‘संतुलन’ ही प्रकृति का शाश्वत सत्य है. यह बात खेती से लेकर प्रकृति से जुड़ी प्रत्येक चित्र विचित्र घटना पर लागू होती है. मौजूदा दौर में पूरी पृथ्वी पर प्राकृतिक असंतुलन के संकट की छाया है. इस संकट को शिद्दत से महसूस किए जा रहे ’जलवायु परिवर्तन’ के रूप में चिन्हित किया गया है. पिछले एक दशक से यह महसूस हो रहा है कि धरती का मौसम करवट ले रहा है. सही मायने में देखा जाए तो यह जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि जलवायु असंतुलन है. इसकी धुरी वर्षा चक्र पर टिकी है.
हम सब जानते हैं कि धरती के प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र में, कितने समय तक, कितनी मात्रा में बारिश होगी, इसका निर्धारण उस क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन से जुड़ी भूस्थैतिक परिस्थितियों के आधार पर तय होता है. यही उस क्षेत्र विशेष का ’वर्षा चक्र’ कहलाता है. प्रकृति का यही एकमात्र मानक है जो प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र के जलवायु संतुलन का निर्धारण करता है. कथित विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन के स्वरूप में किया जा रहा बदलाव ही जलवायु परिवर्तन का वाहक बन रहा है. इसके फलस्वरूप वर्षा चक्र में हो रहे बदलाव को जलवायु असंतुलन के संकट के रूप में इन दिनों मध्य प्रदेश में साल के जंगल महसूस कर रहे हैं. इस संकट को हमारे वैज्ञानिकों ने ’साल बोरर’ नाम दिया है.
तेजी से जंगलों का सफाया कर रहा साल बोरर कीट
साल बोरर एक ऐसा कीट है, जो तेजी से साल के जंगलों का सफाया कर रहा है. वैज्ञानिकों ने इस कीट के रोमांच से भरे रोचक जीवन चक्र को डीकोड कर लिया है, जो पूरी तरह से वर्षा चक्र के संतुलन पर ही टिका है. यह कीट बारिश से पनपने वाली नमी के असंतुलित होते ही जन्म लेता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह संकट सिर्फ साल बोरर या साल के जंगलों तक ही सीमित नहीं है. धरती के सभी वन क्षेत्रों में तथाकथित विकास के कारण पनप रहे जलवायु असंतुलन ने साल बोरर जैसे तमाम संकट पैदा कर दिए है. फिलहाल बात साल बोरर से उपजे संकट की, जो इस कीट के प्रजनन तंत्र पर अवलंबित है.
प्रकृति की व्यवस्था के तहत किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में वायुमंडल की आर्द्रता (Humidity) बारिश की मात्रा पर निर्भर करती है. वैज्ञानिक शोध में साबित हो चुका है कि जब साल के किसी जंगल में वायुमंडल की आर्द्रता लगभग 55 प्रतिशत होती है, तब ही मादा साल बोरर कीट अंडे देती है. लेकिन आर्द्रता 100 फीसदी होने पर मादा साल बोरर के अंडे देने की क्षमता का क्षरण हो जाता है. इससे यह रोचक बात स्पष्ट हो जाती है कि साल के जंगलों का वजूद और इस कीट का जीवन चक्र पूरी तरह से वर्षा चक्र पर टिका है, जो आर्द्रता के स्तर को निर्धारित करता है. ऐसे में एक रोचक बात यह भी उभर कर सामने आती है कि साल के जंगल फलने फूलने के लिए बारिश की उतनी ही मात्रा जरूरी है, जिससे नमी का स्तर 55 से 100 फीसदी की सीमा में बना रहे.
साल बोरर की आबादी को काबू में करने में जुटी वैज्ञानिकों की टीम
अब बात उस वैज्ञानिक सोच की जो साल के जंगलों को बचाने के लिए प्रकृति द्वारा निर्धारित आर्द्रता के इस संतुलन को बनाए रखने के बजाय साल बोरर की आबादी को काबू में करने में जुटी है. दरअसल जल, जंगल और जमीन के संतुलन को बिगाड़ रही हमारी तथाकथित विकास की बेकाबू हो चुकी हवस को काबू में करना विज्ञान के बूते से बाहर हो गया है. इसलिए हमारे वैज्ञानिकों ने मादा साल बोरर को अंडे देने से रोकने के लिए ऐसे रोचक तरीके खोज लिए हैं, जो उसे नर साल बोरर से मिलने ही नहीं देते हैं.
मध्य प्रदेश में राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई) के वैज्ञानिक साल बोरर पर बीते कुछ सालों से लगातार निगरानी कर रहे हैं. इस दौरान पता चला है कि साल 2025 में बारिश की अधिकता के कारण साल बोरर के पनपने की भूमिका बन गई है. संस्थान के वैज्ञानिकों ने बताया है कि मादा साल बोरर को अंडे देने के लिए वायुमंडल में लगभग 80 प्रतिशत आर्द्रता का होना सबसे अनुकूल होता है.
साल के जंगलों की प्रचुरता वाले डिंडोरी इलाके में साल 2014 से 2024 के दौरान वैज्ञानिकों ने यह बात दर्ज की है कि वायुमंडल की आर्द्रता यदि 55 प्रतिशत से कम होती है तो मादा कीट अंडे नहीं देती है. इसी प्रकार यदि आर्द्रता 100 प्रतिशत होने पर भी मादा अंडे नहीं देती है. वायुमंडल में आर्द्रता का स्तर 91 प्रतिशत होने पर मादा कीट द्वारा औसतन 465 अंडे देने की बात सामने आई है. साल के जंगलों से आच्छादित अमरकंटक इलाके में पिछले वर्ष जुलाई अगस्त में आर्द्रता 91 प्रतिशत दर्ज की गई. इससे यहां साल बोरर मादा ने भरपूर अंडे दिए. इसी तरह 1995 से 1997 के दौरान भी मंडला जिले में 90 फीसदी से अधिक आर्द्रता रहने के कारण उस समय मंडला के जंगलों में साल बोरर महामारी के रूप में फैला.
मध्य प्रदेश में साल बोरर कीट के पनपने की अनुकूल परिस्थितियां
अब साल 2025 में भी अनूपपुर, डिंडोरी और मंडला जिलों में सामान्य से 33 प्रतिशत तक अधिक बारिश दर्ज हुई है. इससे इन जिलों में साल बोरर कीट के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन गईं. वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया है कि प्री मॉनसून के बजाए यदि पोस्ट मॉनसून बारिश ज्यादा होती है तो यह साल बोरर के पनपने के लिए ज्यादा मुफीद है. साल बोरर का जीवन चक्र जून-जुलाई के मॉनसून सीजन के साथ ही शुरू हो जाता है. इस सीजन में साल बोरर कीट जंगल में उड़ने लगते हैं. जंगल में जब धूप कम पहुंचे तो नमी अधिक हो जाती है. इससे जंगल बहुत घना हो जाता है. ऐसे में साल बोरर की संख्या बढ़ती है, इस कीट का पूरा जीवन-चक्र साल के पेड़ पर ही निर्भर करता है. साल 2025 में मॉनसून सामान्य से अधिक रहा है. साथ ही पोस्ट मॉनसून में भी बहुत बारिश हुई. इसलिए साल बोरर का प्रकोप बढ़ गया है.
इसके साथ ही साल बोरर के प्रकोप को काबू में करने के वैज्ञानिक उपाय तेज हो जाते हैं. इसके लिए फिलहाल दो विधियां प्रचलित हैं. वैज्ञानिकों की नजर में सबसे कारगर उपाय “ट्री ट्रैप ऑपरेशन” है. इसके अंतर्गत वयस्क कीट को पकड़ने का काम किया जाता है, ताकि वह मादा से न मिल सके. इसके लिए जून-जुलाई के महीने में वर्षा शुरू होने के बाद जब नर कीट वृक्ष से बाहर निकलते हैं, तो उनको पकड़ने के लिए साल के 60 से 90 सेमी गोलाई वाले वृक्षों को काट कर 2 से 3 मीटर लम्बे लट्ठे बनाए जाते हैं.
इन लट्ठों के दोनों किनारों पर 1-1 फीट हिस्से में छाल को पीट दिया जाता है, जिससे साल की छाल में मौजूद रस बाहर निकलने लगता है. इस रस की ओर तेजी से आकर्षित होकर नर साल बोरर 1 किमी तक से आकर उसे चूसने लगते हैं. रस चूसकर नर साल बोरर इतने मदमस्त हो जाते हैं कि फिर वे उड़ भी नहीं पाते है. इस दौरान इन्हें कीटनाशक छिडककर आसानी से मार दिया जाता है. जंगल में यदि इस कीट का प्रकोप सामान्य है, तो 2 हेक्टेयर क्षेत्र में एक ट्रैप लगाना पर्याप्त होता है, लेकिन कीट का प्रकोप अधिक होने पर 2 हेक्टेयर क्षेत्र में एक से अधिक ट्रैप लगाने पड़ते हैं.
कीट प्रबंधन के लिए बड़े पैमाने पर साल के स्वस्थ पेड़ों को काटना पड़ रहा
कीट प्रबंधन की इस विधि का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसमें बड़े पैमाने पर साल के स्वस्थ पेड़ों को काटना पड़ता है. इसी कारण प्रकृति प्रेमियों ने 1996 से 2001 के दौरान इस विधि के प्रयोग का भारी विरोध किया था. सरकारी रिकार्ड के मुताबिक अकेले डिंडोरी में इस विधि को अमल में लाए जाने के कारण 2.36 लाख साल के पेड़ काटे गए. इस विधि से इतर बिजली की रोशनी में भी साल बोरर कीड़े पकडे जाते हैं. चूकि रात में तेज रोशनी से ये कीट आकर्षित होते हैं, इसलिए डिंडोरी जिले के वन क्षेत्र में बसे ग्रामीण प्रकाश विधि से काफी संख्या में कीड़े पकड़ लेते हैं.
सन 1960 के दशक से साल बोरर के प्रकोप का संकट बरकरार है. इसके प्रबंधन के लिए जैविक और रासायनिक उपाय अब तक कारगर साबित नहीं हो पाए हैं. वैज्ञानिकों ने भी ताकीद की है कि डिंडोरी में अगर साल बोरर का प्रकोप इसी तरह रहा, तो आने वाले 4–5 सालों में साल का पूरा जंगल खत्म हो जाएगा. हालात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल बोरर के प्रकोप के मद्देनजर वैज्ञानिकों ने नीतिगत सुझावों का एक दस्तावेज तैयार कर लिया है. इसमें कहा गया है कि साल बोरर केे अत्यधिक संक्रमण से प्रभावित पेड़ों को काटकर तुरंत जंगल से हटाया जाए. ताकि संक्रमण अधिक न फैले. कटे पेड़ों को जंगल में छोड़ने के बजाय कम से कम 5 किलोमीटर दूर निर्धारित डिस्पोजल जोन में ले जाकर नष्ट किया जाए.
जंगलों में चयनित पेड़ों से ट्रैप ट्री ऑपरेशन चलाया जाए
वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि मॉनसून से पहले साल के जंगलों में चयनित पेड़ों से ट्रैप ट्री ऑपरेशन चलाया जाए और इन पेड़ों को संक्रमित होने के बाद समय से हटा दिया जाए. जिससे इसका प्रजनन चक्र टूट सके. जैविक उपायों के तौर पर साल बोरर को खाने वाले पक्षी कठफोड़वा का संरक्षण किया जाए. साथ ही माइनर सहित अन्य प्रमुख पैरासिटॉइड्स के संरक्षण के लिए बायोशील्ड जोन विकसित किए जाए. इस संकट से उबरने के लिए वैज्ञानिकों ने दीर्घकालिक उपाय भी सुझाए हैं.
इनके तहत साल बोरर के अत्यधिक प्रकोप वाले जंगलों में मिश्रित प्रजाति के देसी पेड़ जैसे पीपल, बरगद, जामुन, तेंदू, करंज और अर्जुन लगाए जाएं. क्योंकि साल बोरर का प्रकोप मिश्रित वनों पर कम होता है. इस दिशा में प्रशासनिक सुधारों के रूप में कमिश्नर की अध्यक्षता में साल बोरर क्राइसिस टास्क फोर्स का गठन करके सघन अभियान चलाने की जरूरत पर भी बल दिया गया है. इन सब उपायों को करते हुए दिमाग में रखने वाली गौरतलब बात यह है कि साल बोरर केवल वन्यजीव समस्या नहीं है बल्कि यह पूरी पारिस्थितिकी तंत्र, जल स्रोतों और जैव विविधता के लिए खतरा है. इसका समाधान वैज्ञानिक हस्तक्षेप, सामुदायिक भागीदारी और सख्त प्रशासनिक कार्रवाई के संयुक्त मॉडल से ही मुमकिन हो सकता है. आखिरकार सरकार, समाज और वैज्ञानिकों को भी प्रकृति के मूलभूत सिद्धांत को समझना होगा जो यह बताता है कि प्राकृतिक न्याय के तराजू में सह अस्तित्व और संतुलन नामक दो ही पलडे होते हैं.