बायोफ्यूल के रूप में पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण किया जा रहा है, ताकि विदेशी आयात पर निर्भरता कम की जा सके. इथेनॉल बनाने के लिए गन्ना, मक्का समेत अन्य अनाजों का इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन, अब बांस से भी इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है. इसके लिए असम में दुनिया का पहला बांस से इथेनॉल बनने वाला प्लांट स्थापित किया गया है. प्लांट से इथेनॉल प्रोडक्शन की शुरुआत फरवरी के अंत तक शुरू हो जाने की संभावना है. प्लांट से जोड़े गए 4 हजार से ज्यादा बांस की खेती करने वाले किसानों को 2.4 करोड़ राशि जारी कर दी गई है. वहीं, 30 हजार किसानों को और जोड़ा जा रहा है.
असम बायो इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड (ABEPL) के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर रूपज्योति हजारिका ने PTI को एक इंटरव्यू में बताया कि दुनिया के पहले बांस इथेनॉल प्लांट का मकसद 30,000 किसानों को अपने साथ जोड़ना है. उन्होंने आगे कहा कि हमने अब तक बांस सोर्सिंग के लिए 4,200 से ज्यादा किसानों को रजिस्टर किया है. हम अगले तीन सालों में 300 km के रेडियस वाले सोर्सिंग जोन में 30,000 से ज्यादा किसानों को जोड़ने का टारगेट रखा है.
बांस किसानों को 2.4 करोड़ भेजे गए
सीईओ ने कहा कि कंपनी ने अब तक बिना किसी बिचौलिए को शामिल किए बांस सोर्सिंग के लिए किसानों के अकाउंट में 2.4 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए हैं. 4,930 करोड़ रुपये के इस प्लांट की इंस्टॉल्ड प्रोडक्शन कैपेसिटी 49,000 मिलियन टन प्रति साल (MTPA) है, जिसका उद्घाटन पिछले साल सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था, और अभी लिमिटेड रॉ मटेरियल रिसोर्स के साथ इसे स्टेबिलाइज किया जा रहा है. सीईओ ने कहा कि अभी हम स्टार्ट अप फेज से गुजर रहे हैं. अगले हफ्ते के अंदर हम प्लांट को स्टेबिलाइज कर पाएंगे. इसके बाद हम फुल स्केल प्रोडक्शन शुरू करेंगे. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि फरवरी के अंत तक प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा.
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दुनिया का इकलौता बांस से इथेनॉल बनाने वाला प्लांट
असम के गोलाघाट जिले के नुमालीगढ़ में मौजूद यह यूनिट दुनिया का इकलौता कमर्शियल सेकंड जेनरेशन बायोएथेनॉल प्लांट है जो कच्चे माल के तौर पर बांस का इस्तेमाल करता है. बाकी सभी फर्स्ट जेनरेशन एथेनॉल प्लांट बायोमास के तौर पर गन्ना या मक्का जैसी खाने की फसलों का इस्तेमाल करते हैं. एथेनॉल के अलावा यह प्लांट हर साल 19,000 टन फरफ्यूरल, 11,000 टन एसिटिक एसिड, 32,000 टन लिक्विड CO2 और 25 MW ग्रीन पावर भी बनाएगा.
12 हजार हेक्टेयर में 60 लाख बांस के पौधों की रोपाई कराई जाएगी
उन्होंने कहा कि ट्रायल रन के दौरान हमने 99.7 परसेंट प्योरिटी वाला फ्यूल ग्रेड एथेनॉल बनाया है. नॉर्मल रेंज 99.5 परसेंट प्योरिटी लेवल की होती है. इंस्टॉल किए गए एथेनॉल प्रोडक्शन को पूरी तरह से पाने के लिए, 43 एकड़ के प्लांट को कच्चे माल के तौर पर पांच लाख MTPA हरे बांस की जरूरत होगी. CEO ने कहा कि अपने टारगेटेड रॉ मटीरियल सोर्सिंग को पाने के लिए अगले तीन सालों में 60 लाख पौधों का इस्तेमाल करके 12,500 हेक्टेयर में बांस के प्लांटेशन की जरूरत होगी.
3 राज्यों के 10 जिलों से बांस खरीदा जाएगा
सीईओ ने कहा कि हमने प्लांट के 300 km के रेडियस से बांस सोर्स करने का टारगेट रखा है. हम असम के 16 जिलों, अरुणाचल प्रदेश के चार, नागालैंड के पांच और मेघालय के एक जिले से हरा बांस लेंगे. उन्होंने आगे कहा कि अभी पहले से रजिस्टर्ड किसानों के साथ 300 हेक्टेयर जमीन पर बांस की खेती हो रही है. हजारिका ने कहा कि हमने मुफ्त में एक लाख पौधे बांटे हैं, जिनमें से ज्यादातर चाय बागानों जैसे इंस्टीट्यूशनल प्लेयर्स के लिए हैं.
कुछ चाय बागानों में बांस की खेती शुरू की गई
उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने चाय बागानों की पांच परसेंट जमीन को चाय के अलावा दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत दी है, इसलिए कई मालिकों ने अपनी जमीन बांस की खेती के लिए इस्तेमाल करने की इच्छा जताई है. उन्होंने कहा कि हम बिना फसल वाली जमीन की पहचान कर रहे हैं और किसानों को खेती की जमीन को बांस की खेती के लिए बदलने के लिए बढ़ावा नहीं दे रहे हैं. हम बांस की खेती के लिए बंजर और बिना इस्तेमाल वाली जमीन की तलाश कर रहे हैं.