City Of Bamboo: बांस का शहर, जहां जंगल से लेकर घर तक बांस बनता है हर किसी की कमाई का रास्ता!

Bans Ka Shehar: राजस्थान का बांसवाड़ा शहर अपने घने बांस के जंगलों और आदिवासी संस्कृति के लिए मशहूर है. यहां लोग बांस का इस्तेमाल घर बनाने, खेतों के औजार, बाड़, टोकरियां और घरेलू सामान बनाने में करते हैं. बांस सिर्फ जंगल का पेड़ नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और कमाई का भी अहम हिस्सा रहा है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 27 Jan, 2026 | 02:25 PM

City Of Bamboo: राजस्थान के दक्षिणी हिस्से में बसा बांसवाड़ा शहर अपने घने बांस के जंगलों और हरी-भरी वादियों के लिए जाना जाता है. इसे लोग ‘बांसों का शहर’ भी कहते हैं. पुराने समय में यह पूरा इलाका बांस के जंगलों से भरा हुआ था और स्थानीय लोगों की जिंदगी में बांस का बहुत महत्व था. लोग बांस का इस्तेमाल घर बनाने, खेती के औजार बनाने और सामान रखने वाली टोकरियों जैसी रोजमर्रा की चीजों में करते थे. साथ ही, यह शहर अपनी आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक हस्तशिल्प के लिए भी जाना जाता है, जिसमें बांस की कला और उसके इस्तेमाल की अपनी अलग पहचान है.

नाम की कहानी

बांसवाड़ा का नाम दो शब्दों से मिला, ‘बांस’ यानी Bamboo और ‘वाड़ा’ यानी जमीन या क्षेत्र. इसका मतलब हुआ ‘बांस की जमीन’. यह नाम याद दिलाता है कि पहले यहां घने बांस के जंगल थे और यहां के स्थानीय लोग पूरी तरह बांस पर निर्भर थे. बांसवाड़ा का यह नाम आज भी यह दर्शाता है कि बांस ने इस इलाके की पहचान और इतिहास बनाने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई है.

बांस का इस्तेमाल और लोक जीवन

बांसवाड़ा में बांस का इस्तेमाल हमेशा से बहुत होता रहा है. लोग इसे घर बनाने के ढांचे, खेतों के उपकरण, बाड़, टोकरियां और सामान रखने जैसी चीजों के लिए यूज करते थे. इसके अलावा बांस से बने घरेलू सामान और हाथ के बने शिल्प आज भी बहुत मशहूर हैं. पुराने समय में बांस सिर्फ जंगल का पेड़ नहीं था, बल्कि यह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और कमाई का भी बड़ा हिस्सा था.

सांस्कृतिक महत्व

बांस का महत्त्व सिर्फ प्रैक्टिकल चीजों तक ही सीमित नहीं है. बांसवाड़ा के कई त्योहारों, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों में बांस का इस्तेमाल होता है. यहां बांस पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक शिल्प कला की लंबी परंपरा है. यह स्थानीय कला और संस्कृति को सुरक्षित रखने में मदद करता है और आदिवासी समुदाय के ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है.

क्षेत्रीय और सामाजिक स्थिति

बांसवाड़ा राजस्थान के दक्षिण में आता है और इसकी सीमाएं मध्य प्रदेश और गुजरात से मिलती हैं. यह इलाका ज्यादा आदिवासियों वाला है, जहां पहाड़, जंगल और छोटे-छोटे गांव हैं. यहां की आमदनी का मुख्य साधन हमेशा से जंगल और बांस रहा है. लोग बांस की खेती और उससे जुड़े कामों से अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं. साथ ही, यह जगह पर्यटन के लिहाज से भी खास है, क्योंकि बांस के घने जंगल और आदिवासी संस्कृति यहां आने वाले पर्यटकों को बहुत पसंद आती है.

आज भी बांस की अहमियत

आज भी बांसवाड़ा में बांस का महत्व कम नहीं हुआ है. स्थानीय लोग बांस से बने उत्पाद जैसे झूले, टोकरी, फर्नीचर और हस्तशिल्प बनाकर अपना घर चलाते हैं. इसके अलावा, बांस का सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व भी बरकरार है. बांसवाड़ा की पहचान और इसकी सांस्कृतिक विरासत बांस के बिना अधूरी है.

बांसवाड़ा सच में ‘बांसों का शहर’ कहलाता है. यहां बांस ने सिर्फ जंगल को हरियाली ही नहीं दी, बल्कि लोगों की जीवनशैली, संस्कृति, कला और आजीविका को भी मजबूत किया. अगर आप राजस्थान घूमने जाएं तो बांसवाड़ा की यह अनोखी पहचान जरूर देखें और यहां की लोक कला, हस्तशिल्प और घने बांस के जंगलों का आनंद लें.

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