सुपारी पर WHO की कैंसर रिपोर्ट से मचा हड़कंप, CAMPCO ने सरकार से कहा- भारतीय रिसर्च पूरी होने तक न लगे रोक

भारत दुनिया का सबसे बड़ा सुपारी उत्पादक देश है. करीब 2 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सुपारी की खेती, व्यापार और प्रोसेसिंग से जुड़े हुए हैं. अकेले कर्नाटक में देश की लगभग 73 प्रतिशत सुपारी पैदा होती है. ऐसे में अगर जल्दबाजी में कोई प्रतिबंध लगाया गया, तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग सकता है.

नई दिल्ली | Published: 27 Jan, 2026 | 12:51 PM

Arecanut controversy: सुपारी, जिसे भारत में सिर्फ एक फसल नहीं बल्कि परंपरा और रोजगार का सहारा माना जाता है, इन दिनों बड़े विवाद के केंद्र में आ गई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से जुड़ी संस्था IARC द्वारा सुपारी को “कैंसरकारी” श्रेणी में रखने के बाद देशभर में लाखों किसानों की चिंता बढ़ गई है. खासतौर पर कर्नाटक, केरल, असम और तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहां सुपारी की खेती ही लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है. इसी बीच सेंट्रल एरेका नट एंड कोको मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कोऑपरेटिव लिमिटेड यानी CAMPCO ने केंद्र सरकार से साफ अपील की है कि जब तक भारत की अपनी वैज्ञानिक रिसर्च पूरी नहीं हो जाती, तब तक WHO की सिफारिशों के आधार पर सुपारी पर कोई भी प्रतिबंध न लगाया जाए.

WHO की रिपोर्ट से क्यों मचा है हड़कंप

द हिंदू की खबर के अनुसार, CAMPCO के अध्यक्ष एस. आर. सतीशचंद्र का कहना है कि WHO-IARC की यह वर्गीकरण रिपोर्ट सुपारी के पारंपरिक या प्राकृतिक उपयोग पर आधारित नहीं है. उनके मुताबिक, जिन अध्ययनों के आधार पर सुपारी को कैंसरकारी बताया गया है, वे ज्यादातर गुटखा, पान मसाला और तंबाकू मिले उत्पादों पर केंद्रित हैं, न कि केवल सुपारी पर. यही वजह है कि किसान और सहकारी संस्थाएं इस रिपोर्ट को अधूरा और एकतरफा मान रही हैं.

वर्गीकरण में विरोधाभास पर सवाल

CAMPCO ने एक और अहम मुद्दा उठाया है. संस्था का कहना है कि सुपारी को IARC ने ग्रुप-1 यानी “मनुष्यों के लिए कैंसरकारी” श्रेणी में रखा है, जबकि सुपारी में मौजूद प्रमुख तत्व ‘एरकोलीन’ को ग्रुप-2B यानी “संभावित रूप से कैंसरकारी” बताया गया है. इस विरोधाभास को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि अगर मुख्य तत्व ही पूरी तरह कैंसरकारी साबित नहीं है, तो पूरी सुपारी को सबसे खतरनाक श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है.

भारत में चल रही है बड़ी वैज्ञानिक रिसर्च

CAMPCO ने यह भी याद दिलाया कि भारत सरकार पहले ही सुपारी और मानव स्वास्थ्य पर एक व्यापक राष्ट्रीय स्तर का शोध शुरू कर चुकी है. इस रिसर्च का नेतृत्व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) कर रही है और इसमें देश की 11 प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं, जिनमें AIIMS, IISc, JIPMER, CCMB और CFTRI जैसे नाम शामिल हैं. यह अध्ययन पूरी तरह वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित है, जिसे पूरा होने में करीब 18 महीने का समय लग सकता है.

CAMPCO का कहना है कि जब तक यह रिसर्च अपने निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती, तब तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था के दबाव में आकर नीति बनाना जल्दबाजी होगी.

किसानों की रोजी-रोटी पर खतरा

भारत दुनिया का सबसे बड़ा सुपारी उत्पादक देश है. करीब 2 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सुपारी की खेती, व्यापार और प्रोसेसिंग से जुड़े हुए हैं.

अकेले कर्नाटक में देश की लगभग 73 प्रतिशत सुपारी पैदा होती है. राज्य में हर साल करीब 10.32 लाख टन सुपारी का उत्पादन होता है. कर्नाटक में सुपारी की खेती करीब 6.77 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है, जो भारत में सुपारी के कुल रकबे का लगभग 71 प्रतिशत है. ऐसे में अगर जल्दबाजी में कोई प्रतिबंध लगाया गया, तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग सकता है.

संस्कृति और परंपरा से भी जुड़ी है सुपारी

CAMPCO ने यह भी कहा है कि सुपारी सिर्फ एक कृषि उत्पाद नहीं है, बल्कि भारत की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा रही है. आयुर्वेदिक ग्रंथों, जैसे चरक संहिता, में भी सुपारी का उल्लेख मिलता है. शादी-विवाह, पूजा-पाठ और सामाजिक आयोजनों में इसका उपयोग सदियों से होता आ रहा है.

सरकार से क्या मांग कर रही है CAMPCO

CAMPCO ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह WHO-IARC के साथ संवाद करे और भारत का पक्ष मजबूती से रखे. संस्था चाहती है कि सुपारी को फिलहाल ग्रुप-1 से हटाकर ग्रुप-2B में रखा जाए, कम से कम तब तक, जब तक भारत की अपनी रिसर्च पूरी नहीं हो जाती. उनका कहना है कि किसी भी नीति का आधार ठोस वैज्ञानिक प्रमाण होना चाहिए, न कि अधूरे अध्ययनों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय दबाव.

भविष्य पर टिकी निगाहें

अब सभी की नजरें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं. किसान, सहकारी संस्थाएं और कृषि विशेषज्ञ चाहते हैं कि फैसला जल्दबाजी में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों, सामाजिक प्रभाव और किसानों की आजीविका को ध्यान में रखकर लिया जाए. सुपारी को लेकर यह बहस सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है.

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