कश्मीर के बाद अब बिहार में भी खिलेगा केसर, वैज्ञानिकों को मिली कामयाबी

इस नई तकनीक का सीधा फायदा किसानों के साथ-साथ कृषि स्टार्टअप और युवाओं को भी मिलेगा. विश्वविद्यालय की योजना है कि रिसर्च के बाद तैयार पौधों को किसानों तक पहुंचाया जाए और छोटे स्तर पर खेती के ट्रायल शुरू किए जाएं. इससे किसानों को यह समझने में मदद मिलेगी कि केसर की खेती कैसे करनी है.

नई दिल्ली | Published: 14 Jan, 2026 | 03:21 PM

Saffron farming: अब तक जब भी केसर का नाम लिया जाता था, तो जहन में कश्मीर की वादियां, बर्फीली ठंड और लाल रंग के नाजुक फूल अपने आप उभर आते थे. केसर को हमेशा से ठंडे इलाकों की फसल माना गया और यही वजह रही कि इसकी खेती सीमित दायरे में सिमटी रही. लेकिन अब यह धारणा बदलने वाली है. बिहार की धरती पर भी केसर उगाने की तैयारी शुरू हो चुकी है और यह खबर किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है.

बिहार में हो रहा यह प्रयोग सिर्फ एक नई फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक खेती, वैज्ञानिक सोच और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो आने वाले समय में बिहार भी केसर उत्पादन के नक्शे पर अपनी पहचान बना सकता है.

विज्ञान ने तोड़ी परंपरागत सीमाएं

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के वैज्ञानिकों ने वर्षों की मेहनत और शोध के बाद केसर की खेती को लेकर एक नई राह निकाली है. उन्होंने प्लांट टिश्यू कल्चर तकनीक के जरिए केसर के ऐसे पौधे विकसित किए हैं, जो बिहार की जलवायु के अनुरूप ढल सकें. इस तकनीक में पौधों को खुले खेत में उगाने के बजाय नियंत्रित तापमान और नमी वाले वातावरण में तैयार किया जाता है.

इस शोध को हाल ही में भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से मान्यता भी मिल गई है, जिससे यह साफ हो गया है कि बिहार में केसर उगाने की यह तकनीक पूरी तरह वैज्ञानिक और प्रमाणित है. यह उपलब्धि बिहार के लिए ही नहीं, बल्कि देश की कृषि अनुसंधान व्यवस्था के लिए भी गर्व की बात मानी जा रही है.

खुले खेत नहीं, नियंत्रित माहौल में उगेगा केसर

वैज्ञानिकों का कहना है कि बिहार की जलवायु में पारंपरिक तरीके से खुले खेतों में केसर उगाना मुश्किल है. लेकिन पॉलीहाउस, नेट हाउस और कंट्रोल्ड एनवायरमेंट जैसी आधुनिक व्यवस्थाओं में यह संभव हो सकता है. इन-विट्रो तकनीक के जरिए केसर के पौधों को लैब में तैयार किया जाएगा, जहां तापमान, रोशनी और नमी पूरी तरह नियंत्रित रहती है.

इस प्रक्रिया से तैयार पौधे एक जैसे होते हैं, रोगमुक्त होते हैं और तेजी से बढ़ते हैं. इससे किसानों को अच्छी गुणवत्ता की फसल मिलने की संभावना बढ़ जाती है. साथ ही, केसर की खेती में सबसे बड़ी समस्या मानी जाने वाली बीज कंद की कमी भी काफी हद तक दूर हो सकेगी.

किसानों और युवाओं के लिए नए अवसर

इस नई तकनीक का सीधा फायदा किसानों के साथ-साथ कृषि स्टार्टअप और युवाओं को भी मिलेगा. विश्वविद्यालय की योजना है कि रिसर्च के बाद तैयार पौधों को किसानों तक पहुंचाया जाए और छोटे स्तर पर खेती के ट्रायल शुरू किए जाएं. इससे किसानों को यह समझने में मदद मिलेगी कि केसर की खेती कैसे करनी है और इसमें कितना खर्च व मुनाफा हो सकता है.

केसर दुनिया की सबसे महंगी मसालों में गिना जाता है. अगर बिहार में इसका उत्पादन सफल रहा, तो कम जमीन में भी किसान अच्छी आमदनी कर सकेंगे. इससे पारंपरिक फसलों पर निर्भरता कम होगी और किसानों को नई कमाई का रास्ता मिलेगा.

बिहार की कृषि को मिलेगी नई पहचान

राज्य सरकार और कृषि विभाग इस प्रयोग को लेकर काफी उत्साहित हैं. कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने इसे बिहार की खेती के लिए ऐतिहासिक पहल बताया है. उनका कहना है कि इस तकनीक से किसानों की आय बढ़ेगी और बिहार की पहचान सिर्फ अनाज उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी.

सरकार की योजना है कि विश्वविद्यालय के सहयोग से किसानों को प्रशिक्षण दिया जाए, जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं और पायलट प्रोजेक्ट के जरिए इस तकनीक को जमीन पर उतारा जाए. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो आने वाले वर्षों में बिहार की मिट्टी से भी केसर की खुशबू देश और दुनिया तक पहुंचेगी.

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