Rice fortification: देश में कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने कुछ साल पहले एक बड़ा कदम उठाया था. सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले चावल को आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी12 जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध किया जाने लगा. इसे ‘फोर्टिफाइड चावल’ कहा गया. लेकिन अब केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोकने का फैसला किया है. यह फैसला पोषक तत्वों की स्थिरता को लेकर उठी चिंताओं और आईआईटी की एक विस्तृत अध्ययन की रिपोर्ट के बाद लिया गया है.
यह कदम अस्थायी बताया गया है, लेकिन इससे जुड़े सवाल कई हैं आखिर फोर्टिफिकेशन क्यों रोका गया, इससे गरीबों को मिलने वाले राशन पर क्या असर पड़ेगा और आगे सरकार की क्या योजना है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं.
क्या है चावल फोर्टिफिकेशन और क्यों शुरू हुई थी योजना?
चावल फोर्टिफिकेशन का मतलब है सामान्य चावल में विशेष पोषक तत्व मिलाकर उसे ज्यादा पौष्टिक बनाना. इसके लिए ‘फोर्टिफाइड राइस कर्नेल’ (FRK) नामक विशेष दानों को सामान्य चावल में मिलाया जाता है. खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार इनमें आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी12 मिलाए जाते हैं.
सरकार ने यह योजना इसलिए शुरू की थी क्योंकि देश के कई हिस्सों में एनीमिया, खासकर महिलाओं और बच्चों में, एक गंभीर समस्या है. कुपोषण से जूझ रहे परिवारों तक अतिरिक्त पोषण पहुंचाने के लिए यह कदम उठाया गया. अक्टूबर 2021 में इस योजना का पहला चरण शुरू हुआ और बाद में इसे चरणबद्ध तरीके से सभी केंद्रीय योजनाओं में लागू करने का लक्ष्य रखा गया.
अचानक क्यों लगा ब्रेक?
बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, हाल ही में सरकार की ओर से कराए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय तक भंडारण के दौरान फोर्टिफाइड चावल में मिलाए गए पोषक तत्वों की मात्रा घट सकती है. अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों, तापमान, नमी और पैकेजिंग के तरीके का पोषक तत्वों की स्थिरता पर सीधा असर पड़ता है.
देश में सरकारी भंडार में चावल अक्सर दो से तीन साल तक रखा जाता है. ऐसे में यदि पोषक तत्व समय के साथ कम हो जाते हैं, तो फोर्टिफिकेशन का मकसद ही कमजोर पड़ सकता है. इसी वजह से सरकार ने फिलहाल इस प्रक्रिया को रोककर एक अधिक प्रभावी और टिकाऊ व्यवस्था विकसित करने का फैसला किया है.
क्या राशन पर पड़ेगा असर?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस फैसले से गरीबों को मिलने वाले खाद्यान्न में कोई कटौती नहीं होगी. सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आंगनवाड़ी सेवाओं और मिड-डे मील जैसी योजनाओं के तहत चावल का वितरण पहले की तरह जारी रहेगा. फर्क सिर्फ इतना होगा कि फिलहाल फोर्टिफाइड चावल की जगह सामान्य चावल दिया जा सकता है.
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अस्थायी तौर पर यह छूट दी गई है कि वे अपनी परिस्थितियों के अनुसार फोर्टिफाइड या गैर-फोर्टिफाइड चावल की आपूर्ति करें.
भंडारण और आपूर्ति की चुनौती
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सरकार के केंद्रीय भंडार में रखा गया चावल अक्सर दो से तीन साल तक स्टोर रहता है. हर साल PMGKAY और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत करीब 3.72 करोड़ टन चावल बांटा जाता है, जबकि केंद्रीय भंडार में कुल उपलब्धता लगभग 6.74 करोड़ टन आंकी गई है. इसमें 2025-26 के खरीफ विपणन सीजन से मिलने वाला चावल भी शामिल है, जिसकी खरीद अक्टूबर से शुरू हुई थी. यानी जितना चावल बांटा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा भंडार में जमा है. इस अंतर के कारण चावल को लंबे समय तक गोदामों में रखना पड़ता है, जिससे फोर्टिफाइड चावल में मिलाए गए पोषक तत्वों के समय के साथ कम होने का खतरा बढ़ जाता है.
उद्योग पर क्या असर?
इस फैसले का असर चावल मिलिंग उद्योग पर भी पड़ा है. कई मिलर्स ने फोर्टिफिकेशन के लिए जरूरी कच्चा माल, जैसे फोलिक एसिड और विशेष प्रीमिक्स, पहले से खरीद रखा था. अब अचानक रोक लगने से उन्हें आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. कुछ मिलों ने पहले ही फोर्टिफाइड राइस कर्नेल तैयार कर लिए थे, जिन्हें अब खुले बाजार में बेचना आसान नहीं है.
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि यह निर्णय अगले सीजन से लागू किया जाता तो उन्हें तैयारी का समय मिल जाता. हालांकि सरकार का कहना है कि यह कदम पूरी तरह पोषण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है.