Basmati Export Crisis: भारत का बासमती और नॉन-बासमती चावल दुनिया के कई देशों में जाता है, लेकिन इस समय मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने चावल कारोबार की रफ्तार को धीमा कर दिया है. खासकर ईरान, इराक, सऊदी, यूएई और यमन जैसे बड़े बाजारों में शिपमेंट अटकने से भारतीय एक्सपोर्टर्स, मिलर्स और किसानों की चिंता बढ़ गई है. किसान इंडिया (Kisan India) के खास शो माइक पे मुलाकात में अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ के महासचिव एवं फॉर्च्यून राइस के निदेशक अजय भालोटिया (Ajay Bhalotia) ने बताया कि सरकार ने ECGC के जरिए चावल एक्सपोर्टर्स राहत दी है, लेकिन अगर संकट लंबा चला तो किसानों को बड़ा नुकसान हो सकता है.
हाल के अनुमानों के मुताबिक करीब 4 लाख टन बासमती चावल रास्ते में या पोर्ट पर फंसा है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस जंग का सबसे बड़ा असर भारतीय किसानों पर खाद, पेस्टिसाइड और फसल की लागत के रूप में दिख सकता है. सरकार वैकल्पिक देशों से खाद की सप्लाई बढ़ाने में जुटी है, ताकि नए सीजन में किसानों को कमी न हो. उन्होंने बताया कि बासमती और गैर-बासमती दोनों बाजारों पर दबाव है, जबकि परमल चावल पर सरकार को घरेलू जरूरत और निर्यात के बीच संतुलित रुख रखना चाहिए. बासमती को लेकर पाकिस्तान के साथ जीआई विवाद का हल द्विपक्षीय बातचीत और अंतरराष्ट्रीय ट्रेड नियमों से ही संभव है.
ECGC से एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत
अजय भालोटिया ने बताया कि सरकार ने सबसे बड़ी राहत चावल एक्सपोर्टर्स ECGC कवर के जरिए दी है. जिन एक्सपोर्टर्स की पहले से मल्टी-बायर पॉलिसी चल रही थी, अब उन्हें 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शिपिंग और वॉर-रिस्क जैसे चार्ज का मुआवजा मिल सकेगा. सरकार ने हाल ही में मिडिल ईस्ट संकट से प्रभावित निर्यातकों के लिए 497 करोड़ रुपये की RELIEF स्कीम भी शुरू की है, जिसमें फ्रेट, इंश्योरेंस और देरी से जुड़े झटकों को कम करने पर फोकस है. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ एक्सपोर्टर्स ECGC पॉलिसी नहीं लेते थे. ऐसे कारोबारियों के लिए भी राहत पैकेज में 50 फीसदी नुकसान तक और अधिकतम 50 लाख रुपये की मदद का प्रावधान रखा गया है. यानी 1 करोड़ का नुकसान है तो 50 लाख तक राहत मिल सकती है, लेकिन इससे ज्यादा नुकसान पर भी सीमा 50 लाख ही रहेगी.
ईरान-इराक पर सबसे ज्यादा असर, 25 फीसदी व्यापार खतरे में
अजय भालोटिया के मुताबिक भारत के बासमती चावल का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट जाता है. इसमें ईरान और इराक जैसे देश अकेले करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं, जबकि सऊदी, यूएई और यमन समेत पांच बड़े बाजार लगभग आधा निर्यात लेते हैं. उन्होंने आसान भाषा में समझाया कि समस्या यह है कि जहां आसानी से चावल भेजा जा सकता है, वहां इतनी बड़ी खपत नहीं है. ऐसे में अगर मिडिल ईस्ट संकट लंबा चलता है, तो भारत के पास अतिरिक्त चावल तो होगा, लेकिन खरीदने वाला बड़ा बाजार नहीं मिलेगा. यही वजह है कि अभी कई सौदों पर रोक लगी है और नए कॉन्ट्रैक्ट बहुत धीमे हो गए हैं.
आम जनता को अभी फायदा, किसानों को आगे नुकसान
इस संकट का एक दिलचस्प असर घरेलू बाजार पर भी दिख सकता है. अगर एक्सपोर्ट कम होता है, तो भारत में चावल की सप्लाई बढ़ जाएगी. इसका मतलब है कि आम लोगों को चावल सस्ता मिल सकता है, जिससे उनके घर का बजट थोड़ा हल्का होगा. लेकिन अजय भालोटिया ने साफ कहा कि यह फायदा सिर्फ शॉर्ट टर्म का है. भारत हर साल करीब 50,000 रुपये करोड़ का बासमती चावल एक्सपोर्ट करता है, और अगर यह रफ्तार रुकी तो विदेशी मुद्रा कम आएगी. साथ ही पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसानों को अगली फसल आने पर सही दाम मिलने में दिक्कत हो सकती है. यानी अभी जनता को सस्ता चावल अच्छा लगेगा, लेकिन 6-7 महीने बाद यही संकट किसानों की कमाई पर भारी पड़ सकता है.
पैकेजिंग, खाद और अगले सीजन पर नजर
शो में पैकेजिंग और अगले सीजन को लेकर भी अहम बात हुई. पैक्ड चावल में इस्तेमाल होने वाले कुछ रॉ मैटेरियल पर सरकार ने कस्टम ड्यूटी जीरो कर राहत दी है, ताकि लागत न बढ़े. इसके साथ ही डॉलर में उतार-चढ़ाव को कंट्रोल करने की कोशिश भी जारी है. सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि अगर तनाव लंबा चलता है तो खाद, पेस्टिसाइड और लॉजिस्टिक्स पर क्या असर पड़ेगा, क्योंकि नया सीजन करीब है. अगर सप्लाई चैन ज्यादा प्रभावित हुई तो सिर्फ एक्सपोर्ट ही नहीं, खेती की लागत भी बढ़ सकती है. सीधी बात यह है कि अभी चावल उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत मिल सकती है, लेकिन लंबे समय तक संकट रहा तो सबसे बड़ा झटका भारतीय किसान और एक्सपोर्ट सेक्टर को लगेगा. सरकार की राहत योजना ने फिलहाल सांस दी है, मगर बाजार की असली दिशा मिडिल ईस्ट हालात तय करेंगे.