Weak Monsoon: इस साल कमजोर मॉनसून की आशंका के बीच राज्यों पर फसल बीमा का खर्च बढ़ सकता है. राज्यों को या तो बीमा प्रीमियम पर अधिक पैसा खर्च करना होगा या फिर किसानों को ज्यादा मुआवजा देना पड़ सकता है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को जोखिम से बचाने के लिए राज्यों को दावों के भुगतान की जिम्मेदारी बीमा कंपनियों को सौंपनी चाहिए, ताकि किसानों को समय पर मुआवजा मिल सके.
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल कर्नाटक ही ऐसा राज्य है, जिसने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत फिर से सामान्य मॉडल अपनाया है. वहीं महाराष्ट्र, झारखंड, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे कई राज्य अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि वे ‘कप एंड कैप’ मॉडल को जारी रखें या नहीं. इस मॉडल में बीमा कंपनियों की मुआवजा देने की जिम्मेदारी एक तय सीमा तक ही सीमित रहती है.
सामान्य फसल बीमा मॉडल
फसल बीमा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के अनुसार, महाराष्ट्र इस साल फिर से सामान्य फसल बीमा मॉडल अपनाने पर विचार कर रहा है. इस मॉडल में फसल नुकसान का पूरा जोखिम बीमा कंपनियों के पास रहता है, हालांकि इसके लिए प्रीमियम भी अधिक देना पड़ता है. वहीं झारखंड ने तीन अलग-अलग मॉडलों सामान्य पूर्ण दायित्व, 80:110 और 60:130 के तहत बीमा प्रीमियम की दरें मंगाई हैं. अन्य राज्यों ने अभी इस बारे में अंतिम फैसला नहीं लिया है.
पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन का कहना है कि आदर्श स्थिति में फसल बीमा के लिए प्रीमियम की निविदाएं मॉनसून पूर्वानुमान जारी होने से पहले मंगाई जानी चाहिए थीं. उनके अनुसार, अब सामान्य पीएम फसल बीमा योजना में लौटने में काफी देर हो चुकी है, क्योंकि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के दूसरे चरण का मॉनसून पूर्वानुमान भी आ चुका है और मौसम से जुड़ी ज्यादातर जानकारी सामने आ गई है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कुछ वर्षों, जैसे 2014 में, मौसम विभाग का अनुमान पूरी तरह सही नहीं रहा था.
राज्य सरकारों की जिम्मेदारियां
पीएम फसल बीमा योजना के तहत लागू “बीड फॉर्मूला” या 80:110 मॉडल में बीमा कंपनियों और राज्य सरकारों की जिम्मेदारियां तय होती हैं. इस व्यवस्था में यदि कुल बीमा दावे (क्लेम) वसूले गए प्रीमियम के 80 प्रतिशत से कम रहते हैं, तो बीमा कंपनी कुल प्रीमियम का 20 प्रतिशत अपने पास रखती है और बाकी राशि राज्य सरकार को वापस कर देती है. वहीं, इस मॉडल में बीमा कंपनी की अधिकतम जिम्मेदारी कुल प्रीमियम के 110 प्रतिशत तक ही सीमित रहती है. यदि दावे 110 प्रतिशत से अधिक हो जाते हैं, तो अतिरिक्त मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है.
किसानों की मुश्किलें बढ़ीं
विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार जब दावे 110 प्रतिशत की सीमा से ऊपर पहुंच जाते हैं, तो कुछ राज्य सरकारें भुगतान कम करने या दावों को कम दिखाने की कोशिश करती हैं. ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है. किसान अपना तय हिस्सा नियमित रूप से जमा करते हैं, जबकि केंद्र और राज्य सरकारों का योगदान बीमा प्रीमियम की दर और फसल के अनुसार बदलता रहता है. इसलिए समय पर और पूरा मुआवजा न मिलने पर किसानों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं.
देश में सूखे जैसी स्थिति
फसल बीमा विशेषज्ञ का कहना है कि भारत फिलहाल सूखे जैसी स्थिति का सामना नहीं कर रहा है, लेकिन देश के सामने एक दूसरी बड़ी चुनौती है अस्थिर और अनिश्चित मॉनसून. इससे कृषि क्षेत्र में जोखिम बढ़ सकता है और फसल बीमा पर खर्च भी ज्यादा हो सकता है. यह स्थिति कृषि जोखिम प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करती है. विशेषज्ञ के अनुसार, अगर पूरे मौसम में बारिश सामान्य से 8 से 10 प्रतिशत कम भी रहती है, तो यह आंकड़ा देखने में ज्यादा गंभीर नहीं लगता. लेकिन भारत का अनुभव बताता है कि ऐसे साल किसानों के लिए मुश्किल भरे साबित हो सकते हैं.