Jackfruit Farming: कटहल की खेती करने वाले किसानों के लिए एक आम लेकिन गंभीर समस्या है कि छोटे फलों का समय से पहले गिरना. यह समस्या न केवल उत्पादन को प्रभावित करती है, बल्कि किसानों की मेहनत पर भी पानी फेर देती है. हालांकि अब कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने इसके पीछे के कारण और समाधान स्पष्ट कर दिए हैं, जिससे किसान समय रहते अपनी फसल को बचा सकते हैं.
क्यों गिरते हैं कटहल के छोटे फल?
कटहल के पेड़ों में फल गिरने की मुख्य वजह फफूंद जनित संक्रमण मानी जाती है. जब वातावरण में नमी अधिक होती है, तो फफूंदी तेजी से फैलती है और कोमल फलों पर हमला करती है. इससे फल काले पड़ने लगते हैं और गिर जाते हैं. इसके अलावा, कीटों द्वारा फलों में छेद करना भी एक बड़ा कारण है. इन छेदों से निकलने वाला दूध जैसा पदार्थ फफूंदी को और तेजी से फैलने में मदद करता है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, यदि समय रहते इन लक्षणों की पहचान कर ली जाए, तो नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है.
बोर्डो मिश्रण
कटहल में फफूंद नियंत्रण के लिए बोर्डो मिश्रण आज भी एक भरोसेमंद उपाय माना जाता है. यह कॉपर आधारित मिश्रण फफूंद को रोकने में बेहद प्रभावी होता है. विशेषज्ञ का सुझाव है कि इस मिश्रण का छिड़काव केवल पत्तियों और फलों पर ही नहीं, बल्कि पेड़ के तनों पर लेप के रूप में भी किया जाए. इससे संक्रमण की जड़ तक पहुंचकर उसे नियंत्रित किया जा सकता है. डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, सही अनुपात और तकनीक से तैयार किया गया बोर्डो मिश्रण कटहल के पेड़ों को लंबे समय तक सुरक्षित रखता है.
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सही छिड़काव तकनीक से मिलेगा बेहतर परिणाम
कटहल का पेड़ आकार में बड़ा होता है और इसके फल केवल शाखाओं पर ही नहीं, बल्कि तनों पर भी लगते हैं. ऐसे में सामान्य स्प्रेयर से छिड़काव करना पर्याप्त नहीं होता. लंबी नली वाले स्प्रेयर का उपयोग करने से दवा पेड़ के हर हिस्से तक पहुंचती है. इससे फफूंद का प्रभावी नियंत्रण संभव होता है. छिड़काव करते समय यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि दवा सभी फलों और तनों पर समान रूप से लगे.
वैकल्पिक उपाय और किसानों के लिए जरूरी सलाह
यदि बोर्डो मिश्रण उपलब्ध न हो या उसे तैयार करना कठिन लगे, तो ताम्रयुक्त (कॉपर आधारित) फफूंदनाशी का उपयोग किया जा सकता है. इसके लिए 2 ग्राम दवा को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें. यह प्रक्रिया 15 दिनों के अंतराल पर कम से कम दो बार दोहरानी चाहिए. कृषि वैज्ञानिक का मानना है कि नियमित निगरानी और संतुलित देखभाल से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. समय पर रोग की पहचान और सही उपचार से न केवल फल गिरने की समस्या कम होती है, बल्कि उत्पादन में भी वृद्धि होती है.