रेल परियोजना के नाम पर कटेंगे 5 लाख से ज्यादा अखरोट-सेब के पेड़? कश्मीर के किसानों में डर

स्थानीय किसानों का कहना है कि इस रेलवे लाइन के निर्माण से करीब 5 लाख से ज्यादा सेब के पेड़ और एक लाख से अधिक अन्य पेड़ काटे जाएंगे. इनमें शहतूत, अखरोट, चिनार और विलो जैसे संरक्षित पेड़ भी शामिल हैं, जिन्हें कानून के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है.

नई दिल्ली | Updated On: 19 Jan, 2026 | 07:33 AM

कश्मीर की पहचान सिर्फ उसकी वादियों से नहीं, बल्कि उसके सेब के बागों से भी है. यही बाग हजारों परिवारों की रोजी-रोटी हैं और पूरी घाटी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं. लेकिन अब एक ऐसी परियोजना की योजना बन रही है, जिसने सेब किसानों की नींद उड़ा दी है. पुलवामा के काकपोरा से शोपियां के कुन्सू गांव को जोड़ने के लिए प्रस्तावित रेलवे लाइन ने पर्यावरण और आजीविका दोनों के लिए बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है.

दूरी कम, नुकसान बेहद बड़ा

ग्रेटर कश्मीर की खबर के अमुसार, काकपोरा और कुन्सू गांव के बीच की सीधी दूरी महज 20 किलोमीटर है. यह इलाका पहले से ही सड़क नेटवर्क से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. इसके बावजूद सरकार 27 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन बिछाने की तैयारी कर रही है. इस परियोजना को अवंतिपोरा-शोपियां रेलवे लाइन के नाम से मंजूरी दी गई है और इसका फाइनल लोकेशन सर्वे भी पूरा किया जा चुका है. लेकिन इस सर्वे की कीमत सेब किसानों को अपने बाग उजड़ने के रूप में चुकानी पड़ सकती है.

लाखों पेड़ों पर चलेगी कुल्हाड़ी

स्थानीय किसानों का कहना है कि इस रेलवे लाइन के निर्माण से करीब 5 लाख से ज्यादा सेब के पेड़ और एक लाख से अधिक अन्य पेड़ काटे जाएंगे. इनमें शहतूत, अखरोट, चिनार और विलो जैसे संरक्षित पेड़ भी शामिल हैं, जिन्हें कानून के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है. कई जगहों पर पूरी तरह विकसित सेब के बाग रेलवे लाइन की जद में आ रहे हैं. यही नहीं, इस परियोजना से दर्जनों सिंचाई नालियां भी प्रभावित होंगी, जिससे आने वाले समय में खेती पर और संकट गहराएगा.

छोटे किसान, बड़ा दर्द

इस इलाके की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि यहां के ज्यादातर किसान बेहद छोटे हैं. औसतन एक परिवार के पास सिर्फ 2 से 3 कनाल जमीन है, जिस पर पूरा घर चलता है. शोपियां के कुन्सू गांव में कई किसानों की जमीन रेलवे स्टेशन के लिए अधिग्रहित की जा रही है. एक किसान नजीर अहमद डार, जिनके पास सिर्फ 2 कनाल सेब का बाग है, अपनी पांच बेटियों के भविष्य को लेकर बेहद परेशान हैं. उनका कहना है कि मुआवजा उनके नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता, क्योंकि आसपास जमीन खरीदना नामुमकिन है.

किसानों की आवाज दबती हुई

कई गांवों में पीले रंग के पत्थर लगाकर जमीन चिन्हित की जा चुकी है, लेकिन किसानों से न तो राय ली गई और न ही कोई सार्वजनिक सुनवाई हुई. भूमि अधिग्रहण कानून के तहत ग्राम सभा और सामाजिक प्रभाव आंकलन जरूरी है, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया. इससे किसानों में गहरा असंतोष और डर फैल गया है.

पर्यावरण पर भी गहरा असर

सेब के बाग केवल आमदनी का साधन नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहद जरूरी हैं. ये पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं और हवा को साफ करते हैं. लाखों पेड़ों की कटाई से जैव विविधता को नुकसान पहुंचेगा, तापमान बढ़ेगा और प्रदूषण का स्तर भी ऊपर जाएगा. पुलवामा और शोपियां के बाग पूरे क्षेत्र के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं.

विकास या विनाश?

किसानों का सवाल सीधा है जब काकपोरा में पहले से रेलवे स्टेशन मौजूद है और सड़क कनेक्टिविटी भी बेहतर है, तो इतनी बड़ी पर्यावरणीय और आर्थिक कीमत चुकाकर नई रेलवे लाइन क्यों? उनका मानना है कि सड़क को चौड़ा करना कहीं ज्यादा व्यावहारिक और सुरक्षित विकल्प है.

आज कश्मीर के सेब किसान सिर्फ अपने बाग नहीं, बल्कि अपनी पहचान, भविष्य और पर्यावरण को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. यह समय है कि विकास के नाम पर उठाए जा रहे फैसलों पर दोबारा सोचा जाए, ताकि तरक्की इंसान और प्रकृति दोनों के साथ न्याय कर सके.

Published: 19 Jan, 2026 | 08:00 AM

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