Goat Enterotoxemia Disease: भेड़ और बकरी पालन करने वाले पशुपालकों के लिए एंटरोटॉक्सिमिया बीमारी (Enterotoxemia Disease) बड़ी चिंता बनती जा रही है. यह बीमारी इतनी खतरनाक होती है कि कई बार पशु की 4 से 24 घंटे के भीतर ही मौत हो जाती है. खासकर बरसात और मौसम में नमी बढ़ने के दौरान इसका खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के डॉ. वाई के सोनी के अनुसार यह बीमारी क्लोस्ट्रीडियम परफ्रिंजेंस नामक बैक्टीरिया से होती है, जो पशु की आंतों में जहरीले तत्व पैदा कर देता है. यही वजह है कि इसे आंतों का जहर भी कहा जाता है. समय पर पहचान और टीकाकरण ही इस बीमारी से बचने का सबसे कारगर तरीका माना जाता है.
क्या है एंटरोटॉक्सिमिया और कैसे फैलती है बीमारी
डॉ. वाई के सोनी बताते हैं कि एंटरोटॉक्सिमिया को आम भाषा में फड़किया रोग, ओवरईटिंग डिजीज और पल्पी किडनी रोग भी कहा जाता है. ये बीमारी मुख्य रूप से भेड़ और बकरियों में देखने को मिलती है. जब पशु अचानक ज्यादा मात्रा में दाना, अनाज या ऊर्जा वाला चारा खा लेते हैं, तब यह बैक्टीरिया तेजी से सक्रिय हो जाता है और आंतों में जहर बनाने लगता है. बरसात के मौसम में नमी बढ़ने और हरे चारे की अधिकता के कारण भी इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है. कई बार पशुपालक अचानक आहार बदल देते हैं, जिससे पशु का पाचन तंत्र प्रभावित होता है और बीमारी फैलने लगती है. यह बीमारी बहुत तेजी से असर दिखाती है, इसलिए कई बार पशुपालक को इलाज का मौका भी नहीं मिल पाता. विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी छोटे बच्चों और तेजी से बढ़ने वाले स्वस्थ पशुओं में ज्यादा देखने को मिलती है. इसलिए पशुपालकों को भोजन प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
बीमारी के लक्षण पहचानना बेहद जरूरी
डॉ. सोनी के मुताबिक एंटरोटॉक्सिमिया बीमारी के लक्षण अचानक दिखाई देते हैं. कई मामलों में पशु बिना किसी संकेत के अचानक मर जाता है. हालांकि कुछ सामान्य लक्षणों को पहचानकर समय रहते सावधानी बरती जा सकती है. बीमारी होने पर पशु को तेज बुखार आता है और वह सुस्त दिखाई देने लगता है. कई बार पशु खाना-पीना छोड़ देता है और बार-बार पेट में दर्द के कारण लात मारता है. पतला दस्त या खूनी दस्त भी इस बीमारी का बड़ा संकेत माना जाता है. कुछ पशुओं के मुंह से झाग निकलने लगता है और शरीर में कमजोरी तेजी से बढ़ जाती है. डॉ. सोनी बताते हैं कि यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है और कई बार 12 से 24 घंटे के भीतर पशु की मौत हो जाती है. इसलिए पशुपालकों को हल्के लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए.
टीकाकरण ही सबसे बड़ा बचाव
विशेषज्ञ का कहना है कि एंटरोटॉक्सिमिया का इलाज कठिन माना जाता है, क्योंकि बीमारी बहुत तेजी से असर करती है. इसलिए बचाव ही सबसे अच्छा उपाय है. डॉ. वाई के सोनी के अनुसार भेड़ और बकरियों का नियमित टीकाकरण करवाना बेहद जरूरी है. उन्होंने बताया कि साल में कम से कम एक बार एंटी-इम्यून सिरम वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए. जिन क्षेत्रों में बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है, वहां पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार समय-समय पर टीकाकरण कराया जा सकता है. इसके अलावा पशुओं को अचानक ज्यादा दाना या अनाज नहीं देना चाहिए. आहार में बदलाव धीरे-धीरे करना चाहिए ताकि पशु का पाचन तंत्र प्रभावित न हो. साफ पानी, संतुलित भोजन और साफ-सफाई का ध्यान रखने से भी बीमारी का खतरा कम होता है.
पशुपालकों को बरसात में ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत
डॉ. सोनी का कहना है कि मानसून और बरसात के मौसम में यह बीमारी तेजी से फैल सकती है. इसलिए इस समय पशुपालकों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होती है. पशुओं के रहने की जगह सूखी और साफ रखनी चाहिए ताकि संक्रमण का खतरा कम हो सके. विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर टीकाकरण और सही देखभाल से इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है. अगर पशुपालक भोजन प्रबंधन और स्वास्थ्य जांच पर ध्यान दें तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता है. भेड़ और बकरी पालन ग्रामीण क्षेत्रों में आय का बड़ा साधन है. ऐसे में एंटरोटॉक्सिमिया जैसी खतरनाक बीमारी से बचाव करना बेहद जरूरी है, ताकि पशुओं की सुरक्षा के साथ पशुपालकों की आमदनी भी सुरक्षित रह सके.