zinc deficiency: खेती में अच्छी पैदावार पाने के लिए केवल मेहनत ही काफी नहीं होती, बल्कि मिट्टी का पोषण भी उतना ही जरूरी होता है. जैसे इंसान के शरीर को स्वस्थ रहने के लिए विटामिन और खनिज तत्वों की जरूरत होती है, उसी तरह पौधों को भी सही विकास के लिए कई पोषक तत्व चाहिए होते हैं. यदि इनमें से कोई भी तत्व मिट्टी में कम हो जाए तो फसल की बढ़त रुक सकती है और उत्पादन भी कम हो जाता है. खेती में ऐसे ही महत्वपूर्ण पोषक तत्वों में से एक है जिंक (Zinc), जिसकी कमी का असर सीधे फसल की गुणवत्ता और पैदावार पर पड़ता है.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आज भी कई किसान मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की भूमिका को पूरी तरह समझ नहीं पाते, जिसके कारण उन्हें मेहनत के बावजूद अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पाता.
भारत की आधी कृषि भूमि में जिंक की कमी
जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक के अनुसार भारत में जिंक की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है. वे बताते हैं कि देश की लगभग 50 प्रतिशत कृषि भूमि में जिंक की कमी पाई जाती है. इसका सीधा असर फसलों की वृद्धि और पैदावार पर पड़ता है.
कई बार किसान पूरी मेहनत और लागत लगाकर खेती करते हैं, लेकिन मिट्टी में जिंक की कमी होने के कारण फसल कमजोर रह जाती है. ऐसी फसलें रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं और उनका उत्पादन भी कम होता है. इससे किसानों की आय पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
पौधों की वृद्धि में जिंक की अहम भूमिका
जिंक पौधों के विकास में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह पौधों की कोशिकाओं में बनने वाले कई जरूरी एंजाइम के निर्माण में मदद करता है. ये एंजाइम पौधों की वृद्धि, अंकुरण और उनके स्वास्थ्य को बनाए रखने में अहम होते हैं.
जिंक की पर्याप्त मात्रा मिलने पर पौधों में क्लोरोफिल यानी हरे रंग के तत्व का निर्माण बेहतर होता है, जिससे पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को अच्छी तरह कर पाते हैं. इसके परिणामस्वरूप पौधे अधिक प्रोटीन, शर्करा और ऊर्जा तैयार करते हैं. यही कारण है कि जिंक युक्त मिट्टी में उगाई गई फसलें अधिक मजबूत होती हैं और उनका उत्पादन भी बेहतर होता है.
जिंक की कमी के लक्षण कैसे पहचानें
किसानों के लिए जिंक की कमी को पहचानना मुश्किल नहीं है. जब पौधों में जिंक की कमी होती है तो सबसे पहले पत्तियों में बदलाव दिखाई देता है. आमतौर पर पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और पत्तियों की नसों के दोनों तरफ पीले धब्बे दिखाई देने लगते हैं.
इसके अलावा नई पत्तियां छोटी और टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देती हैं. कई बार पौधों की बढ़त भी रुक जाती है और पूरा पौधा कमजोर लगने लगता है. मक्का, धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों में जिंक की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देने लगते हैं. यदि समय पर इस कमी को दूर न किया जाए तो फसल की पैदावार काफी कम हो सकती है.
जिंक की पूर्ति कैसे करें
डॉ. पुनीत कुमार पाठक के अनुसार जिंक की कमी को दूर करने के लिए किसानों को खेत में जिंक सल्फेट का उपयोग करना चाहिए. इसमें लगभग 33 प्रतिशत जिंक पाया जाता है, जो पौधों को पर्याप्त पोषण देने में मदद करता है. हालांकि जिंक की सही मात्रा का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के आधार पर करना अधिक लाभकारी होता है.
धान और गेहूं की फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट का उपयोग किया जा सकता है. वहीं मक्का और दलहन फसलों के लिए 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट पर्याप्त माना जाता है.
बुआई से पहले देना सबसे बेहतर तरीका
जिंक देने का सबसे प्रभावी और किफायती तरीका इसे बेसल डोज, यानी बुआई से पहले दी जाने वाली खाद के साथ मिलाकर देना है. इससे पौधों को शुरुआती अवस्था से ही आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते हैं और फसल की वृद्धि संतुलित तरीके से होती है.
यदि किसान मिट्टी की जांच कराकर सही मात्रा में जिंक का उपयोग करें और समय पर पोषक तत्वों की पूर्ति करें, तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार संभव है. इससे न केवल खेती अधिक लाभदायक बन सकती है, बल्कि किसानों की आय भी बढ़ सकती है.