आग की नहीं पड़ती जरूरत, ठंडे पानी में भिगोने पर ही तैयार हो जाता यह चावल.. नाम है मैजिक राइस

असम का प्रसिद्ध चोकुवा चावल, जिसे ‘मैजिक राइस’ कहा जाता है, अपनी अनोखी खूबियों के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. GI टैग प्राप्त इस पारंपरिक चावल को पकाने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि पानी में भिगोकर खाया जा सकता है. सांस्कृतिक महत्व, बेहतर मांग और खास स्वाद के कारण यह किसानों के लिए लाभदायक फसल बन रहा है.

Kisan India
नोएडा | Published: 5 Jul, 2026 | 07:02 PM

Assam Paddy Cultivation: पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सहित लगभग पूरे देश में धान की रोपाई शुरू हो गई है. हर राज्य में किसान अलग-अलग किस्म के धान की बुवाई कर रहे हैं. लेकिन असम में किसानों के बीच चोकुवा चावल बहुत ही तेजी से मशहूर हो रहा है. हर साल की तरह इस बार भी यह किसानों का फेवरिट बना हुआ है, क्योंकि चोकुवा चावल को जो जीआई टैग प्राप्त है. इसके बाद से इसकी मांग पूरे राज्य में बढ़ गई है. खास बात यह है कि इस चावल को गर्म पानी में पकाने की जरूरत नहीं पड़ती है. ठंडे पानी में ही यह पक कर तैयार हो जाता है.

असम का पारंपरिक चोकुवा चावल को साल 2023 में आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेतक  (GI) टैग मिला है. अपनी खास खूबियों के कारण यह चावल मैजिक राइस के नाम से भी जाना जाता है. जीआई टैग मिलने से इस अनोखी चावल किस्म की पहचान और प्रतिष्ठा को राष्ट्रीय स्तर पर नई मजबूती मिली है. चोकुवा चावल असम की सांस्कृतिक और खाद्य परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. इसका इतिहास भी काफी पुराना है और इसका संबंध असम के प्रसिद्ध अहोम राजवंश से बताया जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से इस चावल की मांग बढ़ी है.

चावल को उबाला और सुखाया जाता है

चोकुवा चावल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पकाने की जरूरत नहीं होती. पहले चावल को उबाला और सुखाया जाता है, फिर भंडारित किया जाता है. खाने से पहले इसे केवल ठंडे या गुनगुने पानी में कुछ समय के लिए भिगोना पड़ता है, जिसके बाद यह नरम होकर खाने योग्य हो जाता है. असम में लोग इसे दही, चीनी, गुड़ और केले के साथ खाना पसंद करते हैं. इसके अलावा, इसका उपयोग कई पारंपरिक असमिया व्यंजनों, खासकर पीठा बनाने में भी किया जाता है. आसान उपयोग और पौष्टिक गुणों के कारण चोकुवा चावल को मैजिक राइस के नाम से भी जाना जाता है.

जून-जुलाई में की जाती है बुवाई

चोकुवा चावल असम की एक पारंपरिक सर्दियों की फसल है, जिसकी बुवाई आमतौर पर जून-जुलाई में की जाती है और कटाई अक्टूबर-नवंबर में होती है. इसकी खेती तिनसुकिया, धेमाजी, डिब्रूगढ़, लखीमपुर, शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट, नागांव, मोरीगांव और सोनितपुर समेत कई जिलों में की जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार, असम की पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियां और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु चोकुवा चावल की खेती  के लिए बेहद अनुकूल हैं. यहां गर्म और नम गर्मियां, ठंडी सर्दियां, जून से सितंबर तक अच्छी बारिश तथा फास्फोरस, पोटाश, नाइट्रोजन और कार्बनिक तत्वों से भरपूर अम्लीय मिट्टी इस फसल की बेहतर वृद्धि में मदद करती है. यही वजह है कि चोकुवा चावल की गुणवत्ता और स्वाद इसे अन्य चावल किस्मों से अलग बनाते हैं.

चोकुवा चावल का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी

असम में चोकुवा चावल का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी काफी अधिक है. बिहू जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है और कई मंदिरों में इसे प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता है. ऊर्जा से भरपूर और आसानी से तैयार होने के कारण यह पहले सैनिकों और यात्रियों का पसंदीदा भोजन माना जाता था. कई परिवार और गांव पीढ़ियों से इसकी खेती और प्रसंस्करण से जुड़े हुए हैं. खास बात यह है कि आपदा या प्राकृतिक संकट के समय, जब खाना पकाने की सुविधा उपलब्ध नहीं होती थी, तब भी यह चावल लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत साबित होता था. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इसकी औसत उपज लगभग 2.5 टन प्रति हेक्टेयर है.

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