Maize cultivation: उत्तर भारत के कई जिलों में आलू की खुदाई फरवरी के आसपास पूरी हो जाती है. इसके बाद अक्सर खेत कुछ समय के लिए खाली पड़े रहते हैं. लेकिन अब किसान इस खाली समय को अवसर में बदल रहे हैं. आलू की फसल के बाद जायद सीजन में मक्का की खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल न केवल मिट्टी की सेहत को संतुलित करती है, बल्कि अतिरिक्त आमदनी का मजबूत जरिया भी बनती है. यदि सही योजना और वैज्ञानिक तरीके से बुवाई की जाए तो मक्का किसानों को अच्छा उत्पादन और बेहतर बाजार मूल्य दिला सकती है.
खेत की अच्छी तैयारी ही सफलता की कुंजी
आलू निकालने के बाद खेत में डंठल, सूखी पत्तियां और खरपतवार बचे रह जाते हैं. मक्का बोने से पहले इन अवशेषों को पूरी तरह साफ करना जरूरी है. इसके बाद एक गहरी जुताई करनी चाहिए ताकि मिट्टी पलट जाए और जमीन के अंदर छिपे कीट व रोग नष्ट हो सकें. फिर दो बार हल्की जुताई कर पाटा चलाने से मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाती है.
अगर किसान सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट को 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिला दें तो मिट्टी की उर्वरता और संरचना दोनों बेहतर हो जाती हैं. इससे पौधों की जड़ों को पर्याप्त पोषण और नमी मिलती है, जो आगे चलकर अच्छी पैदावार में मदद करती है.
सही दूरी और गहराई से बढ़ेगी उपज
मक्का की बुवाई करते समय कतार और पौधों के बीच उचित दूरी रखना बहुत जरूरी है. सामान्य किस्मों के लिए कतारों के बीच लगभग 60 से 70 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी उपयुक्त मानी जाती है. यदि हाइब्रिड किस्म लगाई जा रही हो तो कतारों की दूरी 70 से 75 सेंटीमीटर तक रखी जा सकती है.
बीज को लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए. बहुत अधिक गहराई पर बीज डालने से अंकुरण धीमा हो सकता है, जबकि बहुत उथली बुवाई से पौधे कमजोर रह सकते हैं. सही गहराई पर बोया गया बीज तेजी से अंकुरित होता है और पौधों की बढ़वार संतुलित रहती है.
मेड पर बुवाई से मिलते हैं अतिरिक्त फायदे
हाल के वर्षों में किसान समतल खेत के बजाय मेड बनाकर मक्का बोने लगे हैं. इस पद्धति में खेत में उठी हुई क्यारियां या मेड़ तैयार की जाती हैं और बीज इन्हीं पर बोया जाता है. इससे जल निकासी बेहतर रहती है, खासकर तब जब अचानक बारिश हो जाए या सिंचाई अधिक हो जाए. पानी जमा न होने से जड़ों को सड़न से बचाया जा सकता है.
मेड पर बुवाई से पौधों की जड़ें गहराई तक फैलती हैं, जिससे वे अधिक मजबूत बनती हैं. साथ ही सिंचाई करना भी आसान हो जाता है, क्योंकि पानी को नालियों के माध्यम से नियंत्रित तरीके से पहुंचाया जा सकता है.
खाद और सिंचाई का संतुलन जरूरी
मक्का की अच्छी फसल के लिए संतुलित उर्वरक प्रबंधन जरूरी है. खेत की मिट्टी के अनुसार नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का सही अनुपात देना चाहिए. नाइट्रोजन को एक साथ देने के बजाय दो या तीन भागों में देना अधिक लाभकारी होता है. पहली सिंचाई बुवाई के कुछ दिनों बाद और दूसरी सिंचाई घुटना अवस्था में करना फायदेमंद माना जाता है.
यदि समय पर निंदाई-गुड़ाई कर दी जाए तो खरपतवार का दबाव कम होता है और पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता है. खरपतवार अधिक होने पर उपज में गिरावट आ सकती है, इसलिए शुरुआती 30 से 40 दिनों तक विशेष ध्यान देना जरूरी है.
कम समय में तैयार, बाजार में अच्छी मांग
जायद सीजन की मक्का लगभग 80 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है. हरे भुट्टे के रूप में इसकी मांग स्थानीय बाजारों में काफी रहती है. वहीं सूखी मक्का पशु आहार और उद्योगों में उपयोग होने के कारण भी अच्छे दाम दिला सकती है. इस तरह किसान एक ही खेत से साल में अतिरिक्त आय कमा सकते हैं.
स्मार्ट योजना से बढ़ेगा मुनाफा
आलू के बाद मक्का की खेती एक सोची-समझी रणनीति के साथ की जाए तो यह लाभदायक साबित होती है. सही समय पर बुवाई, संतुलित खाद, उचित सिंचाई और रोग-कीट पर नजर रखने से उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है. खेत को खाली छोड़ने के बजाय इस अवधि का सदुपयोग कर किसान अपनी आय दोगुनी करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं.