कपास की महंगाई से जूझ रहा कपड़ा उद्योग, सरकार से आयात शुल्क हटाने की मांग तेज

कपास की मांग बढ़ने का एक बड़ा कारण कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में तेजी भी है. जैसे-जैसे तेल महंगा हुआ है, वैसे-वैसे सिंथेटिक फाइबर की कीमतें भी बढ़ी हैं. इस वजह से कई टेक्सटाइल मिलें फिर से प्राकृतिक फाइबर यानी कपास की ओर लौट रही हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 4 Apr, 2026 | 01:55 PM

Cotton price surge: देश का कपड़ा और परिधान उद्योग इन दिनों एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है. कपास की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने इस सेक्टर की लागत बढ़ा दी है, जिससे निर्यात करने वाली कंपनियों की प्रतिस्पर्धा पर सीधा असर पड़ रहा है. ऐसे में उद्योग से जुड़े संगठनों ने केंद्र सरकार से कपास पर लगने वाले आयात शुल्क को अस्थायी रूप से हटाने की मांग की है, ताकि उन्हें राहत मिल सके.

तेजी से बढ़ीं कपास की कीमतें

इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार,  हाल के दिनों में घरेलू बाजार में कपास की कीमतों में तेजी देखी गई है. पिछले एक महीने में कपास के दाम करीब 7 से 8 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं. वहीं, जिन्ड (ginned) कपास की कीमतों में 11 से 12 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

यह बढ़ोतरी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कपास के दाम 12 से 15 प्रतिशत तक बढ़े हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि कपास इस समय निवेशकों के लिए सस्ती कृषि वस्तु बन गई है, जिससे इसकी मांग और कीमत दोनों बढ़ी हैं.

सिंथेटिक फाइबर महंगे, इसलिए बढ़ी मांग

कपास की मांग बढ़ने का एक बड़ा कारण कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में तेजी भी है. जैसे-जैसे तेल महंगा हुआ है, वैसे-वैसे सिंथेटिक फाइबर की कीमतें भी बढ़ी हैं. इस वजह से कई टेक्सटाइल मिलें फिर से प्राकृतिक फाइबर यानी कपास की ओर लौट रही हैं. मांग बढ़ने के कारण बाजार में कपास की कीमतें और ऊपर चली गई हैं, जिससे उद्योग की लागत बढ़ गई है.

निर्यात पर पड़ रहा सीधा असर

भारत का कपड़ा उद्योग वैश्विक बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी है, लेकिन बढ़ती लागत ने इसकी प्रतिस्पर्धा को कमजोर कर दिया है. निर्यातकों का कहना है कि विदेशी बाजारों में टिके रहने के लिए उन्हें उच्च गुणवत्ता वाले लंबे रेशे (लॉन्ग-स्टेपल) और साफ-सुथरे कपास की जरूरत होती है, जो अक्सर आयात करना पड़ता है. लेकिन 11 प्रतिशत आयात शुल्क के कारण यह कपास और महंगा हो जाता है, जिससे भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे पड़ते हैं.

सरकार से राहत की मांग

उद्योग से जुड़े संगठनों ने सरकार से मांग की है कि कपास पर लगने वाले 11 प्रतिशत आयात शुल्क को कम से कम 3 से 6 महीने के लिए हटा दिया जाए. पिछले साल भी सरकार ने अगस्त से दिसंबर के बीच आयात शुल्क हटाकर उद्योग को राहत दी थी. अब उद्योग को उम्मीद है कि इस बार भी इसी तरह का कदम उठाया जाएगा.

वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का डर

टेक्सटाइल कंपनियों का कहना है कि भारत को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है. इन देशों में कच्चे माल पर या तो बहुत कम शुल्क है या बिल्कुल नहीं है. इसके मुकाबले भारत में महंगे कच्चे माल के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे निर्यात प्रभावित होता है. उद्योग के अनुसार, अगर जल्द राहत नहीं मिली तो भारत की वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी घट सकती है.

सप्लाई चेन पर भी दबाव

कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी और वैश्विक परिस्थितियों के कारण सप्लाई चेन भी प्रभावित हो रही है. कई जरूरी इनपुट महंगे और अनिश्चित हो गए हैं. इसका असर उत्पादन और समय पर डिलीवरी दोनों पर पड़ रहा है, जिससे कंपनियों को अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार समय पर कदम उठाती है और आयात शुल्क में राहत देती है, तो उद्योग को बड़ी राहत मिल सकती है. इससे न केवल लागत कम होगी, बल्कि निर्यात भी बढ़ेगा.

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