Punjab Paddy Farming: पंजाब में हर साल धान की खेती का रकबा बढ़ रहा है. इसके साथ ही धान की फसल में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख उर्वरक यूरिया की खपत भी बढ़ी है. हालांकि, कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को जरूरत से ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल नहीं करने की सलाह दी है. विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक यूरिया डालने से खेती की लागत बढ़ती है और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है. इसलिए किसानों को केवल अनुशंसित मात्रा में ही यूरिया का उपयोग करना चाहिए. आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में राज्य में 31.79 लाख हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी, जो 2024-25 में करीब 2 फीसदी बढ़कर 32.43 लाख हेक्टेयर हो गई. इसकी मुख्य वजह सिंचाई के लिए पानी की बेहतर उपलब्धता रही.
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, संतुलित और सही मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल करने से धान की पैदावार बढ़ती है. साथ ही खेती की लागत कम रहती है और कीट व बीमारियों का खतरा भी घटता है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कई किसान सिफारिश से ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल करते हैं, जिससे फायदे की बजाय नुकसान हो सकता है. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के फार्म एडवाइजरी सर्विस सेंटर के विशेषज्ञ अशोक कुमार गर्ग ने द ट्रिब्यून से कहा कि जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से खेती की लागत बढ़ जाती है और पर्यावरण भी प्रदूषित होता है. इससे धान के पौधे जरूरत से ज्यादा नरम और घने हो जाते हैं, जिससे तेज हवा या भारी बारिश में फसल गिरने (लॉजिंग) का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा, अधिक नाइट्रोजन देने से फसल देर से पकती है और धान के दाने की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है.
यूरिया के इस्तेमाल से अच्छी पैदावार
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सिफारिश के अनुसार यूरिया का इस्तेमाल करने से किसानों को अच्छी पैदावार मिलती है, मिट्टी की सेहत बनी रहती है और खेती की लागत भी कम होती है. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के विशेषज्ञों के अनुसार, यूरिया की सही मात्रा तय करने के लिए मिट्टी की जांच (सॉयल टेस्ट) कराना बहुत जरूरी है. इससे किसानों को पता चल जाता है कि खेत में किस पोषक तत्व की कितनी जरूरत है और उसी के अनुसार उर्वरक का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे न तो पोषक तत्वों की कमी होती है और न ही जरूरत से ज्यादा उर्वरक डालने की समस्या आती है.
अधिक नाइट्रोजन की जरूरत होती है
विशेषज्ञों ने कहा कि डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) और बासमती धान की खेती मध्यम और भारी मिट्टी में अधिक सफल रहती है, क्योंकि रेतीली मिट्टी में आयरन की कमी की समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. उन्होंने यह भी कहा कि DSR धान में रोपाई वाले धान की तुलना में अधिक नाइट्रोजन की जरूरत होती है. इसकी वजह यह है कि DSR की फसल शुरू से लेकर कटाई तक एक ही खेत में रहती है, जबकि रोपाई वाले धान की शुरुआती बढ़वार नर्सरी में होती है.
एक एकड़ धान में करीब 135 किलोग्राम बीज प्रयाप्त
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में एक एकड़ धान में करीब 135 किलोग्राम (तीन बोरी) यूरिया पर्याप्त होता है. इसे एक साथ डालने के बजाय तीन बराबर हिस्सों में देना चाहिए. पहली खुराक बुवाई के चार सप्ताह बाद, दूसरी छह सप्ताह बाद और तीसरी नौ सप्ताह बाद डालने की सलाह दी गई है. विशेषज्ञों ने कहा कि धान और बासमती की रोपाई के समय खेत तैयार करते हुए एक साथ ज्यादा यूरिया नहीं डालना चाहिए. इससे नाइट्रोजन की बर्बादी होती है, खेती की लागत बढ़ती है और फसल में बीमारियों व गिरने (लॉजिंग) का खतरा भी बढ़ जाता है.
55 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ बचाया जा सकता है
उन्होंने कहा कि अगर किसान हरी खाद, पोल्ट्री खाद (करीब 2.5 टन प्रति एकड़) या प्रेसमड (करीब 6 टन प्रति एकड़) का इस्तेमाल करते हैं, तो करीब 55 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ बचाया जा सकता है. इसी तरह ग्रीष्मकालीन मूंग के अवशेष, गोबर की सड़ी खाद (एफवाईएम), सूखी बायोगैस स्लरी या पराली से बने चार (स्टबल चार) का उपयोग करने से भी करीब 35 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ की बचत हो सकती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर बासमती की रोपाई से पहले खेत में हरी खाद या मूंग के अवशेष अच्छी तरह मिला दिए जाएं, तो यूरिया डालने की जरूरत नहीं पड़ती.