पश्चिम बंगाल में इस समय आलू की भरपूर पैदावार किसानों के लिए खुशी नहीं, बल्कि चिंता का कारण बन गई है. जहां आमतौर पर अच्छी फसल को किसानों की आय बढ़ाने वाला माना जाता है, वहीं इस बार हालात बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं. ज्यादा उत्पादन के चलते बाजार में आलू की कीमतें इतनी गिर गई हैं कि किसानों को लागत तक निकालना मुश्किल हो गया है. यह स्थिति न सिर्फ खेती-किसानी के लिए चुनौती बन गई है, बल्कि इसका असर राजनीति पर भी पड़ता दिख रहा है.
बंपर उत्पादन बना संकट की वजह
द ट्रिब्यून की खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल देश का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है, जहां उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा आलू की खेती होती है. राज्य के करीब नौ प्रमुख जिलों हुगली, पूर्व और पश्चिम बर्धमान, पूर्व और पश्चिम मिदनापुर, हावड़ा, बांकुरा, पुरुलिया और नदिया में बड़े पैमाने पर आलू उगाया जाता है. उत्तर बंगाल का कूचबिहार भी इस फसल के लिए जाना जाता है.
इस साल 2025-26 में राज्य में लगभग 14 से 15 मिलियन टन आलू का उत्पादन हुआ है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 20 प्रतिशत ज्यादा है. लेकिन यही बंपर उत्पादन अब किसानों के लिए मुसीबत बन गया है.
लागत से भी कम मिल रहा दाम
आलू की भरमार के कारण बाजार में इसकी कीमतें तेजी से गिर गई हैं. कई किसानों को अपनी फसल सिर्फ 4 से 5 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचनी पड़ रही है. हालात इतने खराब हैं कि किसानों को प्रति क्विंटल करीब 200 रुपये तक का ही दाम मिल रहा है, जबकि एक बीघा जमीन पर आलू की खेती करने में लगभग 30 हजार रुपये तक का खर्च आता है. ऐसे में किसान भारी घाटे में जा रहे हैं.
खेतों में सड़ रही फसल
कम कीमत मिलने की वजह से कई किसान अपनी फसल को खेत में ही छोड़ रहे हैं. आलू को कोल्ड स्टोरेज तक ले जाने और रखने में अतिरिक्त खर्च आता है, जिसे उठाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है. इस वजह से कई जगहों पर आलू की फसल खेतों में ही सड़ने लगी है, जो किसानों के लिए बेहद निराशाजनक स्थिति है.
कर्ज में डूबे किसान
आलू की खेती के लिए ज्यादातर किसानों ने बुवाई के समय साहूकारों या अन्य स्रोतों से कर्ज लिया था. उन्हें उम्मीद थी कि अच्छी फसल से उन्हें अच्छा दाम मिलेगा और वे कर्ज चुका पाएंगे. लेकिन अब जब कीमतें गिर गई हैं, तो किसान कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं और उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है.
नीति बदलाव से बढ़ी परेशानी
किसान इस संकट के लिए राज्य सरकार की नीतियों को भी जिम्मेदार मान रहे हैं. उनका कहना है कि पहले वे ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में आलू भेजते थे, जहां उन्हें बेहतर कीमत मिलती थी. लेकिन कुछ साल पहले राज्य सरकार ने घरेलू बाजार में कमी को देखते हुए आलू के निर्यात पर रोक लगा दी थी. बाद में जब उत्पादन बढ़ा तो यह रोक हटाई गई, लेकिन तब तक अन्य राज्यों ने अपने स्तर पर उत्पादन बढ़ा लिया या दूसरे स्रोतों से आपूर्ति शुरू कर दी.
इसका नतीजा यह हुआ कि बंगाल के किसानों के पास बाहर के बाजार खत्म हो गए और अब सारा आलू राज्य के अंदर ही रह गया, जिससे कीमतें और गिर गईं.
सरकार के कदम और किसानों की उम्मीदें
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस संकट से निपटने के लिए कुछ कदम उठाने की घोषणा की है. हालांकि किसानों के बीच इन उपायों को लेकर भरोसा अभी पूरी तरह नहीं बन पाया है. किसानों का कहना है कि जब तक उन्हें उनकी लागत के अनुसार उचित मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक उनकी स्थिति में सुधार संभव नहीं है.
सियासत पर भी असर
यह संकट सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर राजनीति पर भी पड़ सकता है. राज्य में लगभग 10 लाख आलू किसान और करीब 40 लाख मतदाता इससे प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे में यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा बन सकता है.
क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए बाजार का बेहतर प्रबंधन, निर्यात नीति में स्थिरता और किसानों को समय पर सही जानकारी देना बेहद जरूरी है. इसके अलावा कोल्ड स्टोरेज की लागत कम करना, वैल्यू एडिशन यानी आलू से जुड़े अन्य उत्पादों को बढ़ावा देना और नए बाजार तलाशना भी इस समस्या का समाधान हो सकता है.