60 दिनों में तैयार हो जाता है यह धान, कमर दर्द और लकवा के इलाज में इस्तेमाल होता है भूसी का तेल
केरल का पारंपरिक नवरा चावल देश का पहला GI टैग प्राप्त धान है. आयुर्वेद में इसका विशेष महत्व है और इसे पौष्टिक व औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है. यह धान सिर्फ 60 दिनों में तैयार हो जाता है और इसकी खेती मानसून के दौरान चिकनी, पानी रोकने वाली मिट्टी में की जाती है.
Rice Cultivation: जब बेहतरीन धान की किस्मों की बात होती है, तो अक्सर पश्चिम बंगाल और तेलंगाना का नाम लिया जाता है. लेकिन केरल भी एक ऐसी पारंपरिक धान की किस्म के लिए मशहूर है, जिसकी पहचान देश ही नहीं, विदेशों तक है. इस खास किस्म का नाम नवरा चावल है. आयुर्वेद में इस्तेमाल होने वाला यह चावल अपने औषधीय गुणों, पोषण और खास विशेषताओं के कारण किसानों और उपभोक्ताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. खास बात यह है कि नवरा चावल महज दो महीने में ही पककर तैयार हो जाता है.
दरअसल, नवरा चावल केरल की एक खास धान की किस्म है, जिसका आयुर्वेद में लंबे समय से इस्तेमाल किया जा रहा है. इसे पौष्टिक और ऊर्जा देने वाला भोजन माना जाता है. इसका सेवन छोटे बच्चों, स्तनपान कराने वाली माताओं से लेकर बुजुर्गों तक के लिए लाभकारी माना जाता है. नवरा चावल को साल 2007 में भारत का पहला कृषि उत्पाद बनने का गौरव मिला, जिसे भौगोलिक संकेत (GI) टैग दिया गया. इसके बाद यह दुनिया के प्रसिद्ध GI उत्पादों जैसे बासमती चावल, दार्जिलिंग चाय और शैंपेन की श्रेणी में शामिल हो गया.
नवरा चावल की देश-विदेश में खास पहचान
शुरुआत में नवरा इको फार्म के मालिक पी. नारायणन उन्नी ने GI टैग के लिए आवेदन किया था, लेकिन इसे यह कहकर खारिज कर दिया गया कि आवेदन केवल एक व्यक्ति तक सीमित है. इसके बाद उन्होंने पलक्कड़ और आसपास के जिलों के नवरा चावल उगाने वाले किसानों, केरल कृषि विश्वविद्यालय, राइस मिल मालिकों, व्यापारियों और नाबार्ड (NABARD) के सहयोग से सभी हितधारकों को साथ लेकर दोबारा आवेदन किया. इस पहल के बाद नवरा चावल को GI टैग मिला और यह प्रक्रिया बाद में अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी एक उदाहरण बन गई. आज नवरा चावल अपनी औषधीय विशेषताओं और पारंपरिक पहचान के कारण देश-विदेश में खास पहचान रखता है.
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नवरा चावल का इतिहास करीब 2,000 साल पुराना
नवरा चावल का इतिहास करीब 2,000 साल पुराना माना जाता है. संस्कृत में इसे ‘षष्टिक’ (Shashtika) कहा जाता है, जिसका अर्थ है 60 दिनों में तैयार होने वाली फसल. इसका उल्लेख प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम् में भी मिलता है. नवरा चावल की दो प्रमुख किस्में होती हैं- सफेद भूसी वाला (White-glumed) और काली भूसी वाला (Black-glumed). आयुर्वेद में सफेद नवरा को औषधीय दृष्टि से अधिक प्रभावी माना जाता है, जबकि काली किस्म का भी सदियों से विभिन्न आयुर्वेदिक उपचारों में उपयोग होता रहा है.
नवरा चावल में फाइबर और प्रोटीन की प्रचूर मात्रा
नवरा चावल में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन-बी, आयरन, जिंक और जटिल कार्बोहाइड्रेट अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट, पॉलीफेनॉल और फ्लेवोनॉयड्स जैसे पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं. यही वजह है कि इसे पौष्टिक, आसानी से पचने वाला और हर उम्र के लोगों के लिए फायदेमंद भोजन माना जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, नवरा चावल का आटा गुड़ और दूध के साथ पकाकर छोटे बच्चों के लिए पौष्टिक आहार के रूप में दिया जाता है. इसे बाजार में मिलने वाले कई प्रोसेस्ड बेबी फूड का प्राकृतिक विकल्प भी माना जाता है.
कमर दर्द और लकवा में तेल का इस्तेमाल
गर्भवती महिलाओं के लिए नवरा चावल और मांस का सूप लाभकारी माना जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, यह गर्भ में पल रहे शिशु के स्वस्थ विकास और वजन बढ़ाने में मदद कर सकता है. दूध और औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ पकाए गए नवरा चावल का उपयोग शरीर के अंदरूनी घावों के उपचार में भी किया जाता है. वहीं, नवरा चावल की भूसी (ब्रान) से निकाला गया तेल सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, कमर दर्द, लकवा और रुमेटाइड आर्थराइटिस जैसी समस्याओं के आयुर्वेदिक उपचार में इस्तेमाल होता है.
जून से अगस्त के बीच होती है खेती
नवरा चावल की खेती के लिए जून से अगस्त के बीच का मानसून का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. इसकी अच्छी पैदावार के लिए खेत में 20 से 30 सेंटीमीटर तक पानी भरा होना चाहिए. इसकी खेती के लिए चिकनी और पानी रोकने की क्षमता वाली उपजाऊ मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है. नवरा चावल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ 60 दिनों में तैयार हो जाता है. यही वजह है कि इसे धान की जल्दी पकने वाली किस्मों में गिना जाता है.