जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम में तेजी से बदलाव देखे जा रहे हैं. बेमौसम बारिश और अत्यधिक गर्मी ने कृषि क्षेत्र को काफी प्रभावित किया है. कुछ इलाकों में फसलों के उत्पादन और क्वालिटी पर भी असर देखने को मिल रहा है. हर इंडस्ट्री अब अपनी-अपनी तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कामों को रोकने की कोशिश कर रही है. खाद यानी फर्टिलाइजर इंडस्ट्री भी यह जिम्मेदारी निभाने में पीछे नहीं है. ये अक्सर ही कहा जाता है कि खाद बनाने से ग्लोबल ग्रीनहाउस गैसों का लगभग 1% उत्सर्जन होता है. अब यह इंडस्ट्री सिर्फ खेती में बेहतर पैदावार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी सप्लाई चेन को पर्यावरण के हिसाब से सुधारने की कोशिश कर रही है.
भारत में तो ये बदलाव और भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि यहां की अर्थव्यवस्था और लोगों का पेट भरने, दोनों ही कामों के लिए खेती एक बुनियादी जरूरत है. हालांकि, परंपरागत खादों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अब मिट्टी को बेजान बनाने का काम कर रहा है. इतना ही नहीं, यह पानी को जहरीला भी कर रहा है और हवा में भी जहर घोलता जा रहा है. अब वक्त आ चुका है कि भारत खाद बनाने और उसे इस्तेमाल करने के तरीकों में बदलाव करे.
पुराना कानून, नई सोच के साथ FCO का बदला हुआ रूप
तेजी से बदलते हुए इस वक्त में भारत में खाद से जुड़े नियम-कानून भी पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए बदल रहे हैं. 1955 में बना Fertilizer Control Order (FCO) अब सिर्फ रासायनिक खादों तक सीमित नहीं है. इसमें बायो-फर्टिलाइजर, ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर और बायोस्टिमुलेंट्स को भी शामिल किया गया है. 2025 में आए चौथे संशोधन में ह्युमिक एसिड, फुल्विक एसिड, सीवीड आधारित बायोस्टिमुलेंट्स, प्रोटीन हाइड्रोलिसेट्स और माइक्रोबियल फॉर्मुलेशन्स जैसे टिकाऊ इनपुट्स की खास स्पेसिफिकेशन तय की गई हैं.
यूरिया की लत ने बिगाड़ दिया है संतुलन
भारत में काफी लंबे वक्त से सस्ती और सब्सिडी वाली यूरिया का इस्तेमाल होता आ रहा है. यूरिया का इतना ज्यादा इस्तेमाल हुआ है कि इसकी वजह से मिट्टी का संतुलन ही बिगड़ गया है. जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से मिट्टी की सेहत खराब हुई, पानी में नाइट्रेट पहुंच गया है और हवा में N2O जैसी हानिकारक गैसें बढ़ गईं. 2015 में नीम कोटेड यूरिया पॉलिसी लाई गई थी, जिसका मकसद इसी गड़बड़ी को थोड़ा सुधारना था. इस नीति के तहत कम से कम 75% यूरिया को नीम से कोट करना जरूरी कर दिया गया था, ताकि इसका गलत इस्तेमाल रुके और पौधों को ज्यादा फायदा मिले.
PM-PRANAM और नैनो यूरिया सरकार के नए कदम
फर्टिलाइजर ट्रेडिंग कंपनी ट्रेडलिंक इंटरनेशनल के फाउंडर चेयरमैन अभिषेक वाडेकर ने कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार ने कई नई योजनाएं शुरू की हैं. PM-PRANAM यानी Promotion of Organic Fertilizers and Alternative Nutrients for Agriculture Management भी एक ऐसी स्कीम है. यह स्कीम किसानों को जैविक और वैकल्पिक खादों के लिए प्रेरित करने का काम करती है. इसके तहत जैविक और बायो‑फर्टिलाइजर का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों को सरकार की तरफ से उर्वरक सब्सिडी की 50% बचत के बराबर Incentive दिया जाता है.
साथ ही, नैनो यूरिया का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है, जो कम मात्रा में ज्यादा असर दिखाता है. इससे न सिर्फ मिट्टी और पानी को नुकसान कम होगा, बल्कि सरकार का सब्सिडी का बोझ भी घटेगा. अभी तक कुल 7 नैनो यूरिया प्लांट ऑपरेशनल हैं, जिनकी क्षमता 27.22 करोड़ बोतलें सालाना है. सिर्फ रबी के सीजन में ही करीब 2.5 करोड़ बोतलें बिक जाती हैं.
अब किसानों की सोच भी बदल रही है
अब भारत का किसान भी धीरे-धीरे समझ रहा है कि फसल की मात्रा से ज्यादा जरूरी उसकी क्वालिटी और मिट्टी की सेहत है. किसान अब ऑर्गेनिक फार्मिंग की ओर बढ़ रहे हैं. उन्हें समझ आ रहा है कि रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से उनके खेत धीरे-धीरे बंजर हो रहे हैं. वहीं खाने में भी केमिकल की मात्रा लगातार बढ़ती दिख रही है. अब स्मार्ट फार्मिंग और प्रिसीजन एग्रीकल्चर जैसे तरीकों को अपनाया जा रहा है.
जैविक खादों की मांग बढ़ रही है
भारतीय मार्केट में जैविक और बायो-फर्टिलाइजर की मांग तेजी से बढ़ रही है. इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं. पहली ये कि उपभोक्ता अब ज्यादा से ज्यादा ऑर्गेनिक फूड मांग रहे हैं. वहीं दूसरी वजह ये है कि सरकार भी ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स को बढ़ावा दे रही है. ऐसे में खाद बनाने वाली कंपनियां भी अब पारंपरिक रासायनिक खाद से आगे बढ़कर ऑर्गेनिक, बायो और कस्टमाइज्ड पोषक उत्पाद बनाने में दिलचस्पी दिखा रही हैं.
बता दें कि जैविक खेती सालाना करीब 13% की दर से बढ़ रही है. ये दिखाता है कि सरकार की योजनाएं और सब्सिडी किसानों तक सही तरह से पहुंच रही हैं और असर भी दिखा रही हैं. ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर्स को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अगस्त 2024 में ही 1500 रुपये प्रति मीट्रिक टन की दर से Market Development Assistance की मंजूरी भी दी.
इंडस्ट्री में इन्वेस्टमेंट और इनोवेशन का नया दौर
अब इंडस्ट्री सिर्फ पुराने फॉर्मूले से खाद नहीं बना रही. अब कंपनियां रिसर्च और डेवलपमेंट में भारी पैसा लगा रही हैं, ताकि नई और असरदार खादें बनाई जा सकें. प्रिसीजन फार्मिंग टेक्नोलॉजी, ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया जैसी इनोवेशन पर जोर दिया जा रहा है जिससे उत्पादन तो हो ही, लेकिन पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.
चुनौतियां भी कम नहीं हैं
वैसे यह राह इतनी आसान नहीं है. भारत अभी भी बहुत हद तक इंपोर्ट यानी आयात पर निर्भर है. सब्सिडी की नीति को सही तरीके से लागू करना और नए नियमों को सरल बनाना भी एक बड़ी चुनौती है. लेकिन इसके बावजूद सरकार और कंपनियों की गंभीरता को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले सालों में भारतीय खाद उद्योग एक बड़ी क्रांति की ओर बढ़ रहा है.
सिर्फ पैदावार नहीं, अब पर्यावरण भी है जिम्मेदारी
आज की तारीख में खाद कंपनियों की जिम्मेदारी सिर्फ फसल बढ़ाना नहीं है. उन्हें उत्पादन के हर स्तर पर ऊर्जा की बचत भी करनी है. उन्हें पानी की खपत कम करनी है और रिसाइकलिंग को बढ़ाना है. सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को भी लगातार बेहतर बनाया जा रहा है. नए तकनीकी उपायों के साथ-साथ इंडस्ट्री खुद को लगातार अपडेट कर रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और समृद्ध कृषि व्यवस्था मिल सके.