Paddy Procurement : बिहार में धान की सरकारी खरीद एक बार फिर सवालों के घेरे में है. सरकार जहां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों को फायदा देने का दावा कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है. सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर बिचौलिये और कुछ प्रभावशाली लोग किसानों के हक पर डाका डाल रहे हैं. कागजों में सब कुछ पारदर्शी दिखता है, लेकिन खेत से क्रय केंद्र तक पहुंचते-पहुंचते किसान नुकसान में चला जा रहा है.
लक्ष्य बड़ा, लेकिन आधी राह भी मुश्किल
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस साल बिहार में 36.85 लाख टन धान खरीद का लक्ष्य तय किया गया है. इसके मुकाबले अब तक करीब 18.76 लाख टन धान की ही खरीद हो पाई है. केंद्र सरकार ने 28 फरवरी तक धान खरीद की समय-सीमा तय की है. समय तेजी से बीत रहा है, लेकिन कई इलाकों में किसान अब भी अपनी फसल बेचने के लिए भटक रहे हैं. कहीं पंजीकरण की दिक्कत है तो कहीं बायोमीट्रिक मशीन काम नहीं कर रही.
छोटे किसानों के नाम पर बड़ा खेल
मीडिया रिपोर्ट्स में सबसे गंभीर आरोप यह सामने आ रहा है कि छोटे किसानों के नाम पर ज्यादा धान की खरीद कागजों में दिखा दी जा रही है. आशंका है कि बिचौलिये और व्यापारियों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हो रहा है. जिन किसानों के पास सीमित जमीन है, उनके नाम पर रिकॉर्ड में बड़ी मात्रा में धान बेचा दिखाया जा रहा है, जबकि असल में वह धान बाजार से उठाया गया होता है.
MSP बढ़ी, लेकिन किसान को पूरा दाम नहीं
वर्ष 2025-26 में धान का MSP 2,369 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जो पिछले साल 2,300 रुपये था. कागजों में यह राहत की खबर है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात उलट हैं. मुंगेर, जमुई, सहरसा, कटिहार और रोहतास जैसे जिलों से शिकायतें आ रही हैं कि बिचौलिये किसानों से 2,100 से 2,200 रुपये प्रति क्विंटल में धान खरीद रहे हैं. पंजीकरण और भुगतान में देरी से परेशान किसान मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर हो रहे हैं.
भुगतान हुआ, फिर भी भरोसा डगमगाया
सरकार ने 6,870 पैक्सों और 500 से ज्यादा व्यापार मंडलों के जरिए धान खरीद की व्यवस्था की है. अब तक 2.69 लाख किसानों ने सरकारी केंद्रों पर धान बेचा है. इनमें से 92 प्रतिशत से ज्यादा किसानों को भुगतान हो चुका है. आंकड़े अच्छे दिखते हैं, लेकिन सवाल यह है कि जिन किसानों तक सिस्टम सही से पहुंच ही नहीं पाया, उनका क्या?
निरीक्षण हुए, लेकिन असर सीमित
सहकारिता मंत्री के अनुसार, 23-24 जनवरी को सभी 38 जिलों में राज्यव्यापी निरीक्षण अभियान चलाया गया. करीब 800 अधिकारियों ने पैक्स और व्यापार मंडलों का निरीक्षण किया. मकसद था पारदर्शिता और निगरानी, लेकिन जानकारों का कहना है कि ये निरीक्षण अक्सर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं. स्थानीय स्तर पर दबंग पैक्स अध्यक्षों और दलालों का दबदबा आज भी बना हुआ है.
पुराना रिकॉर्ड बताता है नई चिंता
पिछले छह वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि 2021-22 में 97.98 प्रतिशत लक्ष्य हासिल हुआ था, जो सबसे बेहतर रहा. वहीं 2023-24 में सिर्फ 68.42 प्रतिशत ही धान खरीदा जा सका. मौजूदा सीजन में 88.89 प्रतिशत खरीद दर्ज की गई है, लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर खरीद के बाद गोदामों में रखे धान की सख्त जांच हुई, तो गड़बड़ी के आंकड़े और बढ़ सकते हैं.
सिस्टम सुधरा तो ही किसान बचेगा
कुल मिलाकर धान खरीद की पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता का दावा और जमीनी सच्चाई के बीच बड़ा अंतर दिख रहा है. जब तक पंजीकरण, बायोमीट्रिक, भुगतान और निगरानी की व्यवस्था मजबूत नहीं होती, तब तक बिचौलियों पर लगाम लगाना मुश्किल होगा. किसान आज भी उम्मीद लगाए बैठा है कि उसे उसकी फसल का पूरा दाम समय पर मिल सके.