परिवार नहीं, अब व्यक्ति के हिसाब से मिलेगा राशन… सरकार के प्रस्ताव से क्या उत्तर-दक्षिण ‘जंग’ छिड़ेगी?

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में बदलाव के प्रस्ताव ने नई बहस छेड़ दी है. सरकार परिवार की जगह प्रति व्यक्ति 7 किलो राशन देने की तैयारी में है. इससे बड़े परिवारों को फायदा मिल सकता है, लेकिन छोटे परिवारों और दक्षिणी राज्यों पर इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. क्या इससे राशन व्यवस्था कैसे बदल सकती है?

Kisan India
नोएडा | Updated On: 27 Jun, 2026 | 08:50 PM

चंद रोज पहले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) में बड़ा बदलाव करने के लिए ड्राफ्ट आया है.केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन का मसौदा जारी करते हुए सुझाव मांगे हैं. सबसे अहम प्रस्ताव यह है कि अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत अब राशन का आधार परिवार नहीं, बल्कि परिवार के सदस्यों की संख्या हो सकता है. प्रस्ताव के मुताबिक प्रत्येक पात्र व्यक्ति को 7 किलो खाद्यान्न मिलेगा, हालांकि किसी भी परिवार को अधिकतम 35 किलो राशन ही दिया जाएगा.

मतलब यह कि अगर परिवार में दो लोग हैं, तो 14 किलो राशन मिलेगा. अगर नौ लोग हैं, तो 35 किलो, क्योंकि यह अधिकतम सीमा है. पहली नजर में यह बदलाव समानता की दिशा में उठाया गया कदम लगता है, लेकिन इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असर को लेकर बहस भी शुरू हो गई है. सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था वास्तव में अधिक न्यायसंगत होगी या फिर छोटे परिवारों के लिए नुकसान का कारण बनेगी.

क्यों बदलना चाहती है सरकार व्यवस्था?

अभी अंत्योदय अन्न योजना के तहत हर पात्र परिवार को 35 किलो अनाज मिलता है. परिवार में दो सदस्य हों या सात, राशन की मात्रा समान रहती है. सरकार का कहना है कि इससे प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता में असमानता पैदा होती है. दो सदस्य वाले परिवार को प्रति व्यक्ति 17.5 किलो अनाज मिल जाता है, जबकि सात सदस्य वाले परिवार में यह मात्रा घटकर केवल 5 किलो रह जाती है.

सरकार का तर्क है कि व्यक्ति आधारित व्यवस्था से इस असमानता को काफी हद तक दूर किया जा सकेगा और पात्र लोगों के बीच संसाधनों का अधिक संतुलित वितरण होगा.

छोटे और बड़े परिवारों पर अलगअलग होगा असर

प्रस्तावित व्यवस्था का असर सभी परिवारों पर समान नहीं होगा. जिन परिवारों में पांच या उससे अधिक सदस्य हैं, उन्हें पहले की तरह अधिकतम 35 किलो राशन मिलता रहेगा. लेकिन दो, तीन या चार सदस्यों वाले परिवारों को वर्तमान व्यवस्था की तुलना में कम राशन मिल सकता है.

यही वजह है कि कई राज्यों और सामाजिक संगठनों ने इस प्रस्ताव पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. उनका कहना है कि छोटे परिवारों को मिलने वाला खाद्यान्न घटने से गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है.

इस व्यवस्था से क्यों चिंतित है दक्षिण

इस प्रस्ताव के सामने आते ही सबसे पहले केरल सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई. राज्य का कहना है कि दक्षिण भारत में औसत परिवार का आकार अपेक्षाकृत छोटा है. ऐसे में यदि राशन पूरी तरह सदस्य संख्या के आधार पर तय किया गया तो इन राज्यों के बड़ी संख्या में लाभार्थियों को पहले की तुलना में कम खाद्यान्न मिलेगा.

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से भी इसी तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं, क्योंकि इन राज्यों में भी परिवारों का औसत आकार राष्ट्रीय औसत से कम है.

क्या कह रहे हैं खाद्य अधिकार से जुड़े संगठन?

राइट टू फूड कैंपेनऔर खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले कई विशेषज्ञों ने अंग्रेजी अखबार बिजनेसलाइन से कहा है कि केवल वितरण का फॉर्मूला बदलना पर्याप्त नहीं है. उनका तर्क है कि देश में अभी भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का कवरेज पुरानी जनगणना के आधार पर तय है. पिछले एक दशक में आबादी बढ़ी है, लेकिन पात्र लाभार्थियों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ाई गई.

कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि गरीब परिवारों के पोषण की जरूरत केवल अनाज से पूरी नहीं हो सकती. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में दाल, खाद्य तेल और अन्य पोषक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाने पर भी समान रूप से ध्यान देने की जरूरत है.

कृषि नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने द ट्रिब्यून अखबार से कहा है कि सरकार जिस असमानता को दूर करने की बात कर रही है, उससे एक नई असमानता पैदा हो सकती है. उनके मुताबिक दो या तीन सदस्यों वाले गरीब परिवारों को अब 35 किलो की जगह 14 या 21 किलो राशन मिलेगा, जबकि उनकी आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है.

क्या यह बदलाव आर्थिक रूप से भी अहम है?

राशन वितरण प्रणाली पर केंद्र सरकार हर साल बड़ी राशि खर्च करती है. व्यक्ति आधारित व्यवस्था लागू होने पर खाद्यान्न का वितरण अधिक लक्षित हो सकता है. इससे संसाधनों के बेहतर उपयोग और वितरण प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है. सरकार के खर्च में भी असर पड़ने की संभावना है. अगर यह लागू होता है तो जिन राज्यों में छोटे परिवार अधिक हैं, वहां कुल खाद्यान्न आवंटन में बदलाव देखने को मिले. ऐसे में राज्यों और केंद्र के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है.

अर्थशास्त्री प्रवीण कुमार ने अखबार द ट्रिब्यून से कहा है कि सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि इस बदलाव का खाद्य सब्सिडी और सरकारी खर्च पर क्या असर पड़ेगा. उन्होंने सुझाव दिया है कि संशोधन के साथ उसका विस्तृत वित्तीय विश्लेषण भी सार्वजनिक होना चाहिए.

क्या बदल जाएगा राशन व्यवस्था का पूरा मॉडल?

यदि यह संशोधन लागू होता है तो यह सिर्फ राशन की मात्रा बदलने का मामला नहीं होगा. यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद वितरण व्यवस्था में सबसे बड़े संरचनात्मक बदलावों में से एक माना जाएगा. इससे भविष्य में लाभार्थियों की पहचान, परिवार की परिभाषा और खाद्यान्न आवंटन की पूरी प्रणाली नए सिरे से तय करनी पड़ सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव के साथ डिजिटल डेटाबेस, परिवारों के रिकॉर्ड और लाभार्थियों के नियमित सत्यापन की जरूरत भी पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगी.

सकारात्मक और नकारात्मक असर दोनों संभव

इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि बड़े परिवारों को प्रति व्यक्ति अधिक न्यायसंगत मात्रा में राशन मिलने की संभावना बढ़ेगी. इससे संसाधनों के वितरण में मौजूद असमानता कम हो सकती है और व्यक्ति आधारित व्यवस्था अधिक तार्किक दिखाई देती है.

वहीं दूसरी ओर छोटे परिवारों के लिए यह बदलाव नुकसानदेह साबित हो सकता है. यदि उन्हें पहले की तुलना में कम खाद्यान्न मिलता है तो गरीब परिवारों का मासिक खाद्य खर्च बढ़ सकता है. इसके अलावा राज्यों के बीच आवंटन, लाभार्थियों की संख्या और पात्रता को लेकर भी नए विवाद पैदा हो सकते हैं.

अभी फैसला नहीं, केवल सुझावों का दौर

यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह बदलाव अभी लागू नहीं हुआ है. केंद्र सरकार ने केवल मसौदा संशोधन जारी किया है और उस पर सुझाव मांगे हैं. 13 जुलाई तक सुझाव दिए जा सकते हैं. सुझाव मिलने के बाद मसौदे में बदलाव संभव है. इसके बाद ही इसे संसद में विधेयक के रूप में लाया जाएगा. इसलिए अंतिम कानून बनने तक प्रस्ताव में संशोधन की पूरी संभावना बनी हुई है.

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Published: 27 Jun, 2026 | 08:04 PM

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