Earth Mango fungus: केरल के पलक्कड़ जिले से एक बेहद अनोखी और हैरान कर देने वाली खोज सामने आई है. यहां जमीन के अंदर मिलने वाली एक दुर्लभ फंगस ने वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. इस फंगस को स्थानीय भाषा में “निलामंगा” यानी “अर्थ मैंगो” कहा जाता है. लंबे समय बाद इसके दोबारा मिलने से वैज्ञानिकों में उत्साह के साथ चिंता भी बढ़ गई है.
यह खोज पलक्कड़ जिले के कराकुरुसी गांव में हुई, जहां एक किसान खेती के लिए जमीन की खुदाई कर रहा था. खुदाई के दौरान मिट्टी के अंदर कुछ अजीब आकार की संरचनाएं दिखाई दीं. शुरुआत में लोगों को लगा कि यह कोई सामान्य जंगली मशरूम होगा, लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने जांच के बाद बताया कि यह “स्क्लेरोटियम स्टिपिटेटम” नाम की बेहद दुर्लभ भूमिगत फंगस है.
आखिर क्या है ‘अर्थ मैंगो’?
इसका नाम सुनकर ऐसा लगता है जैसे यह कोई खास किस्म का आम हो, लेकिन असल में यह एक दुर्लभ फंगस है जो मिट्टी के अंदर उगती है. यह सामान्य मशरूम की तरह बारिश के बाद जमीन के ऊपर दिखाई नहीं देती. इसका अधिकांश हिस्सा मिट्टी के भीतर ही विकसित होता है. यही वजह है कि इसे ढूंढ पाना बेहद मुश्किल माना जाता है.
स्थानीय लोग इसे “निलामंगा” और “चिथलकिझंगु” जैसे नामों से जानते हैं. “अर्थ मैंगो” नाम इसकी बनावट और जमीन के अंदर पाए जाने की वजह से पड़ा. वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इसका आम फल से कोई संबंध नहीं है.
गांव के लोगों ने तुरंत पहचान लिया
दिलचस्प बात यह रही कि गांव के कई लोगों ने इस फंगस को देखते ही पहचान लिया. स्थानीय समुदाय में यह वर्षों से पारंपरिक जानकारी का हिस्सा रही है. ग्रामीणों का कहना है कि पुराने समय में लोग इसका इस्तेमाल कई घरेलू उपचारों में करते थे. हालांकि आज की नई पीढ़ी में इसके बारे में जानकारी बहुत कम बची है. इसलिए इसके दोबारा मिलने से गांव में भी काफी उत्सुकता देखने को मिली.
औषधीय गुणों को लेकर बढ़ी चर्चा
TOI की खबर के अनुसार, स्थानीय लोगों का मानना है कि यह दुर्लभ फंगस कई बीमारियों में उपयोगी हो सकती है. ग्रामीणों के अनुसार इसका उपयोग खांसी, सर्दी, पेट दर्द, शरीर दर्द, कान दर्द और पीलिया जैसी समस्याओं में किया जाता रहा है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दावों को अभी वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं किया गया है. फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि फंगस में कई तरह के जैव सक्रिय तत्व मौजूद हो सकते हैं, जिनका उपयोग भविष्य में दवाएं बनाने में किया जा सकता है.
क्यों खास होती हैं ऐसी फंगस?
वैज्ञानिकों के मुताबिक दुनिया की कई महत्वपूर्ण दवाएं और एंटीबायोटिक फंगस पर किए गए शोध से ही विकसित हुई हैं. इसी वजह से दुर्लभ फंगस प्रजातियों को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि “स्क्लेरोटियम स्टिपिटेटम” जैसी प्रजातियों में भी ऐसे तत्व हो सकते हैं जिनका उपयोग भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सके.
दीमक वाले इलाकों से है खास संबंध
इस खोज का एक और रोचक पहलू सामने आया है. शोधकर्ताओं के अनुसार यह फंगस उन इलाकों में ज्यादा पाई जाती है जहां मिट्टी में दीमक की गतिविधियां अधिक होती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि दीमक मिट्टी के अंदर ऐसा वातावरण तैयार करती हैं जो इस फंगस के विकास के लिए अनुकूल हो सकता है. हालांकि अभी इस संबंध को लेकर विस्तृत अध्ययन किया जाना बाकी है.
मानसून और नमी से जुड़ा है इसका जीवन
इस फंगस का विकास काफी हद तक नमी और मौसम पर निर्भर करता है. केरल में मानसून और उसके बाद की गीली मिट्टी इसके लिए अनुकूल मानी जाती है. यही वजह है कि यह हर साल दिखाई नहीं देती और इसका मिलना काफी दुर्लभ माना जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार मौसम में बदलाव और पर्यावरणीय असंतुलन का असर ऐसी प्रजातियों पर सबसे ज्यादा पड़ता है.
भारत में फंगस पर बहुत कम हुआ है शोध
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पौधों, पक्षियों और जानवरों पर काफी रिसर्च हुई है, लेकिन फंगस अब भी सबसे कम अध्ययन किए गए जीवों में शामिल हैं. कई फंगस प्रजातियां साल के कुछ ही दिनों में दिखाई देती हैं, जबकि कुछ पूरी जिंदगी जमीन के अंदर छिपी रहती हैं. इसी कारण इनके बारे में जानकारी जुटाना बेहद कठिन होता है.
पर्यावरण के लिए भी बेहद जरूरी हैं फंगस
फंगस सिर्फ औषधीय महत्व के लिए ही नहीं जानी जातीं, बल्कि पर्यावरण को संतुलित रखने में भी इनकी बड़ी भूमिका होती है. ये मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, जैविक पदार्थों को गलाने और प्राकृतिक चक्र को बनाए रखने में मदद करती हैं. अगर ऐसी दुर्लभ प्रजातियां खत्म होती रहीं तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है.
वैज्ञानिकों ने जताई चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि कई दुर्लभ फंगस प्रजातियां चुपचाप खत्म हो रही हैं और लोगों को इसका पता भी नहीं चल पाता. भूमि उपयोग में बदलाव, रासायनिक खेती, जंगलों की कटाई और पर्यावरणीय बदलावों की वजह से इनका प्राकृतिक आवास लगातार प्रभावित हो रहा है. क्योंकि ये जमीन के अंदर रहती हैं, इसलिए इनके खत्म होने की जानकारी अक्सर बहुत देर से मिलती है.
वहीं अब वैज्ञानिक इस दुर्लभ फंगस पर और गहराई से अध्ययन करने की तैयारी कर रहे हैं. शोधकर्ता यह जानने की कोशिश करेंगे कि इसके औषधीय गुण कितने प्रभावी हैं और इसका पर्यावरणीय महत्व कितना बड़ा है.