Biogas plant: आज के समय में जब एलपीजी सिलेंडर की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और कई बार सप्लाई को लेकर भी परेशानी होती है, तब आम लोगों के लिए एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, वो है बायोगैस. गांवों में रहने वाले लोगों के लिए तो यह एक वरदान की तरह है, लेकिन अब शहरों में भी इसकी मांग बढ़ने लगी है.
वैश्विक स्तर पर बढ़ते ऊर्जा संकट, खासकर पश्चिम एशिया में तनाव के कारण, भारत जैसे देशों में ईंधन की लागत और सप्लाई पर असर पड़ रहा है. ऐसे में बायोगैस एक ऐसा विकल्प बनकर सामने आया है, जो सस्ता भी है, पर्यावरण के लिए सुरक्षित भी है और लंबे समय तक चलने वाला भी है .
बायोगैस क्या है और कैसे काम करती है
बायोगैस एक प्राकृतिक गैस है, जो गोबर, किचन वेस्ट और अन्य जैविक कचरे से बनाई जाती है. इस प्रक्रिया में गोबर और पानी को एक टैंक में डाला जाता है, जहां बिना ऑक्सीजन के सड़ने की प्रक्रिया होती है. इससे मीथेन गैस बनती है, जिसे पाइप के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचाया जाता है.
इस गैस का इस्तेमाल खाना बनाने, पानी गर्म करने और छोटे घरेलू कामों के लिए आसानी से किया जा सकता है. सबसे अच्छी बात यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी और पर्यावरण के अनुकूल है.
बायोगैस क्यों है आज के समय की जरूरत
आज के दौर में ऊर्जा पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती बन गई है. भारत अभी भी काफी हद तक बाहर से आने वाले ईंधन पर निर्भर है. ऐसे में बायोगैस जैसे विकल्प इस निर्भरता को कम कर सकते हैं.
बायोगैस से खेतों में बचा हुआ कचरा, गोबर और जैविक अपशिष्ट (Waste) काम में आ जाता है. इससे न केवल ऊर्जा मिलती है, बल्कि कचरे का सही उपयोग भी होता है. सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे प्रदूषण कम होता है और गांवों की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है.
घर पर बायोगैस प्लांट कैसे लगवाएं
अगर आप अपने घर या खेत पर बायोगैस प्लांट लगवाना चाहते हैं, तो इसके लिए कुछ जरूरी चीजों का होना जरूरी है. सबसे पहले आपके पास थोड़ी जमीन होनी चाहिए. आमतौर पर 500 से 600 वर्ग फीट जगह काफी होती है. इसके अलावा गोबर या जैविक कचरे की नियमित उपलब्धता जरूरी है, क्योंकि यही गैस बनाने का मुख्य स्रोत होता है.
पानी की सुविधा भी जरूरी होती है, क्योंकि गोबर के साथ पानी मिलाकर ही गैस बनाई जाती है. ग्रामीण इलाकों में जहां पशुधन ज्यादा होता है, वहां यह सिस्टम सबसे ज्यादा सफल रहता है.
कितना आता है खर्च और कितना मिलेगा फायदा
एक सामान्य बायोगैस प्लांट की लागत उसके आकार पर निर्भर करती है. 2 क्यूबिक मीटर क्षमता वाला प्लांट लगाने में लगभग 17,000 रुपये का खर्च आता है. अगर परिवार बड़ा है, तो 2 से 4 क्यूबिक मीटर का प्लांट लगाया जाता है, जिसकी लागत 30,000 से 40,000 रुपये तक हो सकती है . पहाड़ी और उत्तर-पूर्वी इलाकों में यह खर्च थोड़ा ज्यादा हो सकता है.
सरकार देती है भारी सब्सिडी
सरकार बायोगैस को बढ़ावा देने के लिए अच्छी-खासी सब्सिडी भी देती है. छोटे प्लांट पर पहाड़ी और विशेष वर्ग के लोगों को करीब 17,000 रुपये तक की सब्सिडी मिल सकती है, जबकि सामान्य क्षेत्रों में यह करीब 9,800 रुपये होती है.
बड़े प्लांट पर 14,000 से 22,000 रुपये तक की सब्सिडी दी जाती है. इससे प्लांट लगाना काफी सस्ता हो जाता है और आम परिवार भी इसे आसानी से अपना सकते हैं .
आवेदन कैसे करें
बायोगैस प्लांट लगाने के लिए सरकार ने ऑनलाइन प्रक्रिया भी आसान कर दी है. आप biogas.mnre.gov.in पोर्टल या मोबाइल ऐप के जरिए आवेदन कर सकते हैं. आवेदन के बाद संबंधित एजेंसी आपकी जगह का निरीक्षण करती है और सब कुछ सही मिलने पर प्लांट लगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.
कैसे होगी कमाई
बायोगैस सिर्फ गैस देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कमाई भी की जा सकती है. प्लांट से निकलने वाला जो अवशेष होता है, वह बहुत अच्छी जैविक खाद बनता है. किसान इसे अपने खेतों में इस्तेमाल कर सकते हैं या बेच भी सकते हैं.
इसके अलावा अगर आपके पास ज्यादा गोबर या कचरा है, तो आप बड़े प्लांट लगाकर आसपास के लोगों को गैस सप्लाई कर सकते हैं, जिससे अतिरिक्त आय हो सकती है.
कितने समय में निकल आता है खर्च
अगर कोई परिवार हर महीने एक एलपीजी सिलेंडर इस्तेमाल करता है, तो सालभर में करीब 10-11 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं. ऐसे में अगर आपने बायोगैस प्लांट लगाया, तो यह खर्च लगभग खत्म हो जाता है. सब्सिडी के बाद अगर आपकी लागत 25-30 हजार रुपये है, तो करीब 2 साल में ही पूरा पैसा वापस निकल आता है . इसके बाद आपको लगभग मुफ्त में गैस मिलती रहती है.
क्यों है बायोगैस भविष्य का समाधान
आज के समय में जब महंगाई बढ़ रही है और ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है, तब बायोगैस एक मजबूत समाधान बनकर सामने आया है. यह सस्ती है, सुरक्षित है और पर्यावरण के लिए भी बेहतर है. इससे न केवल घर की रसोई चलती है, बल्कि खेती भी बेहतर होती है और आय के नए रास्ते भी खुलते हैं. अगर सही तरीके से इसे अपनाया जाए, तो यह गांवों और किसानों की जिंदगी बदल सकता है.