पिछले पांच-छह दशकों से चल रही विकास की अंधी दौड़ अब 21वीं सदी के पहले उत्तरार्ध में अपने चरम पर पहुंच गई है. नतीजतन, अपने और अपने परिवार के लिए असीमित संसाधन जुटाने की हवस में समाज का हर वर्ग अपने आप को झौंक चुका है. अपने लिए संसाधन जुटाने की गलाकाट दौड अब परिवार और समाज से आगे जाकर विश्व समुदाय के सभी देशों के बीच शुरू हो गई है. इस दौड़ का वीभत्स और विकराल रूप आज हम उस जंग में देख रहे हैं, जिसमें प्रत्यक्ष रूप से भले ही कुछ देश शामिल हैं, लेकिन इससे इंसानी जमात सहित समूची कायनात बुरी तरह से प्रभावित हुई है.
जंग से जुडे तमाम स्याह पहलुओं के बीच एक पहलू यह भी है कि क्या युद्ध में मशगूल देशों की जनता भी जंग की हिमायती है? इसका जवाब है, बिल्कुल नहीं और इसका सबूत है, पिछले दिनों अमेरिका में हुआ ट्रंप विरोधी वह आंदोलन, जिसमें लगभग 10 लाख लोगों ने युद्ध की मुखरता से मुखालफत की. तब फिर यह सवाल उठना भी लाजमी है कि आखिर यह जंग कौन, किसके लिए लड़ रहा है? इसका जवाब बिल्कुल सीधा सपाट है कि युद्धरत देशों में दौलत के बलबूते सत्ता पर काबिज हुए कुछ वहशी लोगों ने तथाकथित “राष्ट्रवाद” के नाम पर अपने हित साधने के लिए पूरी दुनिया को बारूद के ढेर में तब्दील कर दिया है. इन अयोग्य शासकों की वजह से बेहद जटिल हो चुके इस वैश्विक परिदृश्य में अब लाख टके का सवाल यह है कि इस दुश्चक्र से मानव जाति को बाहर निकालने का रास्ता क्या है?
परंपरागत खेती के दर्शन को खुद भारतीयों ने भुला दिया
इस जटिल सवाल का सरल जवाब है, भारत और भारत की परंपरागत खेती का सह अस्तित्व पर आधारित वह दर्शन, जिसे कालांतर में खुद भारतीयों ने भुला दिया है. यह जवाब हकीकत में तब्दील होगा, इसका सुखद संकेत यह है कि युद्ध की सुगबुगाहट से पहले ही भारत में परंपरागत खेती को इतिहास के पन्नों से झाड़ पोंछ कर बाहर लाने की कवायद कुछ साल पहले सरकार ने शुरू कर दी थी. यह बात दीगर है कि भारत में एक बार फिर परंपरागत खेती को अपना रहे लोग भले ही इसके सह अस्तित्ववादी दर्शन से अछूते हों, लेकिन इस व्यवस्था को अपनाना ही फिलहाल इस संकट के समाधान का मार्ग प्रशस्त कर सकता है. इस बीच सकारात्मक ऊर्जा की छोटी किंतु सुखदाई लहर भारत में दूरदराज के एक इलाके से चली है. यह लहर, धरती को सभी प्रकार के संकटों से मुक्त कराने की क्षमता रखने वाली इस खेती के दार्शनिक पहलू को जनमानस का हिस्सा बनाने में समर्थ साबित हो रही है. सही मायने में यह कवायद ’कारागार में कृष्ण के जन्म’ की तरह है. समाज का यथेष्ट चिंतन करने वालों को यूपी में बांदा स्थित ‘प्रेम के बाग‘ से धीरे धीरे, कदम दर कदम आगे बढ रही इस मौन क्रांति के “आवर्तनशील” होने का इंतजार है.
दो सदियों से प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य को लेकर युद्ध हुए
अब इस संकट से जुडे समाधान पक्ष की बात करने के क्रम में मौजूदा हालात की भूमिका कैसे बनी, इस पर बात करना लाजमी होगा. पिछली दो सदियों का इतिहास बताता है कि दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य को लेकर ही तमाम समुदायों के बीच युद्ध हुए हैं. वैश्विक स्तर पर 19वीं सदी में फैले उपनिवेशवाद के पीछे ब्रिटिश, डच, फ्रांसीसी और पुर्तगाली जैसे असंतृप्त यूरोपीय कबीलों का आधिपत्यवादी संघर्ष मुख्य वजह थी. इस संघर्ष ने ही शांति प्रिय भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक ताना बाना छिन्न भिन्न कर दिया था. उपनिवेशवाद के इस बवंडर ने भारत में हजारों साल के व्यावहारिक प्रयोगों के आधार पर बनी सबसे शानदार सामाजिक व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया था. सही मायने में उपनिवेशवाद ने भारत के सह अस्तित्ववादी समाज की सततता के मौलिक ढांचे को ही हिला दिया था. भारतीय समाज को इसका खामियाजा ग्राम स्वराज पर आधारित अपनी परंपरागत खेती को भूलने सहित अन्य परिणामों के रूप में आज तक भुगतना पड रहा है.
इसके बाद 20वीं सदी में हुए दोनों महायुद्धों के पीछे भी दुनिया की एकाधिकारवादी ताकतों का धरती के संसाधनों पर नियंत्रण करके विश्व व्यवस्था का संचालन अपने हाथों में लेना, मूल वजह थी. मानव जाति को इसके दुष्परिणाम, 21वीं सदी में भी रूस यूक्रेन, इजराइल फिलिस्तीन और अमेरिका ईरान जैसे युद्ध के रूप में झेलने पड़ रहे हैं. ये युद्ध अब तक किसी भी नजरिए से तर्कसंगत नहीं ठहराए जा सके हैं. अलबत्ता शेष विश्व की निर्दोष जनता इन युद्धों का खामियाजा, ऊर्जा संकट से लेकर खाद्य आपूर्ति श्रृंखला तहस नहस होने तक, अनेक अन्य रूपों में भुगतने को अभिशप्त है.
संकट के भंवर से निकालने का बीड़ा मुठ्ठी भर किसानों ने थामा
इस सबके बीच मौजूदा संकट के भंवर में फंसी दुनिया को बाहर निकालने की एक मामूली लेकिन कारगर उम्मीद की किरण भी दिख रही है. इस उम्मीद की मशाल भारत के उन मुठ्ठी भर किसानों ने अपने हाथों में थामी है, जो परंपरागत खेती से जुडे हैं. दरअसल भारत में भी 1960 के दशक में जन्मी हरित क्रांति के बाद अधिसंख्य किसानों ने उपज बढाने के लालच में आकर रासायनिक खेती का दामन थाम लिया था. इस खेती के लगभग 6 दशक के अनुभव से अब पता चला कि हवा, मिट्टी और पानी से लेकर फल, फूल और सब्जी, कंद मूल तक, खेती का समूचा तंत्र दूषित हो गया है. आलम यह है कि खेती के मामले में जिस पंजाब और हरियाणा को अग्रणी राज्य का तमगा मिला है, इन राज्यों के किसान खुद अपने द्वारा उगाए गए गेहूं का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. इन राज्यों की कृषि योग्य जमीन इस हद तक दूषित हो चुकी हैं, कि सरकारों को अब यहां कैंसर एक्सप्रेस ट्रेन तक चलानी पड़ रही है.
हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने पिछले दस सालों से पूरे देश में प्राकृतिक एवं पारंपरिक खेती मिशन चलाया है. इसका मकसद किसानों को रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से अवगत कराते हुए इसके सीमित प्रयोग के प्रति जागरूक किया जा रहा है. देश भर में किसानों को गाय, गोबर पर आधारित परंपरागत खेती को फिर से अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस मुहिम के परिणाम भी पूरी तरह से जैविक खेती करने वाले राज्य में तब्दील हो चुके सिक्किम जैसे राज्यों से मिलने लगे हैं.
मौजूदा दौर में युद्ध की विभीषिका के नजरिए से अगर देखा जाए तो भारत सहित दुनिया के अन्य देशों में रासायनिक खेती कर रहे किसानों के लिए, खेती के संसाधनों की उपलब्धता का गंभीर खतरा आसन्न है। सबसे बडा संकट रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता का है. इसका सीधा असर भविष्य में खाद्यान्न आपूर्ति पर पड़ना तय है। वहीं दूसरी ओर, भारत में रसायन रहित खेती को अपना चुके लाखों किसान युद्ध के त्रासदीपूर्ण प्रभावों से खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. चूंकि, समय रहते इन किसानों ने न्यूनतम संसाधनों से युक्त आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाली पारंपरिक खेती के महत्व को समझ कर ही इसे अपनाया है. इसलिए इन किसानों के लिए युद्ध की आपदा, एक ऐसा अवसर बनकर आई है, जिसने उन्हें उम्मीद की किरण बनने का मौका दिया है.
ईरान अमेरिका युद्ध से बिखरी आपूर्ति श्रृंखला
यह बात सही है कि हवा, पानी से लेकर तेल और खनिज तक, प्रकृति के समस्त संसाधनों के असीमित एवं अनियंत्रित तरीके से हो रहे दोहन ने वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न की शुद्धता पर भी संकट पैदा कर दिया है. इस संकट को 21वीं सदी की सबसे बडी त्रासद पूर्ण घटना के रूप में ईरान अमेरिका युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को तहस नहस करके और भी ज्यादा गहरा दिया है. मौजूदा हालात के मद्देनजर भारत सहित दुनिया के सभी देशों की चिंता इस बात को लेकर है कि भावी पीढ़ियों के लिए साफ हवा, माटी, पानी और भोजन की आपूर्ति के नैसर्गिक अधिकार की बहाली को कैसे सुनिश्चित किया जाए. कम से कम शुद्ध एवं पौष्टिक भोजन की आपूर्ति के लिए खेती की ऐसी पद्धतियों की दरकार है, जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना न केवल मनुष्यों बल्कि संपूर्ण जैव जगत के सह अस्तित्व को स्वीकार करती हो। ऐसे में समय की इस मांग को पूरा करने के लिए दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं. इसकी वजह भी साफ है कि भारत ने ही अनादि काल से धरती की कोख से अन्न का भंडार भरपूर करने वाली खेती से दुनिया को रूबरू कराया. यह बात दीगर है कि खेती की समृद्ध परंपराओं से लैस भारत के जनमानस ने कालांतर में विकास की आंधी में उलझ कर अपनी ही खेती की समृद्ध विरासत को विसरा दिया था, मगर अब एक बार फिर भारत की परंपरागत खेती इन सामयिक संकटों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली साबित होने लगी है.
वर्तमान परिदृश्य में इतना तो साफ हो गया है कि प्रकृति के लिए गंभीर खतरे पैदा करने वाली रासायनिक खेती की मौजूदा परिपाटी अब लंबे समय तक नहीं चलनी चाहिए. क्योंकि इसका तात्कालिक असर ईरान युद्ध के कारण रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति पर पड़ना तय है. सरकारें भले ही कितने भी दावे क्यों न कर लें, मगर रासायनिक खेती कर रहे किसानों को अगले कुछ सालों तक जहरीले उर्वरकों का गंभीर संकट झेलना पडेगा. ऐसे में प्राकृतिक एवं परंपरागत खेती को फिर से अपनाने के लिए पिछले एक दशक से भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहा मिशन, मौजूदा हालात के मद्देनजर, एक दूरदर्शी पहल साबित हुआ है। जिन किसानों ने भारत में सहस्त्राब्दियों से चली आ रही गौ आधारित खेती के महत्व को समझकर इसे अपना लिया है, उनके लिए युद्ध जनित मौजूदा दौर की चुनौतियां किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं कर पा रही हैं. अपने पुरखों की राह पर चल रहे इन किसानों के लिए यह आपदा, एक ऐसा अवसर बन कर आई है, जो जल, जंगल, जमीन से लेकर जन जन के लिए सुखद अनुभव प्रदान करने की गारंटी बनेगी.
खेती की सतत परंपराओं की ओर लौटने से मिलेगा हर मुश्किल का हल
इस लिहाज से अगर बडे फलक पर देखा जाए तो यह समय उन किसानों के लिए भी उपयुक्त होगा जो पिछले कुछ सालों से खेती की चुनौतियों के आगे खुद को बेबस महसूस कर रहे थे. रासायनिक खेती के दुश्चक्र में फंसे इन किसानों ने कालांतर में अपनी राह बदलने का मन तो बनाया था, लेकिन उनके मन में समायी आशंकाओं का ज्वार भाटा उन्हें निर्णायक मोड़ पर आने से रोक रहा था. कालचक्र ने आज मानव जाति को जिस मुहाने पर ला खडा किया है, उसमें कम से कम हमारे कामगारों और किसानों के पास अब मूकदर्शक बन कर इंतजार करने का विकल्प बहुत सीमित हो गया है. इन सीमित रास्तों से निकला दूरगामी संदेश हमें बता रहा है कि हजारों सालों से चली आ रही खेती की सतत परंपराओं पर पुनर्विचार कर इसे आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों से लैस करके खेती को फिर से सततता के क्रम में लाना ही समझदारी है. प्रारब्ध के इस गूढ़ संदेश को किसानों के समक्ष वैज्ञानिक तरीके से तथ्यों के साथ पेश करने की ईमानदार पहल सरकारों की ओर से की जानी चाहिए. उम्मीद की जानी चाहिए कि वर्तमान दौर की चुनौतियों से उपजे इन संकेतों को भावी पीढ़ी समझते हुए इसमें सुझाए गए समाधानों को आत्मसात कर अपने भविष्य को संवारने का काम करेगी.