Ken-Betwa Link Project: मध्य प्रदेश के छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना और रुंझ-मझगुवां बांध से प्रभावित आदिवासी परिवारों का विरोध अब और तेज हो गया है. पिछले 11 दिनों से जारी आंदोलन में सैकड़ों आदिवासी महिलाओं ने नदी किनारे उतरकर पंचतत्व आंदोलन के जरिए सामूहिक विरोध दर्ज कराया. महिलाओं ने तख्तियां, नारे और प्रतीकात्मक प्रदर्शन के माध्यम से कहा कि उनके जंगल, जमीन और घर इस परियोजना की भेंट चढ़ रहे हैं. एक प्रदर्शनकारी ने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि अगर उनकी मांगें नहीं सुनी तो आंदोलन और उग्र हो सकता है. दूसरी ओर सरकार इस परियोजना को बुंदेलखंड की सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा जरूरतों के लिए गेमचेंजर बता रही है.
11वें दिन पंचतत्व आंदोलन से तेज हुआ विरोध
छतरपुर और पन्ना क्षेत्र के प्रभावित आदिवासी परिवार पिछले 11 दिनों से धरने पर डटे हुए हैं. बीते बुधवार को सैकड़ों महिलाओं ने नदी किनारे इकट्ठा होकर पंचतत्व आंदोलन किया, जिसमें मिट्टी, पानी और प्रतीकात्मक रस्मों के जरिए अपना दर्द सामने रखा गया. प्रदर्शनकारी महिलाओं ANI से बात करते हुए बताया कि बांध निर्माण के नाम पर उन्हें उनके घरों, खेतों और जंगलों से हटाया जा रहा है, जबकि अब तक कोई अधिकारी उनकी बात सुनने नहीं पहुंचा. महिलाओं ने साफ कहा कि जब तक पुनर्वास, मुआवजा और सुरक्षा को लेकर स्पष्ट आश्वासन नहीं मिलता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.
महिलाओं का गुस्सा-हम भी उग्र रूप धारण कर सकते हैं
प्रदर्शन के दौरान कई महिलाओं ने बेहद भावुक और गुस्से भरे शब्दों में अपनी पीड़ा रखी. उनका कहना है कि बच्चे डर में जी रहे हैं, परिवार सुरक्षित नहीं है और सरकार को उनकी जिंदगी की कोई चिंता नहीं है. एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि जंगल, जमीन और घर छीने जाने की वजह से वे विरोध के लिए मजबूर हैं. उनका कहना था कि अगर लगातार अनदेखी हुई तो आंदोलन का रूप और उग्र हो सकता है. ये बयान इस बात का संकेत है कि बेघर करने का मुद्दा अब सिर्फ मुआवजे का नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान का संघर्ष बन चुका है.
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परियोजना से विस्थापन पर आदिवासी परिवारों का विरोध तेज हुआ.
क्या है केन-बेतवा लिंक परियोजना?
सरकार के मुताबिक केन-बेतवा लिंक राष्ट्रीय परियोजना देश की बड़ी सिंचाई योजनाओं में शामिल है. इसके तहत केन नदी पर 77 मीटर ऊंचा और 2.13 किलोमीटर लंबा दौधन बांध बनाया जा रहा है. इसके साथ दो सुरंगें और 221 किलोमीटर लंबी लिंक नहर बनाई जाएगी, जिससे केन का अतिरिक्त पानी बेतवा नदी में भेजा जाएगा. इस परियोजना से 10 जिलों के करीब 2,000 गांवों में 8.11 लाख हेक्टेयर सिंचाई, लगभग 7 लाख किसान परिवारों को लाभ और मध्य प्रदेश के 44 लाख व यूपी के 21 लाख लोगों को पेयजल मिलने का दावा है. इसके अलावा परियोजना से 103 मेगावाट हाइड्रोपावर और 27 मेगावाट सोलर ऊर्जा भी पैदा होगी.
विकास बनाम विस्थापन-सबसे बड़ा सवाल
ये परियोजना जहां बुंदेलखंड के लिए पानी, सिंचाई और ऊर्जा का बड़ा समाधान मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों, जंगलों और आदिवासी परिवारों के प्रर्दशन ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. सरकार का कहना है कि इससे चंदेल काल के 42 ऐतिहासिक तालाबों का नवीनीकरण भी होगा, जिससे भूजल स्तर सुधरेगा. लेकिन प्रभावित परिवारों की मांग है कि पहले पुनर्वास, मुआवजा को पूरी तरह स्पष्ट किया जाए. यही वजह है कि यह आंदोलन अब सिर्फ स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि विकास और मानव अधिकारों के बीच संतुलन की बड़ी बहस बन छिड़ गई है.