Potato Crop Disease: आलू की खेती करने वाले किसानों के लिए महत्वपूर्ण खबर है. केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने आलू की फसल में पिछेता झुलसा (Late Blight) बीमारी को लेकर चेतावनी जारी की है. संस्थान के वैज्ञानिकों ने मौसम की मौजूदा परिस्थितियों का आकलन करने के बाद बताया है कि, आने वाले दिनों में इस बीमारी का खतरा बढ़ सकता है. इसके लिए संस्थान के इंडो-ब्लाइटकास्ट (Pan India) मॉडल की मदद से पूर्वानुमान तैयार किया गया है.
पिछेता झुलसा आलू की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक मानी जाती है. अगर समय पर इसका नियंत्रण नहीं किया जाए तो यह बहुत कम समय में पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है. ऐसे में किसानों को अभी से सतर्क रहने और जरूरी उपाय अपनाने की सलाह दी गई है.
क्या है पिछेता झुलसा बीमारी?
पिछेता झुलसा एक फफूंद जनित रोग है, जो खासतौर पर ठंडे और नम मौसम में तेजी से फैलता है. इस बीमारी के कारण आलू के पौधों की पत्तियां, तने और कंद प्रभावित हो सकते हैं. शुरुआत में पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे पौधे में फैल जाते हैं. अगर समय पर रोकथाम नहीं की जाए तो उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है.
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अगर खेत में बीमारी दिखाई दे तो क्या करें?
जिन खेतों में पिछेता झुलसा रोग के लक्षण दिखाई देने लगे हैं, वहां तुरंत उपचारात्मक छिड़काव करने की जरूरत है. वैज्ञानिकों ने कई प्रभावी फफूंदनाशकों के उपयोग की सलाह दी है, जिनका प्रयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किया जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि बीमारी दिखाई देने के बाद देरी करना फसल के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है. इसलिए लक्षण दिखते ही तुरंत नियंत्रण उपाय शुरू करना जरूरी है. वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि जिन किसानों की फसल में अभी तक पिछेता झुलसा के लक्षण नहीं दिखाई दिए हैं वे तुरंत बचावात्मक कदम उठाएं. इसके लिए मैन्कोजेब या क्लोरोथलोनील युक्त फफूंदनाशक का छिड़काव किया जा सकता है.
एक ही दवा बार-बार न करें इस्तेमाल
संस्थान ने किसानों को सलाह दी है कि, फफूंदनाशकों का छिड़काव लगभग 10 दिन के अंतराल पर दोहराया जा सकता है. हालांकि बीमारी की गंभीरता और मौसम की स्थिति को देखते हुए इस अंतराल में बदलाव किया जा सकता है. साथ ही एक ही फफूंदनाशक का लगातार उपयोग नहीं करना चाहिए. दवाओं को बदल-बदलकर इस्तेमाल करने से रोग पर बेहतर नियंत्रण मिलता है और फफूंद में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने का खतरा कम रहता है. छिड़काव के दौरान स्टिकर का इस्तेमाल भी लाभकारी माना गया है.
खेत में जलभराव और खरपतवार से बचें
वैज्ञानिकों ने किसानों को खेतों में जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाए रखने की सलाह दी है. अधिक नमी और पानी का जमाव इस बीमारी को बढ़ावा दे सकता है. इसके अलावा खेत को खरपतवार मुक्त रखना भी जरूरी है, क्योंकि खरपतवार रोग फैलने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकते हैं.
समय रहते सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव
केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान का कहना है कि मौसम की मौजूदा परिस्थितियां पिछेता झुलसा रोग के फैलाव के लिए अनुकूल बन रही हैं. ऐसे में किसान नियमित रूप से अपनी फसल का निरीक्षण करें और शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तुरंत कार्रवाई करें.