विकास की रफ्तार या वन्यजीवों पर वार…दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे ने बदली तस्वीर या बढ़ाई परेशानी?
Green Corridor: दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का ग्रीन कॉरिडोर वन्यजीवों के लिए बड़ी राहत बनकर उभरा है. इससे हाथी, तेंदुआ, हिरण और कई अन्य प्रजातियां सुरक्षित तरीके से जंगल के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जा रही हैं. यह मॉडल सड़क हादसे कम करने और जंगलों का प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहा है.
Delhi Dehradun Expressway: दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे को लेकर यही बड़ा सवाल उठ रहा था कि तेज रफ्तार सड़क कहीं जंगल और वन्यजीवों के लिए खतरा तो नहीं बन जाएगी. लेकिन अब सामने आई तस्वीर इस सोच को काफी हद तक बदलती दिख रही है. एक्सप्रेसवे के नीचे और आसपास बनाया गया ग्रीन कॉरिडोर टूटे हुए जंगल मार्गों को फिर से जोड़ रहा है, जिससे हाथी, तेंदुआ, सांभर और नीलगाय जैसे वन्यजीव सुरक्षित आवाजाही कर रहे हैं. 18 प्रजातियों की नियमित मूवमेंट ने साबित किया है कि सही योजना के साथ विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ आगे बढ़ सकते हैं.
हरित गलियारा क्या है और कैसे करता है काम?
उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे को बनाने के लिए करीब 45000 पेड़ काटने की आवश्यकता थीं लेकिन तकनिक और बेहतर डिजाइन का इस्तेमाल कर केवल 11,160 पेड़ ही काटे गए. हालांकि इसके बदले में 1.95 लाख पौधे लगाए गए. दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे को इस तरह बनाया गया है कि यह जंगलों को काटने के बजाय उनके ऊपर और नीचे से गुजरता है. इसके लिए करीब 12 किलोमीटर का एलिवेटेड स्ट्रेच और कई बड़े अंडरपास बनाए गए हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि वन्यजीवों के पारंपरिक रास्ते बंद नहीं होते. जानवर बिना सड़क पर आए अंडरपास या ऊंचे हिस्से के नीचे से सुरक्षित निकल जाते हैं. इससे जंगल के दो हिस्सों के बीच प्राकृतिक संपर्क बना रहता है. यह हरित गलियारा खासतौर पर शिवालिक और राजाजी के संवेदनशील वन क्षेत्र के पास बनाया गया है, जहां जानवरों की आवाजाही पहले से ज्यादा रहती है.
18 प्रजातियों की आवाजाही ने साबित की सफलता
कैमरा ट्रैप निगरानी में इस गलियारे का इस्तेमाल करने वाली 18 अलग-अलग वन्यजीव प्रजातियां दर्ज की गई हैं. इनमें हाथी, तेंदुआ, सांभर, चीतल, नीलगाय, सुनहरा सियार और भारतीय खरगोश जैसे जानवर शामिल हैं. करीब 40 दिनों की निगरानी में 40,000 से ज्यादा तस्वीरें रिकॉर्ड हुईं, जो यह साबित करती हैं कि यह गलियारा सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि जमीन पर प्रभावी तरीके से काम कर रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में रिकॉर्ड होना इस बात का संकेत है कि वन्यजीव इसे अपने नियमित रास्ते के रूप में अपना चुके हैं.
हाथियों और बड़े जानवरों के लिए बना सुरक्षित माइग्रेशन रूट
इस पूरे सिस्टम का सबसे अहम फायदा हाथियों जैसे बड़े स्तनधारियों को मिला है. निगरानी में हाथियों के लगभग 60 बार सुरक्षित पार करने के मामले दर्ज किए गए हैं. हाथी आमतौर पर अपने पुराने रास्तों पर ही चलते हैं और अगर उन्हें बाधा मिलती है, तो मानव बस्तियों की ओर बढ़ जाते हैं. इससे अक्सर सड़क हादसे और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है. हरित गलियारा उनके लिए एक सुरक्षित माइग्रेशन रूट बन गया है, जिससे वे बिना तनाव और बिना ट्रैफिक के संपर्क में आए जंगल के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जा सकते हैं.
सड़क हादसे कम, जंगलों का प्राकृतिक संतुलन मजबूत
इस हरित गलियारे का सबसे बड़ा पर्यावरणीय फायदा यह है कि इससे वन्यजीवों की सड़क हादसों में मौत कम होती है. तेज रफ्तार एक्सप्रेसवे आमतौर पर जंगलों को दो हिस्सों में बांट देते हैं, जिससे जानवरों के लिए सड़क पार करना बेहद खतरनाक हो जाता है. लेकिन यहां अंडरपास, फेंसिंग और एलिवेटेड रोड के जरिए जानवरों को सड़क से दूर रखा गया है. इससे उनका प्राकृतिक आवागमन बना रहता है और जंगलों का पारिस्थितिक संतुलन भी मजबूत होता है.