Cooperative Society: आज के समय में अकेले आगे बढ़ने के बजाय मिलकर काम करने की ताकत तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि सहकारिता यानी कोऑपरेटिव सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहा है. किसानों, महिलाओं, युवाओं और छोटे कारोबारियों को एक साथ जोड़कर उनकी आय बढ़ाने और लागत कम करने में सहकारी संस्थाएं मददगार साबित हो रही हैं. IFFCO के चेयरमैन दिलीप संघाणी ने बताया कि कोऑपरेटिव के जरिए बैंकिंग, डेयरी, कृषि, फिशरीज और उद्योग जैसे कई क्षेत्रों में काम किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि सहकारिता 2.0 के दौर में सामूहिक प्रयासों से बड़े बदलाव संभव हैं. आइए जानते हैं कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाने का आसान तरीका.
क्या होती है कोऑपरेटिव सोसाइटी, कैसे करती है काम?
कोऑपरेटिव यानी सहकारी संस्था ऐसी व्यवस्था है जिसमें कुछ लोग एक समान उद्देश्य के लिए मिलकर काम करते हैं. इसमें सभी सदस्य अपनी इच्छा से जुड़ते हैं और संस्था के विकास में योगदान देते हैं. इसका मुख्य उद्देश्य लागत को कम करना, आमदनी बढ़ाना और लाभ को सभी सदस्यों में समान रूप से बांटना होता है. IFFCO चेयरमैन दिलीप संघाणी (Dilip Sanghani) के अनुसार, सहकारिता का आधार समान विचार, समान भागीदारी, विश्वास, सामूहिक नेतृत्व और सभी के कल्याण की भावना है. उन्होंने कहा कि किसान, महिला, युवा और छोटे उद्योगों से जुड़े लोगों की समृद्धि के लिए कोऑपरेटिव मॉडल बेहद प्रभावी है.
कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाने के लिए जरूरी नियम और दस्तावेज
सहकारी संस्था बनाने के लिए सबसे पहले कुछ लोगों को एक साथ आना होता है. आमतौर पर इसके लिए कम से कम 10 सदस्यों की जरूरत होती है, हालांकि अलग-अलग राज्यों में नियमों में बदलाव हो सकता है. सभी सदस्य बालिग होने चाहिए. इसके बाद संस्था का उद्देश्य तय करना जरूरी होता है. जैसे दूध संग्रह, फसल की सामूहिक बिक्री, प्रोसेसिंग यूनिट या किसी अन्य व्यवसाय से जुड़ा काम. इसके बाद संस्था का ऐसा नाम चुना जाता है जो पहले से रजिस्टर्ड न हो. कोऑपरेटिव सोसाइटी के लिए बाय-लॉस यानी उपनियम तैयार किए जाते हैं. इसमें सदस्यता, शेयर मूल्य, बैठक, चुनाव, लाभ वितरण और ऑडिट जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां शामिल होती हैं. रजिस्ट्रेशन के लिए सदस्यों के पहचान पत्र, पता प्रमाण, फोटो, कार्यालय का पता, बाय-लॉस की कॉपी और आवेदन पत्र जैसे दस्तावेज जरूरी होते हैं.
रजिस्ट्रेशन से लेकर काम शुरू करने तक की पूरी प्रक्रिया
दस्तावेज तैयार होने के बाद राज्य के रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटी के पास आवेदन जमा करना होता है. जांच पूरी होने के बाद संस्था को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट मिल जाता है. इसके बाद बैंक खाता, पैन नंबर और जरूरत के अनुसार जीएसटी नंबर लेना होता है. संस्था की पहली बैठक में अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष जैसी जिम्मेदारियों के लिए मैनेजिंग कमेटी का चुनाव किया जाता है. इसके बाद संस्था का काम औपचारिक रूप से शुरू हो जाता है. साथ ही ऑडिट, वार्षिक आम सभा (AGM) और रिकॉर्ड रखने जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी होता है.
एक सदस्य, एक वोट का नियम और सहकारिता के फायदे
दिलीप संघाणी ने बताया कि कोऑपरेटिव सोसाइटी में सबसे खास बात समानता का सिद्धांत है. यहां किसी सदस्य के पास कितने भी शेयर हों, लेकिन उसे वोट देने का अधिकार सिर्फ एक ही होता है. उन्होंने कहा कि कंपनी व्यवस्था से अलग सहकारी संस्थाओं में ज्यादा शेयर रखने वाले व्यक्ति को ज्यादा अधिकार नहीं मिलता. कोऑपरेटिव मॉडल के कई फायदे हैं. सामूहिक खरीद से लागत कम होती है, मिलकर बिक्री करने से बेहतर कीमत मिलती है और सरकारी योजनाओं व बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच आसान होती है. इसके अलावा स्थानीय स्तर पर रोजगार और प्रोसेसिंग के अवसर भी बढ़ते हैं. IFFCO चेयरमैन ने कहा कि सहकारिता की ताकत पांच उंगलियों से बनी मजबूत मुट्ठी की तरह है. जब लोग विश्वास और पारदर्शिता के साथ मिलकर काम करते हैं, तो संस्था और उससे जुड़े सभी लोगों की तरक्की संभव होती है.