UP में गो संरक्षण से अर्थव्यवस्था को मिली नई रफ्तार! 50 हजार महिलाओं को मिला रोजगार

UP Cow Protection Model: उत्तर प्रदेश में गो संरक्षण मॉडल अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा माध्यम बन रहा है. प्रदेश में 7700 से अधिक गोशालाओं में 12 लाख से ज्यादा निराश्रित गोवंश संरक्षित हैं. सरकार किसानों को गाय सौंपने के साथ हर महीने 1500 रुपये की सहायता भी दे रही है, जिससे दुग्ध उत्पादन और जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 24 May, 2026 | 10:50 AM

Yogi Adityanath Cow Welfare Scheme: उत्तर प्रदेश में गो संरक्षण अब केवल धार्मिक या सामाजिक पहल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है. राज्य सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओं के तहत प्रदेश में 7700 से अधिक गोशालाएं संचालित की जा रही हैं, जहां 12 लाख से ज्यादा निराश्रित गोवंश का संरक्षण किया गया है. सरकार का दावा है कि इस पहल ने गांवों में रोजगार, स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर पैदा किए हैं. गोशालाओं से जुड़े कई कार्य अब ग्रामीण लोगों की आय का साधन बनते जा रहे हैं.

किसानों को मिल रहा आर्थिक सहारा

राज्य सरकार किसानों और पशुपालकों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए भी लगातार कदम उठा रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक 1.62 लाख से अधिक गायें किसानों और पशुपालकों को सौंपी जा चुकी हैं. इन पशुओं की देखभाल और पालन-पोषण के लिए लाभार्थियों को हर महीने 1500 रुपये की आर्थिक सहायता भी दी जा रही है. इससे किसानों को डेयरी व्यवसाय से अतिरिक्त आय मिल रही है और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिल रहा है.

सरकार का उद्देश्य केवल पशुपालन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों को जैविक खेती की ओर प्रेरित करना भी है. गोबर और गोमूत्र आधारित प्राकृतिक खाद के उपयोग से खेती की लागत कम हो रही है और मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर बनाने में भी मदद मिल रही है.

महिला समूहों को मिला नया रोजगार

गो संरक्षण मॉडल का सबसे बड़ा असर महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर भी दिखाई दे रहा है. उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अनुसार, राज्य के 38 जिलों में महिला स्वयं सहायता समूह गो-आधारित उत्पादों के निर्माण और बिक्री से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं. इस पहल के जरिए 50 हजार से अधिक महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है. गांवों में महिलाएं अब केवल घरेलू कार्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि छोटे उद्योग और उत्पाद निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

गोबर से तैयार हो रहे नए उत्पाद

प्रदेश की कई गोशालाओं में अब गोबर का इस्तेमाल उपयोगी और बाजार में बिकने वाले उत्पादों के निर्माण में किया जा रहा है. उन्नाव जिले में महिला समूह गाय के गोबर से प्राकृतिक डिस्टेंपर पेंट तैयार कर रहे हैं. सरकार के अनुसार यह पेंट कम लागत वाला, गंध रहित और एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर है. इसके अलावा इसमें एंटी-फंगल विशेषताएं भी मौजूद हैं. यही कारण है कि ग्रामीण बाजारों में इसकी मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है. गोबर आधारित उत्पादों के कारोबार में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे ग्रामीण उद्योगों को नई पहचान मिल रही है.

जैविक खेती और आत्मनिर्भर गांवों की ओर कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि गो संरक्षण और जैविक खेती का यह मॉडल भविष्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है. इससे एक ओर किसानों की आय बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर गांवों में रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे.

सरकार की कोशिश है कि गोशालाओं को केवल पशु संरक्षण केंद्र न बनाकर उन्हें ग्रामीण विकास और स्वरोजगार के केंद्र के रूप में विकसित किया जाए. अगर यह मॉडल लगातार सफल होता है, तो आने वाले समय में उत्तर प्रदेश देश के अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है.

 

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