कपास महंगा होने से कपड़ा उद्योग परेशान, ड्यूटी फ्री आयात छह महीने तक और बढ़ाने की मांग उठी

कपड़ा उद्योग ने सरकार से कच्चे कपास के ड्यूटी फ्री आयात की अवधि छह महीने बढ़ाने की मांग की है. 2026 में कपास के दाम करीब 20 फीसदी बढ़े हैं, जबकि यार्न की कीमत 60 फीसदी तक बढ़ी है. दूसरी ओर, किसानों को डर है कि नई फसल की आवक के समय सस्ते आयात से घरेलू कपास के भाव दब सकते हैं.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 14 Sep, 2026 | 05:45 PM

कपड़ा उद्योग ने केंद्र सरकार से कच्चे कपास के ड्यूटी फ्री आयात की अवधि 31 अक्टूबर के बाद छह महीने और बढ़ाने की मांग की है. उद्योग का कहना है कि 2026 में कपास के दाम करीब 20 फीसदी बढ़ चुके हैं, जबकि कॉटन यार्न की कीमतों में करीब 60 फीसदी का उछाल आया है. इससे कपड़ा और परिधान निर्यातकों की लागत बढ़ गई है और उनकी मुश्किलें बढ़ रही हैं. सरकार ने घरेलू बाजार में कपास की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए जून से 31 अक्टूबर तक कपास के आयात पर शुल्क हटा रखा है. अब कपड़ा उद्योग चाहता है कि इस छूट को छह महीने और जारी रखा जाए.

वहीं, किसान संगठन ड्यूटी फ्री आयात की अवधि बढ़ाने को लेकर चिंतित हैं. किसानों को डर है कि अक्टूबर से नई कपास की फसल की आवक शुरू होने पर सस्ते आयात से घरेलू कपास के भाव दबाव में आ सकते हैं. तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (TEA) के अध्यक्ष केएम सुब्रमणियन ने द इकॉनोमिक टाइम्स कहा कि कपड़ा उद्योग ने सरकार से कच्चे कपास के ड्यूटी फ्री आयात की अवधि छह महीने बढ़ाने का अनुरोध किया है.

छह महीने में कपास के दाम 24 फीसदी बढ़े

भारत में कपास की कीमतों में पिछले छह महीनों में करीब 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इसकी बड़ी वजह देश में कपास का घटता उत्पादन माना जा रहा है. 2025-26 में भारत का कपास उत्पादन 2.35 फीसदी घटकर 290 लाख गांठ रह गया. एक गांठ का वजन 170 किलो है. देश में पिछले छह साल से कपास उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है. 2021-22 के मुकाबले उत्पादन में अब तक 17 फीसदी से ज्यादा की कमी हो चुकी है. वहीं, कपास की उपलब्धता बढ़ाने और कपड़ा उद्योग को सस्ती दर पर कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार ने जून से 31 अक्टूबर तक कच्चे कपास पर लगने वाली 11 फीसदी आयात ड्यूटी हटा दी थी. इसका मकसद भारतीय कपड़ा उद्योग को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कॉटन उपलब्ध कराना था.

महंगा होने के साथ यार्न की कमी, कपड़ा उद्योग की बढ़ी चिंता

तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष केएम सुब्रमणियन ने कहा कि कपड़े बनाने की कुल कच्चे माल की लागत में यार्न की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी है. यार्न के दाम बढ़ने के साथ बाजार में इसकी उपलब्धता की कमी भी बनी हुई है. इससे कपड़ा उद्योग  और परिधान निर्यातकों की परेशानी बढ़ रही है. वहीं, अक्टूबर से शुरू होने वाले नए कपास सीजन में उत्पादन को लेकर भी चिंता बढ़ गई है. खांडेश जिनिंग एंड प्रेसिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप जैन ने कहा कि विदर्भ, मराठवाड़ा, तेलंगाना और गुजरात के कुछ हिस्सों जैसे प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की स्थिति अच्छी नहीं है. इससे नई फसल के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है.

ड्यूटी फ्री कपास आयात बढ़ने से किसानों को भाव गिरने का डर

खाद और बीज समेत खेती की लागत बढ़ने के कारण कपास किसानों को चिंता है कि अगर कटाई के समय भी ड्यूटी फ्री कपास का आयात जारी रहा तो घरेलू बाजार में भाव दबाव में आ सकते हैं. हालांकि, खांडेश जिनिंग एंड प्रेसिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप जैन के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास के मौजूदा भाव को देखते हुए आयातित कॉटन घरेलू कपास से बहुत सस्ता होने की संभावना नहीं है. जैन ने कहा कि घरेलू कपास का भाव मौजूदा 9,000 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर से नीचे जाने की संभावना नहीं है. उन्होंने कहा कि ड्यूटी फ्री आयात से कपड़ा उद्योग को पर्याप्त कॉटन उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी.

 

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Published: 14 Sep, 2026 | 05:41 PM

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