पंजाब में पराली जलाने के मामलों में बड़ा उछाल, एक दिन में 644 घटनाएं दर्ज… बढ़ी प्रशासन की चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने के पीछे एक बड़ा कारण पशुपालन में कमी भी है. पहले किसान गेहूं के अवशेष से चारा बनाते थे, लेकिन अब पशुपालन कम होने, लागत बढ़ने और चारे के कम दाम मिलने के कारण किसान इस प्रक्रिया से बचने लगे हैं. इसी वजह से अब किसान पराली जलाना ज्यादा आसान विकल्प मान रहे हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 3 May, 2026 | 11:41 AM

Stubble burning punjab: पंजाब में इस साल पराली जलाने के मामलों ने चिंता बढ़ा दी है. खेती के मौसम के बीच अचानक आग लगाने की घटनाओं में तेजी देखने को मिली है. हालात ऐसे हो गए हैं कि एक ही दिन में 644 मामलों का रिकॉर्ड दर्ज किया गया, जो इस सीजन का सबसे बड़ा आंकड़ा है. अधिकारियों का कहना है कि यह बढ़ती संख्या न सिर्फ पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि खेती की जमीन की गुणवत्ता पर भी बुरा असर डाल रही है.

एक दिन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, कुल आंकड़ा 2403 पहुंचा

ICAR के आंकड़ों के अनुसार, 15 अप्रैल से 2 मई के बीच पंजाब में कुल 2403 पराली जलाने की घटनाएं सामने आई हैं. इनमें से सिर्फ एक दिन में 644 मामले दर्ज हुए, जो इस सीजन का सबसे बड़ा उछाल है.

अगर पिछले सालों से तुलना करें तो यह आंकड़ा काफी ज्यादा है. 2025 में इसी अवधि के दौरान 1044 मामले सामने आए थे, जबकि 2024 में यह संख्या केवल 437 थी. इससे साफ है कि इस साल पराली जलाने की घटनाएं दोगुनी से भी ज्यादा हो गई हैं.

किन जिलों में सबसे ज्यादा मामले

इस बार सबसे ज्यादा मामले संगरूर जिले से सामने आए हैं, जहां अब तक 285 घटनाएं दर्ज की गई हैं. इसके बाद फिरोजपुर में 275 मामले सामने आए हैं. पंजाब ने इस मामले में पड़ोसी राज्य हरियाणा को भी पीछे छोड़ दिया है. हरियाणा में पिछले 24 घंटे में 476 घटनाएं सामने आईं और कुल आंकड़ा 2185 तक पहुंचा है.

पिछले सालों का रिकॉर्ड भी चिंताजनक

अगर पुराने आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब में पराली जलाने की समस्या लगातार बनी हुई है. पिछले वर्षों में अप्रैल और मई के दौरान मामलों की संख्या इस तरह रही:

2020: 13,420 मामले
2021: 10,100 मामले
2022: 14,511 मामले
2023: 11,353 मामले
2024: 11,900 मामले
2025: 10,207 मामले

इन आंकड़ों से साफ है कि हर साल यह समस्या दोहराई जा रही है और इसका स्थायी समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है.

गेहूं की कटाई बढ़ते ही बढ़े मामले

अधिकारियों के अनुसार, जैसे-जैसे गेहूं की कटाई तेज होती है, वैसे-वैसे पराली जलाने की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं. पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) हर साल 15 अप्रैल से निगरानी शुरू करता है, जब गेहूं की कटाई शुरू होती है, और यह प्रक्रिया 30 मई तक चलती है, जब धान की बुआई की तैयारी होती है. इस बार पिछले 6 दिनों में ही 2000 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं, जिससे साफ है कि अचानक तेजी आई है.

मिट्टी और पर्यावरण पर बुरा असर

हिंदुस्तान की खबर के अनुसार, विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने से जमीन की उर्वरता पर गंभीर असर पड़ता है. पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) के कुलपति एस.एस. गोसल के अनुसार, पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद जरूरी पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम और सल्फर नष्ट हो जाते हैं. इसके साथ ही मिट्टी के सूक्ष्म जीव भी खत्म हो जाते हैं, जिससे जमीन की गुणवत्ता धीरे-धीरे कमजोर हो जाती है.

चारे की मांग कम होना भी एक कारण

विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने के पीछे एक बड़ा कारण पशुपालन में कमी भी है. पहले किसान गेहूं के अवशेष से चारा बनाते थे, लेकिन अब पशुपालन कम होने, लागत बढ़ने और चारे के कम दाम मिलने के कारण किसान इस प्रक्रिया से बचने लगे हैं. इसी वजह से अब किसान पराली जलाना ज्यादा आसान विकल्प मान रहे हैं.

प्रशासन की अपील, अपनाएं नए तरीके

अधिकारियों ने किसानों से अपील की है कि वे पराली जलाने के बजाय खेत में ही उसे नष्ट करने के तरीके अपनाएं. प्रशासन और विभागीय टीमें लगातार गांवों में जाकर किसानों को जागरूक कर रही हैं, ताकि इस समस्या को कम किया जा सके.

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