पाक के दावे से भारत का बासमती संकट में! मिडिल ईस्ट में फंसी खेप, पाकिस्तान से पहचान की जंग ने बढ़ाया संकट
Basmati Rice: भारत-पाक बासमती पहचान विवाद और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने चावल कारोबार की रफ्तार धीमी कर दी है. शिपमेंट अटकने, कीमतों पर दबाव और GI टैग की कानूनी लड़ाई से एक्सपोर्टर्स के साथ किसानों की चिंता बढ़ गई है. AIREA महासचिव अजय भालोटिया मानते हैं कि बातचीत से समाधान निकलना ही सबसे बेहतर रास्ता साबित हो सकता है.
GI Dispute: भारत का बासमती और नॉन-बासमती चावल दुनिया के कई बड़े बाजारों में जाता है, लेकिन इस समय दोहरी चुनौती सामने है. एक तरफ मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव से ईरान, इराक, सऊदी, यूएई और यमन जैसे बाजारों में शिपमेंट अटक रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच बासमती के प्रोटेक्टेड जिओग्राफिकल इंडिकेशन (PGI) और पहचान की लड़ाई लंबे समय से चल रही है. किसान इंडिया (Kisan India) के खास शो माइक पे मुलाकात में अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ के महासचिव एवं फॉर्च्यून राइस के निदेशक अजय भालोटिया (Ajay Bhalotia) ने बताया कि भारत अपने हिमालयी क्षेत्रों में उत्पादित बासमती पर एक्सक्लूसिव अधिकार चाहता है, जबकि पाकिस्तान इसे दोनों देशों का साझा उत्पाद बताता है. यह विवाद यूरोपीय संघ (EU) सहित वैश्विक बाजारों में निर्यात को प्रभावित कर रहा है.
किसान इंडिया (Kisan India) के पॉडकॉस्ट में अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ के महासचिव एवं फॉर्च्यून राइस के निदेशक अजय भालोटिया (Ajay Bhalotia) ने बताया कि हालिया रिपोर्ट्स में ये भी साफ हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में पाकिस्तान को अभी कोई अंतिम मान्यता नहीं मिली है, वहां भारत और पाकिस्तान दोनों के दावे अभी विचाराधीन हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि इसके बारे में उन्होंने और क्या बताया…
बासमती की असली लड़ाई क्या है?
अजय भालोटिया ने बताया कि बासमती को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद नया नहीं है. बंटवारे से पहले पंजाब क्षेत्र के दोनों हिस्सों में यह चावल उगाया जाता था. इसी वजह से दोनों देश इसे अपनी साझा विरासत मानते हैं. भारत ने अपने यहां हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों को बासमती क्षेत्र माना है. समस्या तब बढ़ी जब भारत के दूसरे हिस्सों, जैसे मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी अच्छी क्वालिटी का बासमती उगने लगा, लेकिन GI नियमों के कारण उसे हर जगह “बासमती” नाम से मान्यता नहीं मिल पाती. यही वजह है कि किसान और एक्सपोर्टर दोनों चाहते हैं कि नियमों को समय के हिसाब से फिर से देखा जाए.
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पाकिस्तान ने बढ़ाया दावा, EU में चल रही कानूनी लड़ाई
पाकिस्तान ने अपने यहां बासमती के जिलों का दायरा बढ़ाकर 15 से 45 जिलों तक कर दिया और यूरोपियन यूनियन में दस्तावेज जमा किए. इसके बाद भारत की नोडल एजेंसी APEDA और ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई. EU में यह मामला अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है और दोनों देशों की तरफ से कानूनी प्रक्रिया चल रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक EU अब भी किसी साझा समाधान या संयुक्त पहचान की दिशा में रास्ता खोज रहा है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय बासमती (Indian Basmati) और पाकिस्तानी बासमती (Pakistani Basmati) के नाम से संयुक्त मान्यता ज्यादा व्यावहारिक रास्ता हो सकता है.
ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड को लेकर क्या है सच्चाई?
हाल के दिनों में यह चर्चा तेज हुई कि ऑस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान के बासमती दावे को मान लिया है. लेकिन उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार ऐसा कोई अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है. भारत की APEDA ने साफ किया है कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में दोनों देशों के आवेदन अभी भी ट्रिब्यूनल और रजिस्ट्री स्तर पर विचाराधीन हैं. पाकिस्तान को वहां अब तक अंतिम रजिस्ट्रेशन नहीं मिला है. इसका मतलब यह है कि अभी बाजार में जो चर्चा है, वह पूरी तरह अंतिम सच्चाई नहीं है. असली फैसला आने में अभी समय लग सकता है.
किसान और एक्सपोर्टर को क्या नुकसान?
इस पूरी लड़ाई का सबसे बड़ा असर किसान, मिलर और एक्सपोर्टर पर पड़ रहा है. कानूनी केसों में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, जबकि इसका सीधा फायदा जमीन पर तुरंत नहीं दिखता. दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट संकट से पहले ही लाखों टन बासमती शिपमेंट अटकी हुई है, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार को पाकिस्तान के साथ बातचीत कर क्वालिटी, खुशबू, लंबाई और टेस्ट जैसे वैज्ञानिक मानकों पर आधारित संयुक्त समाधान निकालना चाहिए. अगर खरीदार देश दोनों देशों का बासमती लेना चाहता है, तो लंबी कानूनी लड़ाई से बेहतर है कि साझा पहचान बनाकर बाजार को स्थिर किया जाए.
बासमती GI टैग पर भारत-पाकिस्तान में क्यों है टकराव?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान बासमती को लेकर इसलिए लड़ रहा है क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा बासमती निर्यातक है और इससे हर साल करीब 6.8 अरब डॉलर कमाता है, जबकि पाकिस्तान को लगभग 2.2 अरब डॉलर की आय होती है. पाकिस्तान को डर है कि अगर भारत को मजबूत GI पहचान मिल गई तो उसका बाजार कमजोर पड़ सकता है. वहीं भारत का कहना है कि GI टैग से किसी एक देश का एकाधिकार नहीं बनता, बल्कि गुणवत्ता और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ती है. GI यानी प्रोटेक्टेड जिओग्राफिकल इंडिकेशन किसी खास क्षेत्र के खास उत्पाद की कानूनी पहचान है, जिससे किसानों, व्यापारियों और कारीगरों को सही श्रेय और बेहतर मुनाफा मिलता है.