60 हजार अफ्रीकी पेंग्विनों की दर्दनाक मौत! नई स्टडी ने खोली सच्चाई, जानिए क्या है वजह

कभी हजारों की संख्या में दिखने वाले ये पेंग्विन अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं. जलवायु परिवर्तन, समुद्र के बदलते तापमान और बेकाबू मछली पकड़ने ने इनके अस्तित्व पर सबसे बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 8 Dec, 2025 | 09:15 AM

African penguins: दक्षिण अफ्रीका के तट से एक बेहद चौंकाने वाली और दुखद खबर सामने आई है. एक नई स्टडी में सामने आया है कि पिछले कुछ सालों में 60,000 से ज्यादा अफ्रीकी पेंग्विन भूख से मर गए, क्योंकि समुद्र में उनकी मुख्य खुराक सारडीन मछली लगभग गायब हो चुकी है.

कभी हजारों की संख्या में दिखने वाले ये पेंग्विन अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं. जलवायु परिवर्तन, समुद्र के बदलते तापमान और बेकाबू मछली पकड़ने ने इनके अस्तित्व पर सबसे बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है.

पेंग्विन की मौत का सबसे बड़ा कारण

The Guardian की रिपोर्ट के अनुसार, साउथ अफ्रीका के डैसन आइलैंड और रॉबेन आइलैंड पर स्थित दो सबसे बड़े पेंग्विन प्रजनन कॉलोनियों में साल 2004 से 2012 के बीच लगभग 95 फीसदी पेंग्विन खत्म हो गए. वैज्ञानिकों की मानें तो इनकी मौत का सबसे बड़ा कारण था मौल्टिंग (पंख बदलने) के दौरान पर्याप्त भोजन न मिलना.

पेंग्विन हर साल 21 दिनों तक पुराने पंख बदलते हैं. इस समय वे समुद्र में जाकर खाना नहीं खा सकते और पूरी तरह भूखे रहने को मजबूर होते हैं. अगर इससे पहले वे शरीर में चर्बी जमा नहीं कर पाते, तो वह भूख से मर जाते हैं और इस बार समुद्र में इतनी कम मछलियां थीं कि वे फैट जमा ही नहीं कर पाए.

समुद्र का बदलता तापमान 

स्टडी में पाया गया कि 2004 के बाद से सिर्फ 3 साल को छोड़कर हर साल पश्चिमी दक्षिण अफ्रीका में सारडीन की मात्रा अपने उच्चतम स्तर के 25 फीसदी तक गिर गई.

इसके पीछे तीन मुख्य वजहें बताई गई हैं

  • समुद्र के तापमान में तेजी से बढ़ोतरी
  • नमक की मात्रा में बदलाव, जिससे मछलियों का प्रजनन बाधित हुआ
  • व्यावसायिक जहाजों द्वारा अत्यधिक मछली पकड़ना

इन तीनों ने मिलकर सारडीन की आबादी को लगभग खत्म कर दिया, और सीधे इसका प्रभाव पेंग्विनों पर पड़ा.

अब सिर्फ 10,000 प्रजनन करने वाले जोड़े बचे

2024 में अफ्रीकी पेंग्विन को Critically Endangered श्रेणी में रखा गया. आज दुनिया में इनके सिर्फ 10,000 प्रजनन जोड़े बचे हैं. वहीं पिछले 30 सालों में इनकी संख्या लगभग 80 फीसदी कम हो चुकी है. जो तट कभी हजारों पेंग्विनों से भरे रहते थे, अब वहां केवल सन्नाटा है.

पेंग्विनों को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयास

स्थिति बेहद गंभीर है, लेकिन वैज्ञानिक और पर्यावरण संस्थाएं इन्हें बचाने की कोशिश में जुटी हैं. कृत्रिम घोंसले तैयार किए जा रहे हैं, ताकि बच्चे सुरक्षित रहें और मौसम का असर कम हो.

वहीं बीमार पेंग्विनों को हाथ से पाला जा रहा है और कमजोर पेंग्विनों को रेस्क्यू सेंटर ले जाकर इलाज दिया जाता है. इसी के साथ शिकारियों पर नजर यानी सील, शार्क और अन्य शिकारी जीवों को कॉलोनी से दूर रखा जा रहा है.

इतना ही नहीं बड़े पैमाने पर मछली पकड़ने पर रोक लगाई गई है.  पेंग्विनों के प्रमुख प्रजनन स्थलों के आसपास purse-seine fishing पर बैन लगा दिया गया है.

स्टडी के सह-लेखक डॉ. मजाकाडो के अनुसार अगर पेंग्विनों को खाने तक पूरी पहुंच मिलती है, तो उनकी संख्या में सुधार संभव है.”

नेल्सन मंडेला विश्वविद्यालय की प्रोफेसर लोरिएन पिचेग्रू ने कहा यह सिर्फ पेंग्विनों का मुद्दा नहीं है. छोटी मछलियों की आबादी गिरने का असर पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला पर पड़ेगा.”

उन्होंने यह भी बताया कि 2011 के बाद हालात और खराब हुए हैं और तुरंत कार्रवाई न की गई तो आने वाले वर्षों में यह प्रजाति पूरी तरह खत्म हो सकती है.

यह सिर्फ पेंग्विन की कहानी नहीं, प्रकृति की चेतावनी है

समुद्र का बिगड़ा संतुलन, लगातार बढ़ती गर्मी और मानव गतिविधियों का दबावये सब मिलकर प्रकृति की एक प्रजाति को खत्म कर रहे हैं. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में कई और समुद्री जीव इसी तरह गायब हो सकते हैं.

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