मध्यप्रदेश बना तेंदुओं का कब्रिस्तान, 14 महीनों में 149 मौतें… क्या सुरक्षित नहीं रहे जंगल?

जनवरी 2025 से लेकर करीब 14 महीनों के अंदर राज्य में 149 तेंदुओं की मौत दर्ज की गई है. यह आंकड़ा इसलिए और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि मध्यप्रदेश में देश की सबसे ज्यादा तेंदुआ आबादी पाई जाती है. यानी जहां इनकी संख्या ज्यादा है, वहीं खतरे भी उतने ही बढ़ते नजर आ रहे हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 11 Apr, 2026 | 08:00 AM

madhya pradesh leopard deaths: मध्यप्रदेश को अक्सर “टाइगर स्टेट” के नाम से जाना जाता है, लेकिन अब यहां तेंदुओं की मौत के आंकड़ों ने नई चिंता खड़ी कर दी है. हाल ही में सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए जो जानकारी सामने आई है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे जंगलों में वन्यजीव सच में सुरक्षित हैं या नहीं.

द हिन्दु की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 से लेकर करीब 14 महीनों के अंदर राज्य में 149 तेंदुओं की मौत दर्ज की गई है. यह आंकड़ा इसलिए और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि मध्यप्रदेश में देश की सबसे ज्यादा तेंदुआ आबादी पाई जाती है. यानी जहां इनकी संख्या ज्यादा है, वहीं खतरे भी उतने ही बढ़ते नजर आ रहे हैं.

RTI से सामने आई हकीकत

यह जानकारी एक सामाजिक कार्यकर्ता अजय दुबे द्वारा दायर RTI के जवाब में सामने आई. उनका कहना है कि इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में तेंदुओं की मौत होना सामान्य नहीं है. यह साफ दिखाता है कि कहीं न कहीं हमारी संरक्षण व्यवस्था कमजोर पड़ रही है. यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, बल्कि यह उन खतरों की ओर इशारा करते हैं जो धीरे-धीरे वन्यजीवों को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

सड़क हादसे सबसे बड़ी वजह

तेंदुओं की मौत का सबसे बड़ा कारण सड़क दुर्घटनाएं सामने आई हैं. कुल मौतों में से करीब 31 प्रतिशत मौतें सड़क हादसों में हुई हैं. इनमें भी बड़ी संख्या राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर दर्ज की गई है. दरअसल, आजकल जंगलों के बीच से गुजरने वाली सड़कों की संख्या बढ़ रही है और गाड़ियों की रफ्तार भी बहुत तेज होती है. ऐसे में जब तेंदुए या अन्य जानवर सड़क पार करते हैं, तो हादसे हो जाते हैं.

प्राकृतिक कारण और आपसी लड़ाई

कुछ मौतें ऐसी भी हैं जो प्राकृतिक कारणों से हुई हैं. करीब 24 प्रतिशत तेंदुए उम्र, बीमारी या अन्य प्राकृतिक वजहों से मरे हैं. यह एक हद तक सामान्य माना जा सकता है. इसके अलावा करीब 21 प्रतिशत मौतें तेंदुओं के आपसी संघर्ष के कारण हुई हैं. तेंदुए अपने इलाके को लेकर काफी संवेदनशील होते हैं और कई बार क्षेत्र के लिए लड़ाई जानलेवा साबित हो जाती है.

अवैध शिकार और बिजली का खतरा

तेंदुओं के लिए एक बड़ा खतरा अवैध शिकार भी है. करीब 14 प्रतिशत मौतें शिकार या प्रतिशोध में की गई हत्या के कारण हुई हैं. कई बार गांवों में लोग जानवरों से फसल बचाने के लिए बिजली का करंट लगा देते हैं, जिससे तेंदुए भी उसकी चपेट में आ जाते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, आठ तेंदुओं की मौत बिजली के करंट से हुई, जबकि कुछ तेंदुए जाल में फंसकर भी मारे गए.

कई मामलों में कारण ही नहीं पता

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि करीब 9 प्रतिशत मामलों में तेंदुओं की मौत का कारण ही पता नहीं चल पाया. इसका मतलब यह है कि निगरानी और जांच व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी है. अगर मौत का कारण ही साफ नहीं होगा, तो भविष्य में ऐसे हादसों को रोकना और भी मुश्किल हो जाएगा.

वन विभाग क्या कहता है

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वन विभाग का कहना है कि यह मौतें ‘स्वीकार्य सीमा’ के भीतर हैं. उनका तर्क है कि राज्य में करीब 4,000 तेंदुए हैं और 149 मौतें लगभग 4 प्रतिशत के आसपास हैं, जो सामान्य मानी जाती हैं. अधिकारियों के अनुसार, तेंदुए अक्सर इंसानी बस्तियों के आसपास भी घूमते हैं, जिससे खतरा बढ़ जाता है.

क्या किए जा रहे हैं उपाय

वन विभाग के अनुसार, इन घटनाओं को कम करने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं. जैसे सड़कों पर अंडरपास बनाए जा रहे हैं, वन्यजीव गलियारों को सुरक्षित किया जा रहा है और चेतावनी संकेत लगाए जा रहे हैं. इसके अलावा नियमित गश्त और लोगों को जागरूक करने का काम भी किया जा रहा है.

बढ़ती संख्या के साथ बढ़ रहा खतरा

मध्यप्रदेश में तेंदुओं की संख्या पिछले कुछ सालों में बढ़ी है. 2018 में जहां यह संख्या करीब 3,400 थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 3,900 हो गई है. लेकिन संख्या बढ़ने के साथ-साथ उनके सामने खतरे भी बढ़ गए हैं. इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव भी अब ज्यादा देखने को मिल रहा है.

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