मध्य प्रदेश के 12वीं के छात्र अंश चंदेल साइलेज (पौष्टिक पशु चारा) बनाने का काम कर रहे हैं. उनके साइलेज चारे की सप्लाई मध्य प्रदेश के एक दर्जन से ज्यादा जिलों में हो रही है. उनके साइलेज चारे को पशु मिनटों में चट कर जाते हैं. अंश चंदेल ने ‘किसान इंडिया’ को बताया कि वह गन्ने की पत्तियों और नेपियर घास से साइलेज बनाते हैं. इसकी बिक्री से वह रह महीने लगभग 1.5 लाख रुपये की कमाई करते हैं. उन्होंने 8 लोगों को रोजगार भी दे रखा है. आसपास के लोग उनसे साइलेज बनाने की तकनीक सीखने पहुंच रहे हैं.
कचरे में फेंकी जा रही पत्तियों से साइलेज बनाकर कमाई कर रहे
मध्य प्रदेश के पाटन जिले के ग्राम खजरी के 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले युवा किसान अंश चंदेल साइलेज चारा बनाकर अपने पशुओं को तो खिला ही रहे हैं और इसको बेचकर मोटी कमाई भी कर रहे हैं. वैज्ञानिक तरीका अपनाकर उन्होंने गन्ने की पत्तियों और नेपियर घास से प्रोटीन और शुगर से युक्त चारा तैयार किया है. युवा किसान और उद्यमी अंश चंदेल ने बताया कि उनके यहां लगभग 100 एकड़ में गन्ने की खेती की जाती है. पहले गन्ने की पत्तियां कचरे में फेंक दी जाती थीं या जला दी जाती थीं. लेकिन अब वह इसी कचरे वाली पत्तियों से साइलेज बनाकर मोटा पैसा बना रहे हैं.
पशु अचार की तरह साइलेज चाव से खाते हैं
अंश चंदेल ने बताया कि आसान और कम लागत वाली साइलेज विधि से किसान लंबे समय तक अपने पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा सुरक्षित रख सकते हैं. युवा किसान अंश ने बताया कि साइलेज दरअसल हरे चारे को बिना सुखाए, उसमें मौजूद पोषक तत्वों को सुरक्षित रखते हुए लंबे समय तक स्टोर करने की एक वैज्ञानिक तकनीक है. इसे ‘चारे का अचार’ भी कहा जाता है.
टुकड़ों में काटकर हवा रोधी पन्नी में पैक किया जाता है
किसानों को बताया गया कि साइलेज बनाने मिल्किंग स्टेज में गन्ना एवं नेपियर की फसल का चयन किया जा सकता है. इस स्टेज में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है. सबसे पहले चारे को कुट्टी मशीन की मदद से 1 से 2 सेंटीमीटर के छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है. कटी हुई कुट्टी को मजबूत, मोटी और हवा रोधी पॉलीथिन बैग में परतों में भरा जाता है. हर परत को अच्छी तरह से दबाया जाता है ताकि उसके अंदर की पूरी हवा बाहर निकल जाए. हवा अंदर रहने पर चारा सड़ सकता है.

साइलेज चारा बनाने की प्रक्रिया और लगने वाला समय
अंश ने बताया कि इसके बाद चारे में फर्मेंटेशन की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए पानी में थोड़ा गुड़ और नमक मिलाकर चारे की परतों पर छिड़काव किया जाता है. बैग को पूरा भरने के बाद उसके मुंह को रस्सी या टेप से इतनी मजबूती से बांध दिया जाता है कि बाहर की हवा या नमी अंदर न जा सके. इन बैग्स को किसी सुरक्षित और छायादार स्थान पर रख दिया जाता है. लगभग 45 से 50 दिनों में पौष्टिक और खुशबूदार साइलेज बनकर तैयार हो जाता है, जिसे दुधारू पशु बेहद चाव से खाते हैं और इससे दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है.
हर महीने 30 टन सप्लाई और 1.5 लाख की कमाई
अंश चंदेल ने बताया कि उनका साइलेज चारा पाटन, दमोह समेत 12 से ज्यादा जिलों की गौशालाओं में जाता है. कुछ निजी पशुपालक भी उनका साइलेज खरीदकर ले जाते हैं. उन्होंने बताया कि 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर वह साइलेज की बिक्री करते हैं. एक महीने में 30 टन से ज्यादा साइलेज चारा बेचकर वह 1.5 लाख रुपये की कमाई कर लेते हैं. इसमें से 75 हजार रुपये तक उनको मुनाफा होता है.