आकांक्षा सिंह ने बताया कि उन्होंने नबीपुर में एक एकड़ जमीन लीज पर ली है और उसमें आदर्श जैविक कृषि फार्म स्थापित किया है. उन्होंने कहा कि खेती में सफलता पाने के लिए उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र गाजियाबाद से ट्रेनिंग ली है. उन्हें कृषि विभाग मेरठ और गाजियाबाद से युवा अन्वेषी किसान के रूप में सम्मानित किया गया है.
खेती और विज्ञान का अनोखा संगम हाल ही में राष्ट्रीय बाल वैज्ञानिक प्रदर्शनी में देखने को मिला, जब दो छात्रों ने ऐसी मशीन का प्रदर्शन किया जो पौधे की जरूरत के हिसाब से पोषण देता है. नेचुरल फार्मिंग के लिए बनाए गए इस टूल को 'धरतीपुत्र' नाम दिया गया है.
मिलन ज्योति दास कहते हैं कि उन्होंने सबसे पहले मैनुअल स्क्रू टाइप प्रेस मशीन तैयार की. यह मशीन प्राकृतिक बाइंडिंग के साथ गोबर मिक्स्चर को गमलों में बदल देती है. इससे शून्य कचरा और कम लागत वाला विकल्प मिलता है. यह नवाचार गोबर नर्सरी टब बनाने के प्रोटोटाइप पर केंद्रित है.
बुंदेलखंड में संचालित बलिनी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी ने महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का काम किया है. बलिनी आधी आबादी के स्वावलंबन की मिसाल बन गयी है. कंपनी दुग्ध उत्पादकों से दुग्ध एकत्र करने के बाद उसे संरक्षित कर बेचती हैं. महिलाओं की इस साहसिक पहल ने उनकी आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है.
विदिशा की महिलाओं ने गाय के गोबर से ऐसे सजावटी और धार्मिक सामान बनाए हैं, जिन्हें देखकर हर कोई हैरान है. उनके गोबरशाला स्टार्टअप की तारीफ मुख्यमंत्री तक कर चुके हैं. इस पहल ने न केवल रोजगार बढ़ाया, बल्कि गोबर को कमाई और स्वाभिमान का प्रतीक बना दिया है.
लंदन की नौकरी छोड़कर ग्वालियर लौटे शुभम सिंह ने पराली से ऐसा स्टार्टअप शुरू किया जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी. पराली से प्रोडक्ट बनाकर उन्होंने किसानों को नई पहचान दी और देशभर में अपने सामान की बढ़ती मांग से सफलता की नई मिसाल कायम की. आइए जानते हैं शुभम सिंह सिंह के बारे में और वे पराली से क्या बनाते हैं...