Drone Didi scheme: हरियाणा के सिरसा जिले में महिलाओं को तकनीक से जोड़कर खेती को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई ‘ड्रोन दीदी’ योजना फिलहाल उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई है. इस योजना का मकसद था कि महिलाएं ड्रोन के जरिए खेतों में नैनो यूरिया और कीटनाशकों का छिड़काव करें और साथ ही रोजगार भी हासिल करें. लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी रफ्तार काफी धीमी नजर आ रही है.
लक्ष्य बड़ा, लेकिन काम आधा भी नहीं
द ट्रिब्यून की खबर के अनुसार, इस योजना के तहत जिले में 11 महिलाओं को ड्रोन ऑपरेटर के रूप में तैयार किया गया. हर महिला को करीब 1000 एकड़ क्षेत्र में छिड़काव करने का लक्ष्य दिया गया था. कुल मिलाकर लगभग 10,003 एकड़ जमीन के लिए पंजीकरण हुआ था, लेकिन हकीकत में सिर्फ 4,551 एकड़ में ही छिड़काव हो पाया. इससे साफ है कि योजना अपने लक्ष्य से काफी पीछे रह गई.
किसानों की झिझक बनी सबसे बड़ी वजह
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ज्यादातर किसान पारंपरिक तरीके से ही खेती करना पसंद करते हैं. ड्रोन जैसी नई तकनीक को लेकर उनमें भरोसा कम है. कई किसानों को यह समझ नहीं आया कि ड्रोन से छिड़काव कितना फायदेमंद होगा. इसलिए उन्होंने इस नई तकनीक को अपनाने में हिचक दिखाई और पुराने तरीकों को ही बेहतर माना.
सही जानकारी और ट्रेनिंग की कमी
इस योजना के सफल न होने की एक बड़ी वजह यह भी रही कि किसानों तक सही जानकारी नहीं पहुंच पाई. अगर गांव-गांव में ड्रोन का प्रदर्शन किया जाता और किसानों को इसके फायदे समझाए जाते, तो वे इसे अपनाने के लिए तैयार हो सकते थे. लेकिन जागरूकता की कमी के कारण योजना का असर सीमित रह गया.
समय और फसल की स्थिति का असर
ड्रोन से छिड़काव के लिए जो समय तय किया गया था, वह भी काफी कम था. फरवरी की शुरुआत से लेकर 20 फरवरी तक ही पोर्टल खुला रहा. इसके अलावा उस समय गेहूं और सरसों की फसल में ज्यादा छिड़काव की जरूरत नहीं थी. इस वजह से भी ड्रोन की मांग कम रही और काम सीमित रह गया.
तकनीकी समस्याएं भी बनी बाधा
ड्रोन चलाने में कई तकनीकी दिक्कतें भी सामने आईं. बैटरी जल्दी खत्म होना, एक गांव से दूसरे गांव तक ड्रोन ले जाने में परेशानी और मशीन की देखभाल जैसी समस्याओं के कारण कई महिलाएं पूरा काम नहीं कर सकीं. कुछ ऑपरेटर तो एक भी खेत में छिड़काव नहीं कर पाईं.
खर्च भी बना वजह
इस योजना में सरकार की ओर से प्रति एकड़ 250 रुपये की सब्सिडी दी जा रही है, जिससे किसानों का खर्च कुछ हद तक कम होता है. लेकिन इसके बावजूद किसानों को अपनी जेब से लगभग 150 रुपये प्रति एकड़ भुगतान करना पड़ता है. छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह अतिरिक्त खर्च आसान नहीं है, खासकर तब जब पहले ही खेती की लागत लगातार बढ़ रही हो और फसल के दाम भी हमेशा संतोषजनक न मिलते हों.
कई किसानों का कहना है कि पारंपरिक तरीके से छिड़काव कराने में उन्हें कम खर्च आता है या वे खुद ही यह काम कर लेते हैं, जिससे अतिरिक्त पैसे देने की जरूरत नहीं पड़ती. ऐसे में वे नई तकनीक अपनाने के बजाय पुराने तरीकों को ही ज्यादा सुरक्षित और सस्ता मानते हैं.
महिलाओं के लिए चुनौती
यह योजना महिलाओं को रोजगार देने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू की गई थी. लेकिन काम कम मिलने की वजह से कई महिलाओं को उम्मीद के अनुसार फायदा नहीं मिल पाया. इससे उनके उत्साह पर भी असर पड़ा है.
प्रशासन क्या कह रहा है
अधिकारियों का कहना है कि शुरुआत में काम धीमा रहा, लेकिन बाद में इसमें थोड़ी तेजी आई. हालांकि तब तक फसल की जरूरत कम हो चुकी थी. प्रशासन का मानना है कि अगर किसानों के बीच ज्यादा जागरूकता लाई जाए और उन्हें समय पर जानकारी दी जाए, तो इस योजना को सफल बनाया जा सकता है.