Mircha Dhan: चंपारण के मर्चा धान की दुनिया में धूम, GI टैग मिलते ही 2 साल में तीन गुना बढ़े दाम

बिहार के पश्चिम चंपारण का मर्चा धान आज दुनिया भर में अपनी अनोखी खुशबू के लिए मशहूर है. GI टैग मिलने के बाद इसकी कीमत 150 रुपये किलो तक पहुंच गई है. केवल विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में उपजने वाली इस फसल ने हजारों किसानों की आय बढ़ाकर उनकी तकदीर बदल दी है.

नोएडा | Published: 30 Jan, 2026 | 10:50 AM

Mircha Dhan : बिहार की मिट्टी में कुछ तो ऐसी बात है जो यहां उगने वाली चीजे दुनिया भर में तहलका मचा देती हैं. आज हम बात कर रहे हैं मर्चा धान की, जो केवल फसल नहीं बल्कि चंपारण के किसानों के लिए साक्षात लक्ष्मी बन गई है. इस खास धान से बनने वाले चिउड़ा की खुशबू ऐसी है कि एक बार आप सूंघ लें, तो बासमती को भी भूल जाएंगे. जब से इसे GI टैग (Geographical Indication) मिला है, इसकी मांग और कीमत दोनों ने आसमान छू लिया है.

2 साल में मालामाल हुए किसान, 3 गुना बढ़ गए दाम

कहते हैं कि अगर चीज में दम हो तो उसकी कीमत खुद-ब-खुद बढ़ जाती है. मर्चा धान के साथ भी यही हुआ. 2023 में GI टैग मिलने से पहले जो चिउड़ा 40 से 50 रुपये किलो बिकता था, आज उसकी कीमत 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है. महज दो साल के भीतर कीमत तीन गुना  बढ़ना किसी चमत्कार से कम नहीं है. अब किसानों को अपनी मेहनत का असली मोल मिल रहा है और उनकी आमदनी में ज़बरदस्त उछाल आया है.

सिर्फ इन 6 जगहों पर ही पैदा होती है असली खुशबू

मर्चा धान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे आप हर कहीं नहीं उगा सकते. वैज्ञानिकों ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है कि इसका खास अरोमा यानी खुशबू सिर्फ पश्चिम चंपारण के 6 प्रखंडों (चनपटिया, लॉरिया, नरकटियागंज, मैनाटॉड, गौनाहा और रामनगर) की मिट्टी में ही निकलती है. अगर इसे जिले के किसी दूसरे हिस्से या राज्य में लगाने की कोशिश की जाए, तो धान तो पैदा हो जाता है, लेकिन वो मशहूर खुशबू गायब हो जाती है. इसीलिए यह धान पूरी दुनिया में सिर्फ चंपारण की ही पहचान बनकर रह गया है.

बासमती से भी तेज महक और पचाने में सबसे आसान

मर्चा धान का चिउड़ा न केवल स्वाद में लाजवाब है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बहुत हल्का है. इसकी खुशबू बासमती चावल से भी अधिक प्रभावी होती है. लोग इसे केवल खाने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे को तोहफे (Gift) के रूप में देने के लिए भी खरीदते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि यह चिउड़ा बहुत आसानी से पच जाता है, जिसकी वजह से हर उम्र के लोग इसे पसंद करते हैं.

चंपारण के खेतों से दुबई-अमेरिका तक का सफर

भले ही यह धान बिहार  के एक छोटे से कोने में उपजता हो, लेकिन इसकी चर्चा सात समंदर पार तक है. चंपारण के किसान बताते हैं कि GI टैग मिलने से पहले भी इसके चाहने वाले दुबई और अमेरिका जैसे देशों में मौजूद थे. अब तो सरकारी मोहर लगने के बाद इसकी डिमांड विदेशों में कई गुना बढ़ गई है. बिहार का यह चिउड़ा आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर रहा है.

खेती का रकबा बढ़ा, 2000 से ज्यादा किसान जुड़े

फायदे को देखते हुए मर्चा धान की खेती करने वाले किसानों  की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुई है. जहां पहले इसकी खेती सिर्फ 700 एकड़ में होती थी, वहीं अब यह बढ़कर 1000 एकड़ से ऊपर पहुंच गई है. साल 2025 के आंकड़ों की मानें तो 2000 से अधिक किसान इस बार मर्चा धान की फसल लहलहा रहे हैं. जैसे-जैसे मांग बढ़ रही है, चंपारण के किसान पारंपरिक खेती छोड़कर इस नगदी फसल की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं.

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