकि इससे मिट्टी में सही नमी बनी रहती है और फल छोटे या टेढ़े-मेढ़े नहीं होते. पॉली मल्च या भूसे की मल्चिंग करने से मिट्टी का तापमान संतुलित रहता है, नमी बनी रहती है और खरपतवार भी कम उगते हैं. समय-समय पर जरूरत के अनुसार फफूंदनाशक और कीटनाशक का संतुलित इस्तेमाल करें, ताकि पौधे स्वस्थ रहें और फल खराब न हों.